चुनते फूल और गिनते कांटे

सत्ता, विपक्ष और जनता के बीच जवाबदेही का सवाल

विनोद कुमार झा

राजनीति भी अजीब रंगमंच है, जहां फूल चुनने के लिए हर कोई आगे आना चाहता है, लेकिन कांटों की जिम्मेदारी लेने के समय कदम पीछे खींचने लगते हैं। सत्ता में बैठे लोग अपनी उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, तो विपक्ष उन्हीं उपलब्धियों के पीछे छिपी कमियों को सामने लाने का प्रयास करता है। इस राजनीतिक खींचतान में जनता के असली सवाल कई बार पीछे छूट जाते हैं। सवाल यह है कि विकास के दावों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम आदमी को क्या मिला और उसकी समस्याओं का कितना समाधान हुआ?

लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना अधिकार है, लेकिन जनता के प्रति जवाबदेही निभाना उससे भी बड़ा दायित्व है। चुनाव जीतना हर निर्णय को सही साबित करने का प्रमाणपत्र नहीं, और विपक्ष में होना हर सरकारी काम का विरोध करने का आधार नहीं। राजनीति की सार्थकता तब है, जब सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों के साथ कमियों को भी स्वीकार करे और विपक्ष आलोचना के साथ समाधान का विकल्प प्रस्तुत करे।

किसी योजना का शुभारंभ हो या परियोजना का उद्घाटन, श्रेय लेने की होड़ दिखाई देती है। लेकिन जब काम अधूरा रह जाए, सड़क टूटने लगे, अस्पताल में सुविधाओं की कमी हो या रोजगार के वादे पूरे न हों, तब जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसे में जनता को केवल घोषणाओं और उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों का हिसाब चाहिए। विकास का मूल्यांकन प्रचार से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से होना चाहिए।

चुनाव के समय रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं को लेकर अनेक वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव बीतने के बाद इन वादों की समीक्षा भी जरूरी है। जनता को जानने का अधिकार है कि कौन-सा वादा पूरा हुआ, कौन-सा अधूरा है और उसके पीछे क्या कारण हैं। वादा करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उसे पूरा करने का प्रयास और उसके परिणामों पर जवाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि हर आलोचना विरोधियों की साजिश नहीं होती। जनता की समस्याओं को सुनना और कमियों को दूर करना सुशासन का हिस्सा है। दूसरी ओर, विपक्ष को भी केवल कांटे गिनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि किसी नीति में कमी है, तो उसका व्यावहारिक विकल्प भी सामने रखना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध और समर्थन दोनों का आधार दलगत स्वार्थ नहीं, बल्कि जनहित होना चाहिए।

आज सोशल मीडिया पर उपलब्धियों का प्रचार और कमियों की आलोचना तेजी से होती है। लेकिन अधूरे तथ्यों और भ्रामक सूचनाओं के बीच वास्तविक मुद्दे कई बार दब जाते हैं। इसलिए राजनीतिक दावों को नारों और भावनाओं के बजाय प्रमाणों तथा परिणामों की कसौटी पर परखना जरूरी है। जनता को भी अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने चाहिए—सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में क्या बदलाव आया? केवल भाषण, लोकप्रियता और प्रचार किसी जनप्रतिनिधि के कामकाज का पूरा प्रमाण नहीं हो सकते।

राजनीति में उपलब्धियों की सराहना होनी चाहिए और कमियों की आलोचना भी। किसी अच्छे काम को केवल इसलिए नकारना उचित नहीं कि उसे विरोधी दल ने किया है। उसी तरह, किसी कमी को केवल राजनीतिक निष्ठा के कारण अनदेखा करना भी सही नहीं। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि श्रेय देने में उदारता और जवाबदेही तय करने में निष्पक्षता बरती जाए।

अंततः सवाल यह नहीं कि राजनीति में फूल कौन चुन रहा है और कांटे कौन गिन रहा है, बल्कि यह है कि जनता के रास्ते से कांटे हटाने के लिए कौन जिम्मेदारी निभा रहा है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों का हिसाब दे, विपक्ष समाधान प्रस्तुत करे और जनता तथ्यों के आधार पर दोनों के कामकाज का मूल्यांकन करे।

राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना या विरोधियों को घेरना नहीं, बल्कि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है। फूलों का श्रेय लेने की होड़ से आगे बढ़कर कांटों को हटाने का संकल्प ही लोकतंत्र को सार्थक बना सकता है।

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