गणतंत्र की यात्रा: आज़ादी से डिजिटल भारत तक

 विनोद कुमार झा

26 जनवरी केवल तिरंगे को सलामी देने या परेड देखने का दिन नहीं है; यह भारत की सामूहिक चेतना, आत्मसम्मान और भविष्य के संकल्प का उत्सव है। यह वही दिन है जब सदियों की दासता के बाद भारत ने स्वयं को संविधान के माध्यम से एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणराज्य राष्ट्र घोषित किया। इतिहास की पीड़ा, पौराणिक मूल्यों की विरासत, आज़ादी के संघर्ष की बलिदानी गाथाएँ और आधुनिक भारत की आकांक्षाएँ सब इस एक तिथि में सिमट आती हैं।

आज, जब भारत डिजिटल क्रांति, युवा ऊर्जा और वैश्विक नेतृत्व की दहलीज़ पर खड़ा है, 26 जनवरी हमें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी और भविष्य की दिशा का बोध कराता है। यह दिन सवाल भी करता है क्या हम संविधान की आत्मा को जी पा रहे हैं? क्या विकास की रफ्तार सामाजिक न्याय, शिक्षा, सुरक्षा और मानवीय मूल्यों के साथ संतुलित है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशने का अवसर गणतंत्र दिवस देता है।

भारत की आत्मा उसकी पौराणिक परंपराओं में बसती है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों ने धर्म, कर्तव्य, न्याय और लोककल्याण की अवधारणाओं को जन्म दिया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना ने भारत को विश्व-बंधुत्व का संदेशवाहक बनाया। यही सांस्कृतिक जड़ें हमारे संविधान के मूल्यों न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का नैतिक आधार बनीं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने शून्य से शुरुआत की। सीमित संसाधन, विभाजन का दर्द और विकास की विशाल चुनौतियाँ थीं। फिर भी लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण, पंचवर्षीय योजनाएँ, हरित क्रांति, औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक अनुसंधान ने देश को आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर किया। संविधान ने सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस आधार दिया आरक्षण, मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों ने वंचितों को मुख्यधारा से जोड़ा।

इक्कीसवीं सदी का भारत तकनीक और नवाचार की शक्ति से आगे बढ़ रहा है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई, आधार, जन-धन, और ई-गवर्नेंस ने शासन को पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाया। आज का युवा स्टार्टअप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी में वैश्विक पहचान बना रहा है। डिजिटाइजेशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार को गाँवों तक पहुँचाया है ऑनलाइन कक्षाएँ, टेलीमेडिसिन और डिजिटल भुगतान इसके प्रमाण हैं।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका युवा वर्ग है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) ने कौशल-आधारित, बहुभाषी और अनुसंधान-उन्मुख शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया है। सामाजिकता के स्तर पर महिला सशक्तिकरण, स्टार्टअप संस्कृति और स्वयंसेवी आंदोलनों ने समाज में सकारात्मक बदलाव को गति दी है। युवा आज केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजक बन रहा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, सशक्त सीमाएँ और साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। कूटनीति में भारत की भूमिका संतुलित और प्रभावी रही है चाहे वैश्विक मंचों पर शांति की पहल हो या रणनीतिक साझेदारियाँ। ‘एक्ट ईस्ट’, ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनकर भारत ने अपनी साख मजबूत की है।

ग्रामीण भारत में सड़क, बिजली, जल, स्वच्छता और डिजिटल कनेक्टिविटी ने जीवन की गुणवत्ता बदली है। स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष्मान भारत, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का सुदृढ़ीकरण और जनऔषधि जैसी योजनाएँ प्रभावी सिद्ध हुई हैं। वहीं, शहरों में स्मार्ट सिटी मिशन, बेहतर सड़कों, विद्यालयों और सार्वजनिक परिवहन ने आधुनिक शहरी जीवन को आकार दिया है।

भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका संविधान है, जो केवल शासन का दस्तावेज़ नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का जीवंत घोषणापत्र है। जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीय विषमताओं से जूझते समाज में संविधान ने समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार सुनिश्चित किया। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन ने लोकतंत्र को स्थायित्व दिया है। आज आवश्यकता है कि नागरिक संवैधानिक मूल्यों को केवल अधिकारों तक सीमित न रखें, बल्कि कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से अपनाएँ।

डिजिटाइजेशन ने जहाँ शासन को तेज़ और पारदर्शी बनाया है, वहीं सूचना की विश्वसनीयता एक नई चुनौती बनकर उभरी है। सोशल मीडिया के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। फेक न्यूज़, साइबर अपराध और डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दे लोकतंत्र की नई कसौटियाँ हैं। ऐसे में डिजिटल साक्षरता, साइबर कानून और नैतिक पत्रकारिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

विकास की दौड़ में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना गणतंत्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट है। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ भारत और हरित विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं, किंतु जनभागीदारी के बिना ये प्रयास अधूरे हैं। सतत विकास ही सच्ची राष्ट्र-निर्माण की पहचान है।

कोविड महामारी ने यह स्पष्ट किया कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, मेडिकल शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और पोषण योजनाएँ भारत को सामाजिक सुरक्षा की दिशा में आगे ले जा रही हैं। मानव केंद्रित विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित और सुरक्षित नागरिकों का निर्माण है। आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है, लेकिन यह आत्मविश्वास तभी स्थायी होगा जब शासन और जनता के बीच विश्वास बना रहे। लोकतंत्र की शक्ति चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, जवाबदेही और सहभागिता में निहित है। 26 जनवरी हमें यह स्मरण कराता है कि गणतंत्र केवल सत्ता का ढाँचा नहीं, बल्कि साझा सपनों और सामूहिक उत्तरदायित्व की यात्रा है।

26 जनवरी हमें केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का स्मरण भी कराता है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक संवैधानिक मूल्यों का पालन करें सहिष्णुता, संवाद और सहभागिता। विकास का लक्ष्य समावेशी हो, तकनीक मानवीय बने और प्रगति पर्यावरण-संवेदनशील।गणतंत्र भारत की यात्रा इतिहास, पौराणिकता, आधुनिकता और डिजिटल भविष्य का संगम है। 26 जनवरी हमें यह विश्वास दिलाता है कि जब नीति, नीयत और नवाचार एक साथ चलते हैं, तब राष्ट्र न केवल आगे बढ़ता है, बल्कि विश्व के लिए प्रेरणा भी बनता है। यही हमारे गणतंत्र का सार है सशक्त, समावेशी और सतत भारत।

जय हिन्द!

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