मिथिला के पर्व चौरचन आज

 -कलंकित चांद की पूजा कर मांगी जाती है सुख-समृद्धि और कलंकमुक्त जीवन

विनोद कुमार झा 

मिथिला की समृद्ध लोकसंस्कृति में चौरचन यानी चौठचंद्र पर्व का विशेष स्थान है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह अनूठा लोकपर्व इस वर्ष 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाया जा रहा है। इस दिन मिथिलांचल में चंद्रमा की पूजा की जाती है। वर्ष 2026 में चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे से शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह 7:44 बजे तक रहेगी और चंद्रोदय लगभग शाम 7:36 बजे बताया गया है। 

जब पूरा देश चांद से बचता है, मिथिला करती है पूजा :  चौरचन पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा को जहां अनेक स्थानों पर कलंक से जुड़ी मान्यता के कारण देखने से बचा जाता है, वहीं मिथिला में इसी चांद का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इसे चौठचंद्र भी कहा जाता है। मिथिला की प्रकृति-पूजक परंपरा में सूर्य, चंद्रमा, जल, वृक्ष और धरती के प्रति श्रद्धा लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। 

इस दिन घर के आंगन को लीपकर अथवा स्वच्छ करके अरिपन बनाया जाता है। अरिपन पर फल, दही, मिठाई और विभिन्न प्रकार के पकवान सजाए जाते हैं। महिलाएं और पुरुष व्रत रखकर चंद्रोदय की प्रतीक्षा करते हैं। चंद्रमा के दर्शन के समय हाथ में फल, मिठाई या नैवेद्य लेकर अर्घ्य और पूजा करने की परंपरा है। 

गणेश जी और चंद्रमा से जुड़ी है मान्यता : चौरचन की कथा भगवान गणेश और चंद्रमा से जुड़ी पौराणिक मान्यता से संबंधित है। कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश को देखकर चंद्रमा हंस पड़े। इससे भगवान गणेश अप्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो कोई चंद्रमा को देखेगा, उस पर झूठे आरोप या कलंक का दोष लग सकता है। इसी कारण इस दिन के चंद्रदर्शन को लेकर देश के कई हिस्सों में सावधानी बरती जाती है। 

मिथिला की लोकपरंपरा ने इसी मान्यता को एक अलग आध्यात्मिक अर्थ दिया। यहां चंद्रमा का पूजन कर कलंक और दोष से मुक्ति, परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की जाती है। इसीलिए चौरचन मिथिला के लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और लोकविश्वास का पर्व भी है।

पकवानों से महक उठता है मिथिला का आंगन : चौरचन के अवसर पर घर-घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। खीर, पूरी, पिरुकिया, खाजा, लड्डू, दही तथा विभिन्न मौसमी फलों से पूजा की थाली सजती है। इस पर्व की सुंदर सामाजिक परंपरा यह भी है कि लोग अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और परिचितों के घर पकवान भेजते हैं। इस तरह पूजा के साथ-साथ आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का संदेश भी मजबूत होता है। 

मिथिला के ग्रामीण अंचलों में चंद्रोदय के समय बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में विशेष उत्साह दिखाई देता है। चांद निकलने की प्रतीक्षा में घर की महिलाएं पूजा की सामग्री तैयार रखती हैं और चंद्रमा के दर्शन होते ही परिवार के सदस्य श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं। लोकजीवन में गूंजने वाला भाव “उगा हो चांद, लपकला पूरी” इस पर्व की आत्मीयता को अभिव्यक्त करता है।

पूजा में बोला जाता है विशेष मंत्र : चौरचन पूजा के दौरान चंद्रदेव को प्रणाम करते हुए परंपरागत रूप से यह मंत्र पढ़ा जाता है :-

सिंहः प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवताहतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

इसके बाद चंद्रदेव को प्रणाम करते हुए कहा जाता है :-

नमः शुभ्रांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः।

रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते॥

प्रार्थना के रूप में :-

मृगाङ्क रोहिणीनाथ शम्भोः शिरसि भूषण।

व्रतं संपूर्णतां यातु सौभाग्यं च प्रयच्छ मे॥

रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवन् देहि मे।

पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामान् प्रदेहि मे॥ 

परंपरा में छिपा सामाजिक संदेश : चौरचन पर्व हमें यह संदेश देता है कि लोकपर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते। वे समाज को जोड़ने, परिवार को एक साथ बैठाने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का माध्यम भी हैं। बदलते समय में भी मिथिला के घरों में अरिपन, पकवान, चंद्रदर्शन और पारंपरिक मंत्रों के साथ चौरचन मनाया जाना इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति आज भी जीवंत है।

चौरचन की चांदनी में केवल चंद्रमा का प्रकाश नहीं, बल्कि मिथिला की सदियों पुरानी परंपरा, पारिवारिक आत्मीयता और सामाजिक सद्भाव की रोशनी भी दिखाई देती है। यही इस लोकपर्व की सबसे बड़ी विशेषता और इसकी सांस्कृतिक शक्ति है। 

Post a Comment

Previous Post Next Post