विनोद कुमार झा
किसी भी समाज की पहचान केवल उसके वर्तमान से नहीं बनती, बल्कि उसके अतीत और उसकी स्मृति-संरचना से तय होती है। भारत जैसे सभ्यतागत राष्ट्र में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम अपने अतीत को किस दृष्टि से देखें, केवल घटनाओं के क्रम के रूप में या मूल्यों और आस्था की निरंतर परंपरा के रूप में? इसी संदर्भ में इतिहास और पुराण दो भिन्न, परंतु परस्पर पूरक ज्ञान-परंपराएँ बनकर उभरती हैं।
आधुनिक अर्थ में इतिहास एक अनुशासन है जो प्रमाण, तर्क और साक्ष्य के आधार पर भूतकाल की पुनर्रचना करता है। यह राजसत्ताओं के उत्थान-पतन, युद्धों, संधियों, शासन-प्रणालियों और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का विवरण देता है। इतिहास हमें बताता है कि कौन-सा साम्राज्य कब बना, किन परिस्थितियों में टूटा, किसने किस पर शासन किया और सत्ता के समीकरण कैसे बदले। इसकी शक्ति इसकी वैज्ञानिक पद्धति में है, पर इसकी सीमा भी यही है नए साक्ष्य मिलने पर यह बदल सकता है, पुनर्लिखित हो सकता है, कभी-कभी विचारधाराओं के प्रभाव में विकृत भी हो सकता है।
इसके विपरीत, पुराण भारतीय सभ्यता की आत्मा के अभिलेख हैं। वे केवल घटनाओं की काल-रेखा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की मार्गदर्शिका हैं। पुराण धर्म, कर्म, भक्ति, न्याय और करुणा की स्थायी नैतिकता को संरक्षित करते हैं। वे मनुष्य को सत्ता से नहीं, संस्कृति से जोड़ते हैं; राजनीति से नहीं, अध्यात्म से जोड़ते हैं। इसलिए पुराण में “सही-गलत” का प्रश्न आधुनिक अकादमिक अर्थ में नहीं उठता वे जीवन का मूल्यबोध गढ़ते हैं। ब्राह्मण और सनातन परंपरा की नैतिक नींव इन्हीं ग्रंथों में सुरक्षित है।
आज की सार्वजनिक बहस में अक्सर इतिहास और पुराण को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, जो बौद्धिक रूप से भ्रामक है। इतिहास राष्ट्र की राजनीतिक स्मृति है, जबकि पुराण उसकी सांस्कृतिक आत्मा। इतिहास बताता है कि राज्य कैसे बने, गिरे और पुनर्जीवित हुए; पुराण बताते हैं कि समाज कैसे जीवित रहा, संकटों में भी कैसे अपनी पहचान बचाए रखी।
ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास-लेखन ने भारत को अक्सर पराजयों और विभाजनों की कथा के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि पुराणों ने इस भूमि को निरंतर आध्यात्मिक पुनर्जागरण की भूमि के रूप में देखा। जब-जब सत्ता टूटती रही, तब-तब संस्कृति खड़ी रही और यही पुराणों की ताकत है।
आज जब राष्ट्र अपनी पहचान को लेकर पुनर्विचार कर रहा है, तब हमें दोनों दृष्टियों की आवश्यकता है। हमें प्रमाणों पर आधारित इतिहास चाहिए, ताकि हम अतीत की गलतियों से सीख सकें; और हमें पुराण चाहिए, ताकि हम अपने नैतिक मूल्यों से न कटें। केवल इतिहास राष्ट्र बना सकता है, पर केवल पुराण सभ्यता बचा सकते हैं। दोनों मिलकर ही भारत की समग्र दृष्टि बनाते हैं।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि कौन बड़ा है इतिहास या पुराण बल्कि यह है कि हम दोनों को संतुलन में कैसे पढ़ें। इतिहास हमें सत्ता की कहानी देता है; पुराण हमें धर्म की चेतना देते हैं। इतिहास हमें बताता है कि हम कहाँ थे; पुराण बताते हैं कि हमें कहाँ जाना चाहिए।
