विनोद कुमार झा
गाँव के किनारे बने रामप्रसाद के छोटे से घर में शादी की तैयारियाँ चल रही थीं, पर इस खुशी के भीतर एक गहरी सामाजिक बीमारी धड़क रही थी दहेज। बाहर रंग-बिरंगी रोशनी थी, पर भीतर मन पर बोझ। यह केवल एक बेटी की विदाई नहीं थी, बल्कि पूरे समाज की नैतिक परीक्षा थी, जिसमें परंपरा के नाम पर लालच ने इंसानियत को पीछे धकेल दिया था।
लड़के वालों ने शुरुआत में बड़े आदर्शवादी स्वर में कहा, “हमें दहेज नहीं चाहिए।” लेकिन जैसे-जैसे तारीख नज़दीक आई, यह आदर्शवाद बाज़ारू मांगों में बदल गया। कार, महंगे उपहार, सोना-चांदी सब “रीति-रिवाज” के मीठे आवरण में थोपे गए। यह सीधा भ्रष्टाचार नहीं दिखता, पर यही सबसे खतरनाक सामाजिक भ्रष्टाचार है, जो रिश्तों को लेन-देन में बदल देता है।
गाँव का तथाकथित “सम्मानित समाज” भी रामप्रसाद पर दबाव डालने लगा। सलाहें कम, धमकियाँ ज्यादा थीं “थोड़ा दे दोगे तो क्या बिगड़ेगा? वरना बेटी बदनाम हो जाएगी।” यह समाज बेटियों की सुरक्षा नहीं, बल्कि उनके मौन शोषण का संरक्षक बन चुका था।
सिया ने यह सब देखा तो समझ गई कि दहेज केवल पैसों का मामला नहीं, बल्कि स्त्री के अस्तित्व की सार्वजनिक नीलामी है। उसने साफ कहा, “अगर मुझे सामान की तरह तौला जाएगा, तो ऐसी शादी मुझे नहीं चाहिए।”
यह केवल एक बेटी की आवाज़ नहीं थी, बल्कि पूरे पीढ़ी की बगावत थी। रामप्रसाद ने अंततः हिम्मत दिखाई और रिश्ता तोड़ दिया। समाज ने उन्हें कठघरे में खड़ा किया, पर सच यह था कि उन्होंने दहेज की मानसिकता पर पहली चोट की। रिश्ता टूटा, पर आत्मसम्मान बचा रहा और यही असली जीत थी।
दहेज व्यवस्था दरअसल भारतीय समाज का सबसे बड़ा पाखंड है। हम बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे लगाते हैं, लेकिन शादी के बाज़ार में उन्हीं बेटियों को बोझ बना देते हैं। यह दोहरी नैतिकता लोकतंत्र के चेहरे पर कालिख है। जब तक लड़कियों को आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य समझा जाएगा, तब तक यह बीमारी बनी रहेगी।
कानून मौजूद है, पर सामाजिक इच्छाशक्ति कमजोर है। दहेज विरोधी कानून काग़ज़ों में मजबूत हैं, पर व्यवहार में लाचार। पुलिस, पंचायत और परिवार तीनों अक्सर लड़के वालों के पक्ष में खड़े दिखते हैं। यही कारण है कि हजारों बेटियाँ हर साल प्रताड़ित होती हैं, जलती हैं, या चुपचाप टूट जाती हैं।
सिया की कहानी हमें आईना दिखाती है। असली आधुनिकता मोबाइल या कार नहीं, बल्कि बराबरी है। जिस दिन लड़के वाले दहेज मांगना छोड़ देंगे और समाज बेटी को बोझ नहीं मानेगा, उसी दिन भारत सचमुच विकसित कहलाएगा।
सिया ने पढ़ाई पूरी की, नौकरी पाई और सम्मान के साथ विवाह किया। उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वैचारिक विजय थी यह साबित करते हुए कि स्वाभिमान से बड़ा कोई दहेज नहीं। दहेज की पिटारा जितनी देर खुली रहेगी, समाज उतना ही गरीब होता जाएगा न पैसों से, बल्कि मानवीय मूल्यों से।
