-जब भाईयों के विवाद ने रिश्तों की मर्यादा को तार-तार कर दिया
विनोद कुमार झा
परिवार को समाज की सबसे मजबूत इकाई माना जाता है। घर की चारदीवारी के भीतर पैदा होने वाले रिश्ते केवल खून के रिश्ते नहीं होते, बल्कि उनमें प्रेम, सम्मान, विश्वास और मर्यादा की डोर भी बंधी होती है। लेकिन जब इसी परिवार में अहंकार, गुस्सा और कटु वाणी अपना स्थान बना लेते हैं, तो वर्षों से संजोए गए रिश्ते कुछ ही क्षणों में बिखर जाते हैं। कई बार विवाद की शुरुआत बेहद छोटी होती है, लेकिन तीखे शब्द उसे ऐसी आग में बदल देते हैं, जिसकी लपटें पूरे परिवार को झुलसा देती हैं।
दो भाइयों के बीच हुए एक विवाद ने भी कुछ ऐसा ही रूप ले लिया। शुरुआत में मामला केवल आपसी कहासुनी और मतभेद तक सीमित था। दोनों भाइयों के बीच किसी बात को लेकर तनातनी हुई। यदि उस समय दोनों में से कोई एक भी शांत हो जाता, बात को टाल देता या परिवार के किसी बुजुर्ग की मौजूदगी में समाधान खोजने की कोशिश करता, तो शायद मामला वहीं समाप्त हो जाता। लेकिन गुस्से ने विवेक पर कब्जा कर लिया और बातचीत धीरे-धीरे कटु शब्दों में बदलती चली गई।
विवाद तब और गंभीर हो गया, जब बड़े भाई ने अपने छोटे भाई की पत्नी के प्रति अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर दिया। किसी भी परिवार में बहू केवल एक महिला नहीं होती, बल्कि वह परिवार की प्रतिष्ठा और सम्मान का हिस्सा होती है। मतभेद चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, किसी महिला के सम्मान को विवाद में घसीटना न केवल रिश्तों की मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक संस्कारों पर भी सवाल खड़ा करता है।
कहते हैं कि तलवार का घाव समय के साथ भर सकता है, लेकिन शब्दों का घाव लंबे समय तक मन में बना रहता है। गुस्से में बोले गए कुछ शब्द सामने वाले के दिल को इस कदर चोट पहुंचा सकते हैं कि वर्षों का अपनापन एक पल में दुश्मनी में बदल जाए। यही इस विवाद में हुआ। बड़े भाई की तीखी और अमर्यादित भाषा ने छोटे भाई के परिवार को भीतर तक आहत कर दिया।
इसके बाद विवाद केवल दो भाइयों के बीच नहीं रहा। छोटा भाई भी अपने परिवार और पत्नी के सम्मान की रक्षा के लिए लड़ाई में कूद पड़ा। लेकिन जिस क्षण हाथ उठते हैं, उस क्षण विवाद अपनी सबसे खतरनाक अवस्था में पहुंच जाता है। बातों का जवाब बातों से देने के बजाय मारपीट शुरू हो गई। देखते ही देखते वह स्थिति पैदा हो गई, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।
सबसे दुखद पहलू यह रहा कि छोटे भाई के पुत्र ने भी अपना आपा खो दिया और लड़ाई के दौरान अपने बड़े पापा पर हाथ उठा दिया। जिस व्यक्ति को परिवार में उम्र और रिश्ते के कारण सम्मान मिलना चाहिए था, वही व्यक्ति मारपीट का शिकार हो गया। यहां सवाल केवल यह नहीं है कि गलती किसकी थी। बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सा क्षण था, जब परिवार के लोगों ने अपने रिश्तों की सारी मर्यादाएं भुला दीं?
