डेरा जगमालवाली में आयोजित हुआ सत्संग, संत बिरेंद्र सिंह जी ने आत्मचिंतन का दिया संदेश

 सिरसा कालांवाली( हरविन्द्र सिंह गिल)। डेरा जगमालवाली में आज सत्संग का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे । डेरा प्रमुख संत बिरेंद्र सिंह जी ने संगत को सत्संग का उपदेश दिया। संत जी ने कहा कि “काल ने अंदर की नकल बाहर पेश कर दी है। वह सभी जीवों को बाहर-ही-बाहर भटकाता रहता है। अंदर एक पहरेदार बैठा है, जो सिमरन नहीं करने देता और इंसान को दुनियावी कामों में उलझाए रखता है।”

संत जी ने समझाया कि जो भी महापुरुष और संत मालिक की दरगाह तक पहुँचे हैं, वे सभी एक ही बात कहते हैं कि बाहरी पाखंड के भीतर नहीं जाना है। उनका रास्ता सीधा होता है और वे इंसान को अपने-आप को जानने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि इंसान अपने-आप को जानने की कोई कोशिश नहीं करता, जबकि उसके भीतर एक अनमोल खजाना छिपा है। यह श्वास रूपी पूँजी सतगुरु ने देकर भेजी थी, लेकिन मनुष्य विषय-विकारों में फँसकर बैठ गया है। इस जन्म से छुटकारे का बंदोबस्त करना अत्यंत आवश्यक है।

संत बिरेंद्र सिंह जी ने महात्मा बुद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि बुद्ध ने लिखा है—“मैं सिखाने के लिए नहीं, जगाने के लिए आया हूँ। मैं मुक्ति दाता नहीं हूँ, मैं तो तुम्हें रास्ता दिखाने आया हूँ। तुम अपने दीपक स्वयं बनो।” संत जी ने कहा कि हमें दुखों से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि दुख हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं। दुनिया से विमुख होकर ही आध्यात्मिक मार्ग को चुना जा सकता है।

उन्होंने श्रीकृष्ण भगवान के कथन का भी उल्लेख किया कि भगवान अपने प्रिय भक्तों को तीन दात  प्रदान करते हैं—गरीबी, बीमारी और निरादरी। इन तीनों को कोई लेना नहीं चाहता, लेकिन ये अहंकार को तोड़ने के साधन हैं। संत जी ने शरीर के अहंकार से बचने की सीख देते हुए कहा कि हम सभी इस भ्रम में रहते हैं कि हमें यहाँ से जाना ही नहीं है, जबकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आज सोने के बाद कल सूरज देख भी पाएँगे या नहीं। इंसान का जाना तय है, फिर भी वह अहंकार में बैठा है।

सत्संग के अंत में संत जी ने संगत को व्यवहारिक जीवन में अमल करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि घर जाकर डायरी लगानी चाहिए | हम हर महीने सत्संग में आते हैं । घर जाकर डायरी में यह लिखना है कि सत्संग में आकर हमने क्या-क्या बदलाव किए—जैसे झूठ बोलना छोड़ा, किसी की निंदा या बुराई करना छोड़ा, भीतर से बदला लेने की भावना त्याग दी। संत जी ने कहा कि सत्संग में 1-2 घंटे जो शिक्षा मिलती है, उसका होमवर्क भी घर जाकर करना जरूरी है, नहीं तो असफल होने की संभावना बनी रहती है। एक-एक बुराई को भीतर से निकालने में उम्र निकल सकती है, इसलिए जो सत्संग में सुना जाए, उस पर जीवन में अमल करना ही सच्चा सत्संग है।

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