विनोद कुमार झा
आज का समाज जितना आधुनिक होने का दावा करता है, उतना ही वह दिखावे, आडंबर और आर्थिक हिंसा का शिकार है। सोना–चांदी अब महज़ आभूषण नहीं रहे, बल्कि सामाजिक दबाव का हथियार बन चुके हैं। आसमान छूते इनके भाव आम आदमी की पहुँच से कोसों दूर हैं, फिर भी विवाह के नाम पर इन्हें अनिवार्य बना दिया गया है। यह कैसी सभ्यता है, जहाँ बेटी का सम्मान गहनों के वजन में तौला जाता है?
बाज़ार और समाज दोनों ने मिलकर गरीब पिता को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। एक ओर सुनार की चमचमाती दुकानों में दाम रोज़ बढ़ते जाते हैं, दूसरी ओर रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें दिल में तीर की तरह चुभती हैं “लड़की वालों ने क्या दिया?” मानो लड़की की कीमत तय करने का अधिकार केवल सोने–चांदी को मिल गया हो। इस क्रूर मानसिकता ने विवाह को खुशी का नहीं, बल्कि भय का अवसर बना दिया है।
ग्रामीण इलाकों में यह क्रूर परंपरा और भी बर्बर रूप ले चुकी है। बारात आते ही सबसे पहले जेवरात की प्रदर्शनी लगती है—जैसे कोई पशु मेला हो, जहाँ बेटी को नहीं, उसकी “गठरी” को परखा जा रहा हो। पढ़ाई, संस्कार, मेहनत सब गौण हो जाते हैं; असली मापदंड बस इतना है कि कितने तोले सोना दिया गया।
बाज़ार भी इस सामाजिक कमजोरी का भरपूर फायदा उठाता है। जैसे ही शादी का मौसम आता है, सोना–चांदी के दाम कृत्रिम रूप से उछाल दिए जाते हैं। न सरकार का नियंत्रण दिखता है, न उपभोक्ता संरक्षण की कोई परवाह। मजबूर आदमी को लूटा जाता है और इसे “व्यापार” कह दिया जाता है। यह आर्थिक शोषण नहीं तो और क्या है?
मध्यम वर्ग भी धीरे-धीरे इसी दलदल में धँस चुका है। जो कभी सादगी की बात करता था, वही आज महंगे रिसेप्शन, भारी गहने और सोशल मीडिया पर दिखावे की होड़ में शामिल है। गरीब तबका तो पहले ही इस दौड़ से बाहर हो चुका है अब वह बस तमाशा देखता है और भीतर ही भीतर टूटता रहता है।
कर्ज की कहानी तो अब लगभग हर गाँव की है। कहीं खेत गिरवी है, कहीं घर पर साहूकार का कब्ज़ा है, कहीं पिता ने तीन जगह कर्ज लिया है सब कुछ सिर्फ इसलिए कि बेटी “सम्मान” के साथ विदा हो सके। यह कैसा सम्मान है, जो परिवार को बरबाद कर देता है? यह परंपरा नहीं, सामूहिक अत्याचार है।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ा शिकार बेटी बनती है। वह समझती है कि उसकी शादी परिवार पर बोझ बन रही है। कई लड़कियाँ मन ही मन अपराधबोध से भर जाती हैं मानो उनका जन्म ही समस्या हो। यह मानसिक हिंसा है, जिसे समाज देखने से इनकार करता है।
विडंबना यह है कि धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इस शोषण को वैध ठहराया जाता है। कहा जाता है “यह तो रिवाज है।” लेकिन जो रिवाज गरीब को कुचल दे, बेटी को अपराधी महसूस कराए और परिवार को कर्जदार बना दे, वह रिवाज नहीं, सामाजिक बीमारी है।
अब सवाल यह है कि क्या समाज बदलेगा? क्या पंचायतें, समुदाय और परिवार इस दिखावे की राजनीति को खत्म करेंगे? क्या हम यह स्वीकार करेंगे कि शादी का असली गहना शिक्षा, सम्मान और समानता है, न कि सोना–चांदी?
समय आ गया है कि हम इस “गठरी संस्कृति” के खिलाफ खड़े हों। विवाह को आर्थिक बोझ नहीं, मानवीय संबंध का उत्सव बनाना होगा। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक गरीब की अभिलाषा पूरी नहीं होगी और हर बेटी की विदाई के पीछे आँसू, कर्ज और टूटे सपने छिपे रहेंगे।

