ठंड और परिंदा...

 -जीवन कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं

लेखक: विनोद कुमार झा

सर्दियों की पहली सुबह हमेशा किसी पुराने गीत की तरह आती है धीमी, उदास और भीतर तक उतर जाने वाली। कोहरे की चादर में लिपटी धरती पर जब ठंडी हवा चलती है, तो पेड़ों की पत्तियाँ भी सिहर उठती हैं। इसी सिहरन के बीच, शहर के एक पुराने बरगद पर बैठा एक नन्हा-सा परिंदा अपने पंखों को समेटे ठंड से लड़ रहा था। उसके लिए यह ठंड केवल मौसम नहीं थी, बल्कि जीवन की एक कठोर परीक्षा थी।

यह परिंदा किसी कहानी का नायक नहीं था, न ही किसी पौराणिक कथा का पात्र। वह बस एक साधारण चिड़िया थी नामहीन, अनदेखी, और अक्सर मनुष्यों की नजरों से ओझल। लेकिन उसकी आंखों में जिजीविषा की चमक थी। रात भर तापमान गिरता रहा था। शहर की ऊँची इमारतों के बीच बहती ठंडी हवा ने उसके पंखों की गर्मी छीन ली थी। दाना ढूंढना मुश्किल था, पानी बर्फ-सा ठंडा हो चुका था, और आसमान में सूरज की किरणें जैसे देर से आने का वादा कर रही थीं।

ठंड केवल परिंदे के शरीर को नहीं, उसके आसपास के पूरे जीवन को जकड़ चुकी थी। सड़कों पर लोग मोटे कपड़ों में सिमटे हुए थे, चाय की दुकानों पर भाप उठ रही थी, और अलाव के चारों ओर हाथ सेंकते चेहरे लाल हो रहे थे। लेकिन इस भीड़भाड़ के बीच, उस परिंदे की पीड़ा पर शायद ही किसी की नजर गई। मनुष्य अपनी सुविधाओं में उलझा हुआ था, हीटर, रजाई और गर्म कमरों के बीच। परिंदे के पास न रजाई थी, न ही कोई दीवार जो ठंडी हवा को रोक सके।

सुबह के करीब, जब सूरज की हल्की-सी किरण बरगद की डाल पर पड़ी, परिंदे ने पंख फड़फड़ाए। यह फड़फड़ाहट उम्मीद की थी, जैसे जीवन ने ठंड से हार मानने से इनकार कर दिया हो। वह उड़कर पास के एक आंगन में पहुंचा, जहां एक बूढ़ी महिला हर रोज चावल के दाने बिखेरती थी। यह महिला शायद नहीं जानती थी कि उसका यह छोटा-सा काम किसी परिंदे के लिए जीवनदान बन सकता है। परिंदे ने दाने चुगे, और हर दाने के साथ उसमें थोड़ी-सी गर्मी लौट आई।

ठंड और परिंदे का यह संघर्ष केवल प्रकृति की कहानी नहीं है, यह हमारे समाज का भी आईना है। जैसे ठंड कमजोर परिंदों को ज्यादा प्रभावित करती है, वैसे ही समाज की सर्द हवाएं हमेशा कमजोर तबकों को सबसे पहले और सबसे ज्यादा चोट पहुंचाती हैं। झुग्गियों में रहने वाले लोग, खुले आसमान के नीचे सोने वाले मजदूर, और वे सभी जिनके पास साधन नहीं, उनके लिए ठंड केवल मौसम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की लड़ाई है।

परिंदे की तरह, वे भी छोटे-छोटे सहारे ढूंढते हैं किसी अलाव की गर्मी, किसी अनजान हाथ की मदद, या किसी दयालु मन का स्पर्श। और ठीक उसी तरह, हमारी छोटी-सी संवेदनशीलता, एक कटोरी दाना, एक कंबल, या एक कप गर्म चाय किसी की जिंदगी में उजाला भर सकती है।

दोपहर तक सूरज तेज हुआ। ठंड कुछ ढीली पड़ी, और परिंदा फिर से उड़ने लगा। अब उसके पंखों में पहले जैसी सुस्ती नहीं थी। उसने आसमान की ओर देखा, जैसे कहना चाहता हो कि जीवन कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। ठंड आएगी, जाएगी, लेकिन उड़ने की चाह अगर जिंदा है, तो परिंदा कभी हार नहीं मानता।

‘ठंड और परिंदा’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी और एक उम्मीद है। चेतावनी इस बात की कि प्रकृति और समाज की कठोरताएं सबसे पहले कमजोरों को प्रभावित करती हैं। और उम्मीद इस बात की कि मानवीय संवेदना, चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, किसी के लिए पूरी दुनिया बन सकती है।

जब अगली बार ठंडी हवा आपको सिहरा दे, तो किसी परिंदे, किसी जरूरतमंद इंसान को याद कीजिए और शायद, थोड़ा-सा हाथ बढ़ाइए। यही गर्मी है, जो ठंड से बड़ी होती है।

इति।

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