विनोद कुमार झा
आस्था, तप और शिवभक्ति की अलौकिक ऊर्जा से ओत-प्रोत महाशिवरात्रि का पावन पर्व इस वर्ष 15 फरवरी, रविवार को श्रद्धा और विश्वास के अद्भुत संगम के रूप में मनाया जाएगा। मान्यता है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की यह दिव्य रात्रि स्वयं भगवान शिव की कृपा वर्षा का अवसर होती है, जब भक्त उपवास, जप, रुद्राभिषेक और ध्यान के माध्यम से अपने जीवन को पवित्र और मंगलमय बनाने का संकल्प लेते हैं। शिवपुराण और सनातन परंपरा में वर्णित यह रात्रि आध्यात्मिक जागरण, आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति की प्रतीक मानी गई है इसी दिव्यता और रहस्यात्मक महिमा के कारण इसे ‘महाशिवरात्रि’ कहा जाता है।
भारत की सनातन सांस्कृतिक परंपरा में महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मजागरण और आध्यात्मिक उन्नयन का महोत्सव है। यह वह पावन रात्रि है जब साधक शिव-तत्व से एकाकार होने का प्रयास करता है। सनातन धर्म में भगवान शिव को सृष्टि के संहारक मात्र नहीं, बल्कि पुनर्सृजन और कल्याण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
धर्मग्रंथों में शिव की महिमा का व्यापक उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से शिवपुराण में शिव के अवतारों, लीलाओं और भक्तों पर उनकी कृपा का विस्तृत वर्णन है। ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि वह पावन रात्रि है जब शिव ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए। इस दिन उपवास, रात्रि जागरण और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र के जप का विशेष महत्व बताया गया है।
उपनिषदों में भी शिव को परम ब्रह्म का स्वरूप स्वीकार किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद में रुद्र को समस्त सृष्टि का मूल कारण और एकमात्र ईश्वर कहा गया है। यह दार्शनिक दृष्टि शिव को केवल देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है।
आस्था और विज्ञान का समन्वय : भगवान शिव का स्वरूप प्रतीकों से भरा हुआ है, जिनमें गहन वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत निहित हैं। नटराज का तांडव सृष्टि के सृजन और विनाश के चक्र का प्रतीक है, जो आधुनिक विज्ञान में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विस्तार के सिद्धांतों की याद दिलाता है। शिव का तीसरा नेत्र चेतना और विवेक का द्योतक है, जबकि जटाओं से अवतरित गंगा जीवन और ऊर्जा के प्रवाह का संकेत देती है। गले में सर्प कुंडलिनी शक्ति और नियंत्रित ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार महाशिवरात्रि केवल भक्ति का पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान और आत्मानुशासन का भी संदेश देती है।
सनातन संस्कृति में महाशिवरात्रि : देशभर के प्रमुख शिवधामों जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर, महाकालेश्वर मंदिर और केदारनाथ मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजन और भव्य आरती का आयोजन होता है। लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित कर शिव की आराधना करते हैं।
ग्रामीण भारत से लेकर महानगरों तक, मंदिरों में रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक प्रवचन होते हैं। यह पर्व सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है, जहां जाति, वर्ग और भाषा की सीमाएं मिट जाती हैं।
शिव: लोकदेवता से ब्रह्मांडीय चेतना तक : भगवान शिव को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है अर्थात सहज, सरल और कृपालु। वे तप और त्याग के देवता हैं, तो गृहस्थ जीवन के आदर्श भी। कैलाशवासी योगी शिव, परिवार सहित पूजे जाते हैं माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ। यह परिवार भारतीय जीवन-मूल्यों की झलक प्रस्तुत करता है।
महाशिवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि जीवन में संयम, संतुलन और आत्मचिंतन आवश्यक हैं। अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना ही शिव-तत्व की साधना है।
आज जब विश्व अशांति और तनाव के दौर से गुजर रहा है, तब शिव का संदेश शांति, करुणा और कल्याण और अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
हर हर महादेव!
