सफेदपोश आतंकवाद और शिक्षा की आत्मा

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा उदयपुर में व्यक्त की गई चिंता केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। उन्होंने जिस “सफेदपोश आतंकवाद” की बात की, वह आज के समय की सबसे भयावह सच्चाइयों में से एक बनता जा रहा है। यह वह आतंकवाद है, जो अनपढ़ता या पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि डिग्रियों, तकनीकी ज्ञान और तथाकथित बौद्धिक श्रेष्ठता की आड़ में पनप रहा है। दिल्ली में हुए कार बम विस्फोट का उदाहरण देते हुए रक्षा मंत्री ने जिस कटु सत्य की ओर इशारा किया, वह झकझोरने वाला है अपराधी उच्च शिक्षित थे, डॉक्टर थे, जो कलम से आरएक्स लिखते थे, लेकिन उनके हाथों में आरडीएक्स था। यह विरोधाभास इस बात को उजागर करता है कि केवल ज्ञान अर्जित कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि ज्ञान के साथ मूल्य, नैतिकता और चरित्र का विकास न हो, तो वही शिक्षा समाज के लिए घातक बन सकती है।

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा व्यावसायिक सफलता तक सीमित होता जा रहा है। अंक, डिग्री, पैकेज और पद यही सफलता के पैमाने बन गए हैं। लेकिन राजनाथ सिंह ने ठीक ही कहा कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल समृद्धि नहीं, बल्कि सदाचार, कर्तव्यबोध और मानवीय संवेदनाओं का विकास होना चाहिए। ज्ञान से योग्यता आती है, योग्यता से समृद्धि, लेकिन सच्चा सुख और स्थायित्व केवल धर्म और नैतिकता से ही संभव है। यहां धर्म का अर्थ किसी पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि कर्तव्य, जिम्मेदारी और सही-गलत के विवेक से है। यह भी चिंताजनक है कि उच्च शिक्षित लोग समाज और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। इसका मूल कारण बुद्धि और विवेक का अभाव है। रक्षा मंत्री का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आतंकवादी होना अशिक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि विवेकहीन बुद्धि का परिणाम है। डिग्रियां सोचने की क्षमता नहीं देतीं, यदि शिक्षा विवेक और संवेदना से शून्य हो।

इस संदर्भ में शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि हो जाती है। भारतीय समाज में शिक्षक केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के सूत्रधार रहे हैं। इतिहास गवाह है कि बड़े सामाजिक परिवर्तन शिक्षकों के मार्गदर्शन से ही संभव हुए हैं। आज आवश्यकता है कि शिक्षक विद्यार्थियों में आत्मसम्मान और अहंकार के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझाएं। आत्मसम्मान व्यक्ति को मजबूत बनाता है, जबकि अहंकार उसे विनाश की ओर ले जाता है। उदार सोच, व्यापक दृष्टि और मानवीय हृदय ही सच्ची खुशी का आधार हैं। रक्षा मंत्री द्वारा रक्षा स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी विकास की चर्चा यह संकेत देती है कि भारत प्रगति की सही दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन यह प्रगति तभी सार्थक होगी, जब तकनीक का उपयोग मानवीय कल्याण के लिए हो, न कि विनाश के लिए। तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना तभी सुरक्षित है, जब उसकी नींव नैतिक मूल्यों पर टिकी हो।

अंततः, सफेदपोश आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए केवल कानून या सुरक्षा तंत्र पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए शिक्षा की आत्मा को पुनर्जीवित करना होगा—जहां डिग्री के साथ बुद्धि, ज्ञान के साथ विवेक और सफलता के साथ जिम्मेदारी का समावेश हो। तभी एक सशक्त, सुरक्षित और नैतिक भारत का निर्माण संभव है।

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