नकली आदमी, असली पहचान...

 विनोद कुमार झा

  • अमित को लोग नकली कहते थे। 
  • कोई कहता, “ये आदमी जैसा दिखता है वैसा है नहीं।”
  •  कोई कहता, “इसकी हँसी में सच्चाई नहीं।” 
  • किसी को लगता, यह आदमी हर चेहरे के साथ अलग रंग ओढ़ लेता है।

शहर के बीचोंबीच खड़ा वह पुराना सा चौराहा, जहाँ हर शाम लोगों की भीड़ उमड़ आती थी। चाय की दुकानों से उठती भाप, ऑटो और बसों का शोर, और अख़बार बेचने वाले की आवाज़ यहीं से शुरू होती है इस कहानी की पहली साँस। इसी भीड़ में एक आदमी रोज़ दिखाई देता था सादा कपड़े, साधारण चेहरा, आँखों में अजीब सी शांति। लोग उसे जानते थे, पर असल में कोई नहीं जानता था। नाम था अमित।

अमित को लोग नकली कहते थे। कोई कहता, “ये आदमी जैसा दिखता है वैसा है नहीं।” कोई कहता, “इसकी हँसी में सच्चाई नहीं।” किसी को लगता, यह आदमी हर चेहरे के साथ अलग रंग ओढ़ लेता है। वह चायवाले से ऐसे बात करता जैसे वर्षों का दोस्त हो, पुलिसवाले से ऐसे जैसे पुरानी जान-पहचान हो, और गरीब से ऐसे जैसे उसका अपना दर्द हो। लोग कहते नकली आदमी है।

पर नकली क्यों? क्योंकि अमित हर किसी के सामने वही बन जाता था जो सामने वाला देखना चाहता था। किसी के दुख में दुखी, किसी की खुशी में खुश, किसी के ग़ुस्से में शांत, किसी की चालाकी में भोला। उसे देखकर लगता था जैसे उसके भीतर कोई स्थायी चेहरा ही नहीं।

अमित की उम्र कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता था। कोई कहता पैंतीस के आसपास, कोई चालीस। वह किराए के एक छोटे से कमरे में रहता था पुरानी इमारत की तीसरी मंज़िल पर। कमरे में एक लोहे का पलंग, एक मेज़, कुछ किताबें और दीवार पर टँगी माँ की धुँधली तस्वीर। उस तस्वीर के सामने अमित हर सुबह कुछ पल खड़ा रहता, मानो खुद से नहीं, किसी और से बात कर रहा हो।

उसकी दिनचर्या साधारण थी। सुबह अख़बार पढ़ना, दोपहर में शहर की गलियों में यूँ ही टहलना, शाम को उसी चौराहे पर लौट आना। कोई तय काम नहीं, कोई स्थायी मंज़िल नहीं। लोग पूछते “करते क्या हो?”वह मुस्कुरा देता “ज़िंदगी।”

अमित को नकली कहने वालों में सबसे आगे था रघु चायवाला। चौराहे की सबसे पुरानी दुकान उसी की थी। “देखो भाई,” रघु अकसर कहता, “ये आदमी सबका है, इसलिए किसी का नहीं। आज हँसेगा, कल चुप रहेगा। असली आदमी ऐसा नहीं होता।”

पर रघु यह नहीं जानता था कि जब उसका बेटा बीमार पड़ा था और दवाइयों के पैसे नहीं थे, तब रात के अँधेरे में वही अमित उसके काउंटर के नीचे लिफ़ाफ़ा रख गया था बिना नाम, बिना पहचान के।

पुलिस चौकी के हवलदार वर्मा को भी अमित पर शक रहता था। “ज़रूरत से ज़्यादा शरीफ़ आदमी या तो बहुत बड़ा झूठा होता है, या बहुत बड़ा ज़ख़्मी,” वर्मा कहा करता था। वर्मा सही था पर अधूरा।

