सपनों का पतंग...

लेखक: विनोद कुमार झा

गाँव के अंतिम सिरे पर स्थित उस छोटे से घर की कच्ची छत के ऊपर आसमान हमेशा खुला रहता था। मिट्टी की दीवारों और टपकती छत के बीच पला-बढ़ा अमन बचपन से ही उस आसमान को गौर से देखता आया था। शायद इसलिए नहीं कि वहाँ बादल थे, बल्कि इसलिए कि वहीं उसके सपनों की पतंग उड़ती थी।

मकर संक्रांति का दिन गाँव में उत्सव लेकर आता था। हर छत रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाती, लेकिन अमन की पतंग हमेशा अलग दिखती साधारण काग़ज़ की, बिना चमक-दमक के, फिर भी सबसे ऊँची। वह पतंग अमन खुद बनाता था पुरानी कॉपियों के काग़ज़, बांस की पतली तीलियाँ और आटे की लेई से। उसमें वह अपने सपनों को चुपचाप चिपका देता था।

अमन के पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ दूसरों के घरों में काम करती थीं। घर में अभाव था, पर हौसले की कमी नहीं। माँ अक्सर कहती थीं “बेटा, सपने पतंग की तरह होते हैं। अगर डोर मज़बूत हो, तो हवा भी साथ देती है।”

स्कूल में अमन पढ़ाई में तेज़ था, लेकिन हालात उसके विरुद्ध खड़े रहते। कई बार फीस न भर पाने पर उसे अपमान का सामना करना पड़ा। फिर भी उसने कभी शिकायत नहीं की। किताबें उसकी सबसे बड़ी दौलत थीं और छत उसका सबसे प्रिय स्थान।

समय के साथ परिस्थितियाँ और कठिन होती चली गईं। पिता की तबीयत बिगड़ने लगी। घर की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं। आस-पड़ोस के लोगों ने सलाह दी कि अमन पढ़ाई छोड़ दे और काम में हाथ बँटाए।

उस रात अमन देर तक छत पर बैठा रहा। हाथ में अधूरी पतंग थी और सामने तेज़ बहती हवा। वह पहली बार डरा हुआ था—डोर छोड़ देने के डर से नहीं, सपनों के टूट जाने के डर से।

माँ उसके पास आईं और शांत स्वर में बोलीं, “डरने से पतंग कटती है, उड़ाने से नहीं।” यही वाक्य अमन की जीवन-रेखा बन गया।

अमन ने दिन में छोटे-मोटे काम किए और रात में पढ़ाई। नींद कम हुई, थकान बढ़ी, पर इरादे और मज़बूत होते गए। एक शिक्षक ने उसकी लगन पहचान ली और उसे मार्गदर्शन दिया।जब बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया, अमन पूरे क्षेत्र में प्रथम आया। उस दिन गाँव की हर छत पर पतंग थी, लेकिन सबसे ऊँची उड़ान उस लड़के की थी, जो बिना शोर किए आगे निकल गया था।

शहर में कदम रखते ही अमन को समझ आ गया कि यहाँ की हवाएँ अलग हैं तेज़, बेरहम और प्रतिस्पर्धा से भरी। बड़े कॉलेज, नई भाषा, नए लोग कई बार उसे अपनी जड़ें बोझ लगने लगीं। लेकिन जब भी हिम्मत डगमगाती, उसे अपनी काग़ज़ की पतंग याद आ जाती।

संघर्ष का रास्ता आसान नहीं था। असफलताएँ मिलीं, प्रतियोगी परीक्षाओं में हार मिली। एक बार तो लगा जैसे सपनों की डोर कट गई हो। एक शाम नदी किनारे बैठा अमन बच्चों को पतंग उड़ाते देख रहा था। एक पतंग कटकर ज़मीन पर आ गिरी। एक छोटा बच्चा उसे उठाकर बोला, “कट गई तो क्या हुआ, फिर से जोड़ लेंगे।”

अमन मुस्कुरा उठा। उस क्षण उसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझ आ गया सपने कटते नहीं, बस नए सिरे से बाँधे जाते हैं।कुछ वर्षों बाद अमन जब अपने गाँव लौटा, तो उसके हाथ में नौकरी का नियुक्ति पत्र था। वह अफ़सर बन चुका था, लेकिन उसकी आँखों में वही पुराना आसमान था।

मकर संक्रांति के दिन उसने बच्चों को पतंगें बाँटीं और कहा, “ऊँचा उड़ना है तो डर से ऊपर उठना सीखो।” शाम होते-होते आसमान में एक पतंग फिर से लहरा रही थी। वह सिर्फ़ काग़ज़ और बांस की नहीं थी वह विश्वास, परिश्रम और उम्मीद से बनी थी।

यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। क्योंकि जहाँ कहीं भी कोई बच्चा खुले आसमान की ओर देखता है,वहाँ सपनों का पतंग आज भी उड़ रहा है। सपने पतंग की तरह होते हैं हवा विरोधी हो सकती है, डोर कमजोर लग सकती है, लेकिन हाथ में विश्वास हो तो उड़ान निश्चित है।



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