विनोद कुमार झा
बिहार के राज्य के एक छोटे से गांव में मिट्टी की सौंधी खुशबू, आम के पेड़ों की छांव और आपसी रिश्तों की गरमाहट आज भी जिंदा थी। उसी गांव के आख़िरी छोर पर एक टूटी-सी कच्ची झोपड़ी में रहती थी सावित्री देवी। उम्र ढल चुकी थी, कमर झुक गई थी, आंखों की रोशनी भी धुंधली पड़ने लगी थी, लेकिन दिल में अपने तीनों बेटों के लिए वही ममता थी, जो बरसों पहले थी।
सावित्री देवी ने जिंदगी भर संघर्ष किया। पति का देहांत बहुत पहले हो गया था। खेत थोड़े-से थे, वह भी बाढ़ में कई बार बर्बाद हो जाते। लेकिन उसने हार नहीं मानी। दूसरों के खेतों में मजदूरी की, गांव के बड़े घरों में बर्तन मांजे, रात-रात भर सिलाई की। उसके हाथों में पड़े छाले उसके संघर्ष की गवाही देते थे। उसने अपने तीनों बेटों रमेश, सुरेश और महेश को पढ़ाया-लिखाया। खुद भूखी रहकर उन्हें भरपेट खिलाया। बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो वह खुद भीगती रहती लेकिन बच्चों को अपनी गोद में सुला लेती।
समय बदला। बड़ा बेटा रमेश पढ़-लिखकर शहर चला गया। वहां नौकरी लगी, कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे धनवान बन गया। गांव में पक्का मकान बनवाया, जमीन खरीदी और लोगों के बीच उसकी हैसियत बढ़ गई। गांव वाले कहते, “देखो, सावित्री का बेटा कितना बड़ा आदमी बन गया!” सावित्री की आंखों में गर्व के आंसू आ जाते।
मंझला बेटा सुरेश गांव में ही रह गया। उसने खेती संभाली। आमदनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन दिल का साफ था। तीसरा बेटा महेश पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में दूसरे राज्य चला गया। साल में एक-दो बार ही घर आ पाता।
जब सावित्री की उम्र ज्यादा हो गई और काम करने की ताकत जवाब देने लगी, तो वह बड़े बेटे रमेश के पास शहर चली गई। उसने सोचा, “जिसे मैंने अपने खून-पसीने से बड़ा किया, वह अब मेरा सहारा बनेगा।” शुरुआत में सब ठीक रहा। लेकिन धीरे-धीरे रमेश की पत्नी को बूढ़ी मां बोझ लगने लगी। उसे लगता कि मां के कारण खर्च बढ़ रहा है, घर में असुविधा हो रही है।
एक दिन रमेश ने झुंझलाकर कहा, “मां, गांव में ही रहो। यहां तुम्हारा मन भी नहीं लगता और हमें भी परेशानी होती है।” सावित्री ने कुछ नहीं कहा। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज में शिकायत नहीं। जिस बेटे को उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही उसे घर से जाने को कह रहा था।
गांव लौटते समय रास्ते भर वह यही सोचती रही “क्या मैंने उसे इतना बड़ा इसलिए बनाया था कि एक दिन वह मुझे बोझ समझे?”
गांव पहुंचकर वह सीधे मंझले बेटे सुरेश के घर गई। सुरेश ने मां को देखा तो दौड़कर उनके पैर पकड़ लिए। “अरे मां, पहले बतातीं तो मैं खुद लेने आता!” उसकी पत्नी ने भी मां के लिए पानी लाया, खाना परोसा और उनके पैर दबाने लगी। छोटा-सा घर था, आमदनी सीमित थी, लेकिन दिल बहुत बड़ा था।
कुछ दिनों बाद गांव में चर्चा फैल गई कि बड़े बेटे ने अपनी मां को वापस भेज दिया। लोग चुपचाप बातें करते, लेकिन सावित्री किसी से कुछ नहीं कहती। वह हमेशा बड़े बेटे की ही तारीफ करती। “बड़ा शहर में रहता है, काम का दबाव रहता होगा,” वह सफाई देती।
उधर तीसरा बेटा महेश, जो दूर राज्य में नौकरी करता था, जब उसे यह खबर मिली तो वह छुट्टी लेकर तुरंत गांव आया। मां को देखकर उसकी आंखें भर आईं। उसने बड़े भाई को फोन कर कहा, “भैया, मां ने हमें बनाया है। आज हम जो भी हैं, उन्हीं की बदौलत हैं। उनका अपमान हम सबका अपमान है।”
रमेश के मन में भी कहीं न कहीं अपराधबोध था। समाज में उसकी इज्जत थी, धन-दौलत थी, लेकिन मां की दुआओं का साया उससे दूर हो गया था। कुछ दिनों बाद वह भी गांव आया। मां के सामने खड़ा हुआ तो नजरें झुकी हुई थीं। “मां, मुझसे गलती हो गई,” उसने धीमे स्वर में कहा।
सावित्री ने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटा, मां अपने बच्चों से नाराज नहीं रहती। बस इतना याद रखो, जिसने तुम्हें चलना सिखाया, उसे कभी ठोकर मत देना।”
उस दिन रमेश ने मां को वापस शहर ले जाने की जिद की, लेकिन सावित्री ने मना कर दिया। उसने कहा, “अब मैं यहीं ठीक हूं। जहां सम्मान है, वहीं सुकून है।” रमेश ने गांव में ही मां के लिए एक छोटा-सा पक्का कमरा बनवाया और अक्सर मिलने आने लगा।
समय ने सबको एक सीख दे दी धन से बड़ा सम्मान होता है। जिसने हमें धनवान बनाया, अगर उसी का अपमान हो जाए तो सारी दौलत भी व्यर्थ है।
गांव की पगडंडी पर अब भी सावित्री धीरे-धीरे चलती दिख जाती है। चेहरे पर झुर्रियां हैं, लेकिन आंखों में सुकून है। क्योंकि उसने अपने जीवन से यह सिखा दिया कि मां की ममता कभी खत्म नहीं होती, लेकिन संतान का कर्तव्य कभी भूलना नहीं चाहिए।
यह कहानी सिर्फ सावित्री की नहीं, उन सभी माताओं की है जो अपने बच्चों को ऊंचाइयों तक पहुंचाती हैं, और बदले में बस थोड़ा-सा सम्मान चाहती हैं।