एक व्यक्ति की अमर्यादित भाषा गलत थी, लेकिन उसके जवाब में हिंसा करना भी किसी समाधान का रास्ता नहीं हो सकता। गलत शब्दों का जवाब गलत तरीके से देने पर गलती छोटी नहीं होती, बल्कि विवाद और गहरा हो जाता है। एक की जुबान ने आग लगाई और दूसरे के हाथों ने उस आग को और भड़का दिया।
आज समाज में ऐसे विवाद तेजी से बढ़ रहे हैं। परिवारों में संपत्ति, घरेलू निर्णय, आर्थिक जिम्मेदारियों, आपसी अपेक्षाओं और अहंकार को लेकर मतभेद होना असामान्य नहीं है। असहमति हर परिवार में हो सकती है, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदलना हमारे हाथ में होता है। रिश्तों की खूबसूरती इस बात में नहीं कि कभी विवाद न हो, बल्कि इस बात में है कि विवाद होने के बाद भी एक-दूसरे की मर्यादा और सम्मान कायम रहे।
विशेष रूप से परिवार के बुजुर्गों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें विवाद को बढ़ाने के बजाय शांत कराने की भूमिका निभानी चाहिए। वहीं युवाओं और परिवार के अन्य सदस्यों को भी यह समझना होगा कि गुस्से में उठाया गया हाथ केवल सामने वाले को चोट नहीं पहुंचाता, बल्कि अपने ही रिश्ते को घायल करता है।
ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि व्यक्ति प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुक जाए। अपमानजनक शब्द सुनने पर तत्काल जवाब देना आवश्यक नहीं है। घर की बहू, बेटी, भाई, पिता या बुजुर्ग के सम्मान से जुड़ा विषय हो तो और भी अधिक संयम की जरूरत होती है। यदि मामला गंभीर हो जाए तो परिवार के समझदार सदस्य, समाज के जिम्मेदार लोग या कानून का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन हाथापाई किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा वही होती है, जब सामने वाला हमें गुस्सा दिलाने वाली बात कह दे। उस समय यदि हम अपने शब्दों और व्यवहार पर नियंत्रण रख लेते हैं तो हम केवल विवाद को नहीं रोकते, बल्कि पूरे परिवार की प्रतिष्ठा बचाते हैं। इसके विपरीत यदि हम भी उसी भाषा और उसी हिंसा का सहारा लेते हैं, तो अंतर केवल इतना रह जाता है कि चोट दोनों तरफ से लगती है और रिश्ते दोनों तरफ से टूटते हैं।
इस घटना से समाज को एक गंभीर सीख लेने की जरूरत है। बड़े होने का अर्थ केवल उम्र में बड़ा होना नहीं, बल्कि व्यवहार में भी बड़ा होना है। छोटे होने का अर्थ यह नहीं कि अपमान सहते रहें, लेकिन अपने सम्मान की रक्षा करते हुए भी मर्यादा नहीं छोड़नी चाहिए। किसी महिला के प्रति अपमानजनक भाषा निश्चित रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकती, लेकिन उसके प्रतिरोध का रास्ता भी विवेकपूर्ण होना चाहिए।
परिवार में बोला गया हर शब्द आने वाली पीढ़ियों तक असर छोड़ सकता है। बच्चे अपने बड़ों को देखकर सीखते हैं। यदि वे घर में भाई को भाई से लड़ते, बहू को अपमानित होते और बुजुर्गों पर हाथ उठते देखेंगे, तो उनके मन में रिश्तों के प्रति सम्मान कैसे पैदा होगा? इसलिए परिवार के बड़े सदस्यों का आचरण केवल उनका व्यक्तिगत व्यवहार नहीं होता, वह अगली पीढ़ी के संस्कारों का आधार भी बनता है।
अंततः सवाल यह नहीं कि विवाद में कौन जीता और कौन हारा। सवाल यह है कि क्या बचा? यदि भाई का भाई से विश्वास टूट गया, बहू का सम्मान आहत हुआ, बुजुर्ग का सिर झुका और पूरा परिवार शर्मिंदगी के दौर से गुजरने लगा, तो ऐसी जीत भी किस काम की?
इसलिए जरूरी है कि हम अपनी जुबान पर लगाम लगाएं और हाथ उठाने से पहले रिश्तों को याद करें। क्रोध कुछ मिनट का होता है, लेकिन उसके परिणाम वर्षों तक भुगतने पड़ सकते हैं। कटु शब्द रिश्तों में ऐसी दरार डाल देते हैं, जिसे भरना आसान नहीं होता।
क्योंकि तीखे बोल केवल सामने वाले को नहीं जलाते, वे बोलने वाले के अपने घर को भी राख कर सकते हैं। रिश्ते बचाने हैं तो शब्दों में मिठास, व्यवहार में संयम और विवाद में मर्यादा जरूरी है।
