- 2000 रुपये से ऊपर के चुनिंदा व्यापारी भुगतान पर 0.4% MDR, अधिकतम 300 रुपये; आम उपभोक्ता से सीधे शुल्क नहीं लेकिन कारोबार की लागत का असर कीमतों पर पड़ने की आशंका
विनोद कुमार झा
आम आदमी की जेब पर दबाव इस समय दो मोर्चों से दिखाई दे रहा है। एक तरफ रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों में तेजी ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है, तो दूसरी तरफ डिजिटल भुगतान की दुनिया में अक्टूबर से UPI के नियमों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर जेब कितनी और किस रास्ते से हल्की होगी? हालांकि नए UPI नियम को सीधे तौर पर उपभोक्ता से वसूले जाने वाले शुल्क के रूप में देखना सही नहीं होगा। 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नए ढांचे में 2,000 रुपये से अधिक के कुछ Person-to-Merchant (P2M) UPI लेन-देन पर Merchant Discount Rate यानी MDR लागू होगा। ग्राहक से यह शुल्क सीधे लेने की अनुमति नहीं होगी।
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के नए ढांचे के अनुसार 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के निर्धारित व्यापारी UPI लेन-देन पर सामान्य MDR 0.4 प्रतिशत होगा। प्रति लेन-देन अधिकतम MDR 300 रुपये रखा गया है। इसका मतलब यह है कि 5,000 रुपये के भुगतान पर MDR 20 रुपये, 10,000 रुपये पर 40 रुपये और 50,000 रुपये पर 200 रुपये तक हो सकता है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के ऐसे लेन-देन पर सामान्य 0.4 प्रतिशत की गणना 300 रुपये से ऊपर जाती है, इसलिए अधिकतम सीमा 300 रुपये लागू होगी। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ग्राहक से सीधे वसूला जाने वाला UPI शुल्क नहीं है। वित्त मंत्रालय के अनुसार व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P लेन-देन पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान भी MDR से मुक्त रहेंगे। छोटे कारोबारियों के लिए भी विशेष सुरक्षा व्यवस्था रखी गई है। QR कोड के जरिए महीने में 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को शून्य MDR की सुविधा जारी रहेगी।
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक नए ढांचे के बाद लगभग 96 प्रतिशत P2M यानी व्यक्ति से व्यापारी को होने वाले UPI लेन-देन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वहीं कुल UPI लेन-देन मूल्य का करीब 70 प्रतिशत P2P लेन-देन है, जो नए MDR ढांचे से पूरी तरह बाहर रहेगा। यानी किसी मित्र, रिश्तेदार या परिवार के सदस्य को बैंक खाते से UPI के जरिए रकम भेजने पर इस बदलाव के कारण कोई शुल्क नहीं लगेगा। यही कारण है कि इसे ‘हर UPI भुगतान पर चार्ज’ कहना सही तस्वीर नहीं होगी। असली बदलाव बड़े और चुनिंदा व्यापारी भुगतान में है।
कुछ विशेष श्रेणियों के भुगतान के लिए प्रतिशत के बजाय 5 रुपये प्रति लेन-देन का MDR निर्धारित किया गया है। इनमें रेलवे टिकट, ईंधन, उपयोगिता सेवाओं और बीमा जैसी श्रेणियां शामिल हैं। कुछ रिपोर्टों में शिक्षा शुल्क और अन्य विशिष्ट श्रेणियों के लिए भी अलग MDR व्यवस्था का उल्लेख है। इसलिए भुगतान का प्रकार और व्यापारी की श्रेणी यह तय करेगी कि संबंधित लेन-देन पर कौन-सा शुल्क ढांचा लागू होगा।
समझिए नए नियम को उदाहरण से
भुगतान| नया सामान्य MDR| संभावित MDR
₹1,000| लागू नहीं| ₹0
₹2,000| लागू नहीं| ₹0
₹5,000| 0.4%| ₹20
₹10,000| 0.4%| ₹40
₹25,000| 0.4%| ₹100
₹50,000| 0.4%| ₹200
₹75,000| 0.4%, लेकिन सीमा लागू| ₹300
₹1 लाख| अधिकतम सीमा| ₹300
व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान| MDR नहीं| ₹0
नोट: ऊपर की सामान्य गणना 0.4% MDR और 300 रुपये की अधिकतम सीमा वाले निर्धारित P2M लेन-देन के लिए है। विशेष श्रेणियों में अलग दर लागू हो सकती है।
UPI के नए नियम ऐसे समय आ रहे हैं जब महंगाई के आंकड़े भी घरेलू बजट के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। अगस्त 2026 में भारत की खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत रही, जो जुलाई के 4.45 प्रतिशत से अधिक है। खाद्य महंगाई भी जुलाई के 5.52 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 5.95 प्रतिशत हो गई। ग्रामीण महंगाई 5.23 प्रतिशत, जबकि शहरी महंगाई 4.31 प्रतिशत दर्ज की गई।
खाद्य वस्तुओं में भी कई चीजों के दामों ने घरेलू बजट को प्रभावित किया। अगस्त में अदरक की महंगाई 73.82 प्रतिशत, प्याज की 48.27 प्रतिशत और लहसुन की 43.60 प्रतिशत बताई गई। वहीं टमाटर और आलू जैसी कुछ वस्तुओं की कीमतों में नरमी भी रही।
