असम की पहचान, विकास और राजनीति का संगम

 विनोद कुमार झा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का असम में दिया गया हालिया बयान केवल एक चुनावी अपील भर नहीं है, बल्कि यह राज्य की पहचान, सुरक्षा और विकास से जुड़े उन सवालों को सामने लाता है, जो दशकों से असम की राजनीति और समाज को मथते रहे हैं। घुसपैठ, सांस्कृतिक संरक्षण और विकास—इन तीनों मुद्दों के इर्द-गिर्द असम का सार्वजनिक विमर्श लंबे समय से घूमता रहा है।

अमित शाह ने अपने संबोधन में असम के उस दौर की याद दिलाई, जब राज्य बंद, नाकाबंदी, उग्रवाद और हिंसा से जूझ रहा था। यह तथ्य निर्विवाद है कि एक समय असम अस्थिरता और असुरक्षा के माहौल में घिरा हुआ था। भाजपा और केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल को उन्होंने स्थिरता और विकास के युग के रूप में प्रस्तुत किया। यह दावा भाजपा की उस राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें सुरक्षा और विकास को एक-दूसरे का पूरक बताया जाता है। घुसपैठ का मुद्दा असम में केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी है। असमिया भाषा, संस्कृति और पहचान को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताएं वास्तविक हैं। अमित शाह ने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति के लिए घुसपैठ को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर इस बहस को और धार दी है। आईएमडीटी अधिनियम का उल्लेख कर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि पूर्ववर्ती नीतियों ने समस्या को हल करने के बजाय जटिल बनाया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस कानून को निरस्त किया जाना इस तर्क को कानूनी आधार भी देता है।

हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण भी बना रहे। पहचान और संस्कृति की रक्षा आवश्यक है, लेकिन किसी भी कार्रवाई में कानून, मानवाधिकार और सामाजिक सौहार्द का संतुलन बना रहना चाहिए। केवल चुनावी वादों से नहीं, बल्कि पारदर्शी और न्यायसंगत नीतियों से ही स्थायी समाधान निकल सकता है।अमित शाह द्वारा ‘ज्योति-विष्णु अंतर्जातीय कला मंदिर’ को विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताना इस बात का संकेत है कि सरकार विकास को केवल भौतिक ढांचे तक सीमित नहीं मानती, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को भी उसका अभिन्न हिस्सा समझती है। गोपीनाथ बोरदोलोई, भूपेन हजारिका, जुबिन गर्ग और लाचित बोरफुकन जैसे व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि देना असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक विमर्श से जोड़ने का प्रयास है। आगामी विधानसभा चुनाव असम के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं। मतदाताओं के सामने सवाल साफ है क्या वे विकास और सुरक्षा के मौजूदा दावों पर भरोसा जताते हैं, या वैकल्पिक दृष्टिकोण को मौका देना चाहते हैं। अंततः असम की जनता को यह तय करना है कि उनकी पहचान, संस्कृति और भविष्य के लिए कौन-सी नीति और कौन-सी सरकार सबसे अधिक विश्वसनीय है। चुनावी शोर के बीच यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।


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