विनोद कुमार झा
सुबह की हल्की धूप जब शहर की पुरानी गलियों पर उतरती थी, तो लगता था जैसे हर दीवार पर किसी अनकहे सपने की परछाईं टंगी हो। इन्हीं गलियों में पला-बढ़ा था नितिन एक साधारण परिवार का असाधारण सपना देखने वाला लड़का। पिता रेलवे में क्लर्क थे और मां घर संभालते हुए बच्चों के भविष्य की सिलाई-बुनाई करती रहती थीं। सीमित साधनों में पलने के बावजूद नितिन के भीतर एक अनोखी आग थी कुछ कर दिखाने की, अपने नाम के साथ अपने शहर का नाम रोशन करने की।
नितिन का सपना था इंजीनियर बनने का। यह सपना उसने किसी आलीशान कोचिंग सेंटर में नहीं, बल्कि स्कूल की टूटी-फूटी प्रयोगशाला में जन्म लिया था, जहां पुराने उपकरणों के बीच खड़े होकर वह चीज़ों को खोलता, जोड़ता और समझने की कोशिश करता। शिक्षक कहते, “संसाधन नहीं हैं,” और नितिन मुस्कुराकर जवाब देता, “सर, जिज्ञासा ही सबसे बड़ा संसाधन है।” यही जिज्ञासा उसे हर दिन एक कदम आगे बढ़ाती।
बारहवीं की परीक्षा के बाद असली संघर्ष शुरू हुआ। बड़े शहरों की कोचिंग, महंगे फॉर्म और लगातार बढ़ता प्रतिस्पर्धा का दबाव सब कुछ डराने वाला था। पिता की मासिक आय सीमित थी। घर में बैठकर बजट पर चर्चा होती, तो मां की आंखें भर आतीं। नितिन तय किया कि वह अपने सपने का बोझ परिवार पर नहीं बनने देगा। उसने शाम को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, सुबह अखबार बांटे और रात में पढ़ाई की। थकान से आंखें जलतीं, लेकिन सपनों की रोशनी बुझने नहीं देती।
पहली बार जब परीक्षा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, तो निराशा ने घेर लिया। अखबारों में छपती टॉपरों की तस्वीरें उसे चुभतीं। एक रात उसने किताबें बंद कर दीं और छत पर बैठकर देर तक आसमान देखा। तारों की चुप्पी में उसे अपनी मां की आवाज़ सुनाई दी “सपने हार मानने के लिए नहीं होते।” अगले ही दिन उसने नए सिरे से शुरुआत की। रणनीति बदली, कमजोरियों पर काम किया और खुद पर भरोसा लौटाया।
दूसरी कोशिश में सफलता ने दस्तक दी। चयन पत्र हाथ में आते ही नितिन की आंखें नम हो गईं। घर में खुशी का सैलाब उमड़ पड़ा। मां ने मिठाई बांटी, पिता ने पहली बार बेटे को गले लगाया और कहा, “आज मुझे तुम पर गर्व है।” लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी। बड़े संस्थान में पढ़ाई आसान नहीं थी। प्रतिस्पर्धा तीखी थी, संसाधन बेहतर थे, पर अपेक्षाएं भी ऊंची। नितिन ने यहां भी अपने मूल मंत्र को नहीं छोड़ा मेहनत, ईमानदारी और सीखने की भूख।
कॉलेज के दिनों में उसने तकनीक को समाज से जोड़ने का सपना देखा। पढ़ाई के साथ-साथ वह गांवों में जाकर सौर ऊर्जा और जल संरक्षण पर काम करने लगा। दोस्तों ने कहा, “इससे क्या मिलेगा?” नितिन का जवाब था, “अगर मेरा ज्ञान किसी की जिंदगी आसान बना सके, तो वही सबसे बड़ी उपलब्धि है।” एक प्रोजेक्ट ने उसे पहचान दिलाई कम लागत वाला सोलर-पंप, जिससे छोटे किसानों की सिंचाई आसान हो सकी। यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में चुना गया।
यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया। एक स्टार्टअप के लिए निवेश मिला, टीम बनी और जिम्मेदारियां बढ़ीं। असफलताएं भी आईं तकनीकी दिक्कतें, वित्तीय दबाव और बाजार की कठोर सच्चाइयां। कई बार लगा कि सब कुछ बिखर जाएगा। लेकिन नितिन ने हार नहीं मानी। उसने सीखना जारी रखा, गलतियों को स्वीकार किया और समाधान खोजे। धीरे-धीरे उसका प्रयास रंग लाने लगा। किसानों की आय बढ़ी, पानी की बचत हुई और परियोजना को सरकारी मान्यता मिली।
आज नितिन का नाम सफलता की मिसाल बन चुका है। वही लड़का, जो कभी गलियों में सपने टांगे फिरता था, अब हजारों घरों में उम्मीद की रोशनी पहुंचा रहा है। वह अक्सर अपने शहर लौटता है, स्कूल की उसी प्रयोगशाला में बच्चों से मिलता है और कहता है “सपने बड़े हों, तो रास्ते खुद बनते हैं।” उसकी कहानी अखबारों में छपती है, मंचों पर सुनाई जाती है, लेकिन वह अब भी खुद को सीखने वाला मानता है।
‘सपने बने हकीकत’ सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की आवाज़ है जो सीमाओं के भीतर रहते हुए असीम संभावनाएं देखते हैं। यह कहानी बताती है कि सपने तब सच होते हैं, जब उनमें मेहनत की स्याही, धैर्य का काग़ज़ और विश्वास की मोहर लगी हो। परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अगर इरादे मजबूत हों, तो हर सपना एक दिन हकीकत बन ही जाता है।