महंगाई का एक और दबाव खाद्य तेलों से जुड़ा है। उपलब्ध ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक वर्ष में भारत में वनस्पति तेलों की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। भारत अपनी जरूरत के लगभग दो-तिहाई खाद्य तेल का आयात करता है। सरकार कीमतों पर दबाव कम करने के लिए आयात शुल्क में संभावित कमी पर विचार कर रही है।
थोक स्तर पर भी कीमतों का दबाव दिखाई दे रहा है। अगस्त 2026 में थोक महंगाई 9.92 प्रतिशत रही, जबकि जुलाई में यह 9.78 प्रतिशत थी। थोक खाद्य कीमतों में वृद्धि 7.05 प्रतिशत और ईंधन एवं बिजली श्रेणी में वृद्धि 22.93 प्रतिशत दर्ज की गई। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस की थोक कीमतों में सालाना आधार पर 34.41 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई।
UPI का आकार समझना भी जरूरी है। NPCI के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक उस महीने UPI पर करीब 24,508.96 लाख यानी 2,450.9 करोड़ लेन-देन हुए। इनका कुल मूल्य करीब 29,82,355.95 करोड़ रुपये, यानी लगभग 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा। अगस्त में UPI से जुड़े बैंकों की संख्या 752 तक पहुंच गई।
जुलाई में UPI लेन-देन की संख्या 23,658.35 लाख और कुल मूल्य 29,87,880.49 करोड़ रुपये था। जून में 22,716.07 लाख लेन-देन और 28,92,138.67 करोड़ रुपये का मूल्य दर्ज हुआ। यानी डिजिटल भुगतान अब रोजमर्रा की खरीदारी से लेकर बड़े व्यावसायिक भुगतान तक भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
UPI के जरिए भुगतान लंबे समय से उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त रहा है। सरकार ने अगस्त 2026 में भी स्पष्ट किया था कि उपभोक्ताओं से UPI भुगतान के लिए सीधे शुल्क नहीं लिया जाएगा। अब नए ढांचे के तहत चुनिंदा बड़े व्यापारी भुगतानों पर MDR लगाया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे UPI के संचालन, तकनीकी ढांचे, साइबर सुरक्षा और भविष्य के विस्तार के लिए भुगतान व्यवस्था को आर्थिक आधार मिलेगा।
यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक MDR से मिलने वाली राशि भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, भुगतान ऐप और अन्य भागीदारों के बीच वितरित होगी।
असली सवाल खर्च का बोझ आखिर कहां जाएगा? यहीं से आम उपभोक्ता की चिंता शुरू होती है। यदि किसी व्यापारी को बड़े UPI भुगतान पर अतिरिक्त भुगतान लागत उठानी पड़ती है, तो उसके पास कई व्यावसायिक विकल्प होंगे। वह लागत खुद वहन कर सकता है, अपने मार्जिन को कम कर सकता है या अपनी कीमतों में बदलाव कर सकता है। इसका वास्तविक असर कारोबार, प्रतिस्पर्धा और व्यापारी के मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा। इसलिए यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि हर ग्राहक की जेब सीधे उतनी ही रकम से कटेगी जितना MDR होगा।
लेकिन दूसरी ओर, जब घरेलू बजट पहले ही खाद्य महंगाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों से दबाव में हो, तब छोटे-छोटे अतिरिक्त खर्च भी उपभोक्ता के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अगस्त की 4.82 प्रतिशत खुदरा महंगाई और 5.95 प्रतिशत खाद्य महंगाई इस दबाव का व्यापक संकेत देती है।
इस पूरे बदलाव की तस्वीर को एक पंक्ति में समझें तो महंगाई और UPI को एक ही तरह की ‘जेब कटौती’ कहना सही नहीं है। महंगाई सीधे वस्तुओं और सेवाओं की खरीद क्षमता को प्रभावित करती है, जबकि नया UPI MDR मुख्य रूप से कुछ व्यापारी भुगतानों की भुगतान-लागत में बदलाव है। आम ग्राहक के लिए P2P भुगतान और 2,000 रुपये तक के P2M भुगतान मुफ्त रहेंगे।
फिर भी अक्टूबर के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को किस तरह संभालते हैं और प्रतिस्पर्धी बाजार में उसका असर वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों पर कितना पड़ता है। फिलहाल आंकड़े इतना जरूर बताते हैं कि घर का बजट पहले ही महंगाई के दबाव में है और डिजिटल भुगतान व्यवस्था भी अब नए शुल्क ढांचे की ओर बढ़ रही है।
इसलिए अक्टूबर का सवाल केवल यह नहीं होगा कि “UPI पर कितना शुल्क लगेगा?”, बल्कि यह भी होगा कि “उस शुल्क का आर्थिक असर किस पर और किस रूप में दिखाई देगा?” यह लेख 14–16 सितंबर 2026 तक उपलब्ध MoSPI, वित्त मंत्रालय/NPCI और ताजा समाचार रिपोर्टों के आंकड़ों पर आधारित है। UPI के नियमों के संबंध में सरकारी स्पष्टीकरण को प्राथमिकता दी गई है।
( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