अमित के भीतर एक ऐसा शहर बसा था, जो इस शहर से कहीं ज़्यादा शोरगुल वाला था। उसका असली नाम अमित नहीं था।
वह नाम उसने खुद चुना था क्योंकि उसमें उम्मीद की हल्की सी गंध थी। असल में वह कभी आदित्य था एक पत्रकार। सच लिखने वाला। बहुत ज़्यादा सच। दस साल पहले की बात थी।

आदित्य ने शहर के सबसे बड़े बिल्डर, सबसे ताक़तवर नेता और सबसे खामोश सिस्टम के बीच की कड़ी उजागर की थी। उसकी रिपोर्ट छपी पहले पन्ने पर। अगले ही हफ्ते अख़बार ने माफ़ी छापी। और उसी रात उसकी माँ एक सड़क हादसे में मारी गई। हादसा… काग़ज़ों में।

आदित्य समझ गया था सच की कीमत सिर्फ़ नौकरी नहीं होती। कभी-कभी पहचान भी देनी पड़ती है। उसने आदित्य को वहीं छोड़ दिया, उसी चौराहे पर और बन गया अमित। एक ऐसा आदमी, जिसे कोई पूरा न जाने। क्योंकि जो पूरा जाना जाता है, वही सबसे पहले तोड़ा जाता है।

अमित ने नकली होना सीख लिया था। असल में यह उसका कवच था। जब आप हर चेहरे के हिसाब से ढल जाते हैं तो कोई आपको पकड़ नहीं पाता। कोई आपके भीतर झाँक नहीं पाता। लोग इसे धोखा कहते हैं पर यह आत्मरक्षा होती है।

इसी बीच शहर में एक नैना नाम की लड़की आई वह लोकल अख़बार में नई रिपोर्टर थी। उसकी तेज़ आँखें, सीधे सवाल, और झूठ से चिढ़। उसे अमित शुरू से अजीब लगा। “आप असल में हैं कौन?” उसने एक दिन सीधे पूछ लिया। अमित हँसा। “जो आप समझ लें।”

नैना ने महसूस किया यह आदमी जवाब नहीं छुपाता, बस बिखेर देता है। वह रोज़ उससे बात करने लगी और धीरे-धीरे, अमित की नकली परतों में दरारें आने लगीं। क्योंकि कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनसे भागा नहीं जा सकता।

एक दिन नैना ने पुरानी फाइलें खंगालते हुए दस साल पुरानी वह रिपोर्ट पढ़ी। नाम पढ़कर वह चौंकी आदित्य वर्मा। तस्वीर देखी और साँस रुक गई। वही आँखें। वही शांति। नकली आदमी… असली पहचान। उस शाम नैना चौराहे पर आई। अमित वहीं था। “आदित्य,” उसने कहा। पहली बार अमित की मुस्कान टूटी।

“मैं नकली नहीं हूँ,” अमित धीमे बोला, “मैं बस टूटा हुआ हूँ।” उस रात अमित ने सब बताया सच, डर, माँ, और वह पहचान जिसे उसने दफना दिया था। नैना चुप सुनती रही। “तो अब?” नैना ने पूछा। अमित ने चौराहे की भीड़ की ओर देखा “अब शायद फिर से असली बनने का समय है।”

अगले हफ्ते नैना की रिपोर्ट छपी। सिस्टम फिर हिला। इस बार अमित ने छुपने से इनकार कर दिया। क्योंकि अब वह अकेला नहीं था। चौराहा आज भी वही है। चाय की भाप, बसों का शोर, अख़बार की आवाज़ पर अब लोग कहते हैं “वो आदमी असली है।”अमित मुस्कुरा देता है, क्योंकि वह जानता है कभी-कभी नकली कहलाना,असल में खुद को बचाए रखने की सबसे सच्ची कोशिश होती है। और असली पहचान हर किसी को बताने के लिए नहीं होती।

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