लेखक: विनोद कुमार झा
शहर के पुराने हिस्से में स्थित वह चाय की दुकान अब भी वहीं है थोड़ी झुकी हुई छत, दीवारों पर पान की पीक के धब्बे और कोने में टँगा एक कैलेंडर, जिसकी तारीखें बदलती रहीं, पर दुकान की पहचान नहीं बदली। कभी यह दुकान पाँच दोस्तों की अनौपचारिक संसद हुआ करती थी। यहीं बैठकर देश की राजनीति तय होती थी, यहीं से दुनिया की समस्याओं का हल निकलता था और यहीं ज़िंदगी के सबसे निजी दुख-सुख बिना किसी झिझक के साझा होते थे।
वे पाँच दोस्त राजेश, अमित, संजय, रमेश और मोहन अलग-अलग पेशों में थे, लेकिन समय निकालकर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते थे। तब मोबाइल फोन भी था, लेकिन सिर्फ कॉल के लिए। फोन बजता तो बातचीत रुकती थी, आज बातचीत रुकती ही इसलिए है क्योंकि फोन बज रहा होता है।
समय के साथ ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं, काम का दबाव बढ़ा, जीवन की रफ्तार तेज़ हुई। पर सबसे बड़ा बदलाव आया इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ। अब मिलने की योजना भी आमने-सामने नहीं बनती, बल्कि व्हाट्सएप ग्रुप में तय होती है। “कहाँ मिलना है” से ज़्यादा अहम हो गया “नेटवर्क आएगा या नहीं।”
आज जब पाँचों दोस्त उसी चाय की दुकान पर मिलते हैं, तो दृश्य बदला हुआ है। कुर्सियाँ वही हैं, चाय वही है, लेकिन आँखें झुकी हुई हैं मोबाइल स्क्रीन पर। राजेश कैमरा ऑन कर लेता है, क्योंकि हर पल अब “कंटेंट” है।
अमित किसी ट्रेंडिंग मुद्दे पर ऑनलाइन बहस में व्यस्त है।
संजय शेयर बाज़ार के ग्राफ़ में भविष्य ढूँढ रहा है।
रमेश ऑफिस के मैसेज का जवाब देते हुए बीच-बीच में सिर हिलाता है।
मोहन सबको रिकॉर्ड कर रहा है “यादों के लिए।”विडंबना यह है कि यादें अब जी नहीं जातीं, बस रिकॉर्ड कर ली जाती हैं।
पहले जब कोई दोस्त देर से आता था, तो सब मिलकर उसकी खिंचाई करते थे। आज कोई देर से आए, तो किसी को फर्क नहीं पड़ता सब अपने-अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। पहले चुप्पी भी साझा होती थी, आज चुप्पी असहज लगती है, इसलिए हम उसे स्क्रॉलिंग से भर देते हैं।
यह कहानी केवल पाँच दोस्तों की नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जहाँ संवाद की जगह सूचना ने ले ली है और संबंधों की जगह प्रतिक्रियाओं ने। हम यह जानने में ज़्यादा रुचि रखते हैं कि किस पोस्ट पर कितने लाइक आए, बजाय यह पूछने के कि सामने बैठे दोस्त की आँखों में उदासी क्यों है।
तकनीक ने हमें जोड़ा है, इसमें कोई संदेह नहीं। दूर बैठे अपनों से बात आसान हुई है। लेकिन पास बैठे लोगों से दूरी भी उतनी ही बढ़ी है। अब हम हालचाल पूछने के बजाय स्टेटस देख लेते हैं और समझ लेते हैं कि सब ठीक है। दुख भी अब निजी नहीं रहा वह पोस्ट बनकर सार्वजनिक हो गया है।
चाय की दुकान पर लगी पुरानी घड़ी लगातार टिक-टिक कर रही है। समय किसी का इंतज़ार नहीं करता। शायद वही घड़ी गवाही दे रही है कि इंसान ने समय बचाने के चक्कर में रिश्तों पर खर्च होने वाला समय कम कर दिया है।
पाँचों दोस्त उठने से पहले एक सेल्फी लेते हैं। मुस्कान कैमरे के लिए तैयार है। तस्वीर सोशल मीडिया पर जाती है लाइक, कमेंट और तारीफ़ों की बौछार होती है। बाहर से देखने वालों को लगता है दोस्ती ज़िंदा है।
लेकिन सच यह है कि दोस्ती ज़िंदा रखने के लिए सिर्फ मिलना काफी नहीं, उपस्थित होना ज़रूरी है मन से, ध्यान से, संवेदना से।
यह सवाल आज हर परिवार, हर दोस्ती और हर समाज के सामने खड़ा है, क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं या तकनीक हमें उपयोग कर रही है?
शायद समाधान मोबाइल को छोड़ने में नहीं, बल्कि उसे सीमित करने में है। कभी-कभी फोन को जेब में ही रहने देना, नोटिफिकेशन को अनदेखा करना और सामने बैठे इंसान की बात पूरी सुनना यही आज का सबसे बड़ा सामाजिक सुधार हो सकता है।
क्योंकि अगर बातचीत पूरी तरह स्क्रीन पर सिमट गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारे समय को यादों से नहीं, डेटा से पहचानेंगी।और तब शायद वही पुरानी चाय की दुकान रह जाएगी,पर दोस्ती एक अधूरी कहानी बनकर।
