खुद की परख दर्पण में...

-दूसरों को नीचा दिखाकर कोई महान नहीं बनता, महानता अपने भीतर झांकने से आती है

विनोद कुमार झा 

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह स्वयं को दूसरों की तुलना में बड़ा समझने लगता है। धन आया तो अहंकार, पद मिला तो व्यवहार में कठोरता, प्रसिद्धि मिली तो दूसरों को छोटा समझने की आदत और थोड़ी सफलता मिली तो आलोचना करने का अधिकार अपने आप मिल गया ऐसा मान लेना मनुष्य के पतन की पहली सीढ़ी है।

दरअसल, महान बनने के लिए किसी दूसरे को छोटा करना आवश्यक नहीं है। यदि आपके पास ज्ञान है तो उसे बांटिए, धन है तो उसका सदुपयोग कीजिए, पद है तो लोगों के काम आइए और सफलता मिली है तो विनम्र रहिए। आपकी वास्तविक ऊंचाई इस बात से तय नहीं होती कि आप दूसरों को कितना नीचे दिखा सकते हैं, बल्कि इससे तय होती है कि आपकी ऊंचाई के बावजूद आपके पैर जमीन पर कितने मजबूती से टिके हैं।

कहा भी गया है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। वह चेहरे पर लगी सुंदरता भी दिखाता है और चेहरे की कमी भी। लेकिन जीवन का दर्पण उससे भी अधिक कठोर होता है। उसमें चेहरा नहीं, चरित्र दिखाई देता है। इसलिए समय-समय पर दूसरों को परखने के बजाय अपने भीतर झांकना जरूरी है।

खुद की परख कब की? : हम अक्सर दूसरों की कमियां बहुत आसानी से खोज लेते हैं। कौन क्या पहन रहा है, कौन कैसे बोल रहा है, किसके पास कितना धन है, कौन कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, किसने क्या गलती की इन सब पर चर्चा करने में हमें देर नहीं लगती। लेकिन कभी हमने अपने बारे में भी उतनी ही गंभीरता से सोचा है?

 क्या हमारे व्यवहार से किसी को दुख पहुंचा? क्या हमारी सफलता ने हमें अहंकारी बना दिया? क्या हम किसी की तरक्की देखकर खुश होते हैं या भीतर ही भीतर जलते हैं? क्या हम दूसरों की असफलता पर प्रसन्न होते हैं? क्या हम अपनी कमियों को स्वीकार करने का साहस रखते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर ही हमारी वास्तविक पहचान है।

दूसरों की परीक्षा लेना आसान है, लेकिन खुद की परीक्षा लेना बहुत कठिन। क्योंकि दूसरों की कमियां दिखाई देती हैं और अपनी कमियों पर मन पर्दा डाल देता है।

महानता का मतलब किसी को छोटा करना नहीं : कुछ लोग स्वयं को महान सिद्ध करने के लिए दूसरों की आलोचना करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यदि सामने वाले की प्रतिष्ठा कम कर दी जाए तो उनकी प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी। यदि किसी की सफलता पर सवाल खड़ा कर दिया जाए तो अपनी सफलता बड़ी दिखाई देगी।

लेकिन यह केवल मन का भ्रम है। सूरज को चमकने के लिए किसी दीपक को बुझाने की आवश्यकता नहीं होती। नदी को बहने के लिए दूसरी नदी को रोकना नहीं पड़ता। फूल को खिलने के लिए दूसरे फूल की पंखुड़ियां नोचने की जरूरत नहीं होती।

ठीक इसी तरह एक सफल व्यक्ति को अपनी सफलता साबित करने के लिए किसी दूसरे को असफल सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। जिसे अपनी ऊंचाई पर विश्वास होता है, वह दूसरों की ऊंचाई से भयभीत नहीं होता।

धन आए तो खुश रहिए, तुलना मत कीजिए : धन जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है। धन से सुविधा खरीदी जा सकती है, लेकिन संतोष नहीं। धन से बड़ा घर बनाया जा सकता है, लेकिन उसमें रहने वालों के बीच प्रेम नहीं खरीदा जा सकता। धन से महंगी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन सम्मान और विश्वास नहीं खरीदा जा सकता।

इसलिए यदि जीवन में धन बढ़ रहा है, कारोबार अच्छा चल रहा है, मेहनत का फल मिल रहा है तो प्रसन्न रहिए। अपनी मेहनत का आनंद लीजिए। लेकिन इस खुशी को दूसरे की आलोचना का कारण मत बनाइए। यह सोचना कि “मैं आगे बढ़ गया हूं, इसलिए दूसरा मुझसे छोटा है” यहीं से अहंकार जन्म लेता है।

आपके पास धन है, यह आपकी उपलब्धि हो सकती है; लेकिन दूसरे के पास कम धन है, यह उसकी कमी नहीं है। हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी की यात्रा दस साल में पूरी होती है, किसी की बीस साल में और किसी की पूरी जिंदगी संघर्ष में निकल जाती है।

इसलिए अपनी उपलब्धि की तुलना किसी दूसरे के जीवन से करना भी उचित नहीं है। “कोई मेरा छीन लेगा” यह डर भी मन का भ्रम है। कई बार मनुष्य अपनी उपलब्धियों को लेकर इतना असुरक्षित हो जाता है कि उसे हर दूसरा व्यक्ति अपना प्रतिस्पर्धी दिखाई देने लगता है।

उसे लगता है कि कोई उसकी सफलता छीन लेगा। कोई उससे आगे निकल जाएगा। कोई उसे देखकर जल रहा है। कोई उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है। हर बार ऐसा हो, यह जरूरी नहीं।

कई बार हमारी सबसे बड़ी परेशानी बाहर नहीं, हमारे भीतर होती है। ईर्ष्या का डर भी कई बार मन की बनाई हुई कहानी होती है। यदि आपने ईमानदारी से मेहनत करके कुछ हासिल किया है, तो उसे लेकर आत्मविश्वास रखिए। हर व्यक्ति को अपनी राह पर चलने दीजिए। किसी की नजर, किसी की बात या किसी की आलोचना आपके परिश्रम का फल नहीं छीन सकती।

हां, जीवन में सावधानी आवश्यक है, लेकिन हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देखना जीवन को बोझिल बना देता है।

आलोचना और ईर्ष्या में अंतर समझना होगा : आलोचना हमेशा बुरी नहीं होती। कई बार कोई व्यक्ति हमारी गलती बताता है तो वह हमारे हित में होता है। सच्चा मित्र वही है जो आवश्यकता पड़ने पर हमारी कमियां भी बताए। समस्या तब शुरू होती है जब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं बल्कि अपमान हो।

किसी की गलती बताना अलग बात है और किसी को नीचा दिखाने के लिए उसकी हर बात में कमी निकालना अलग बात है। इसलिए आलोचना सुनते समय भी विवेक जरूरी है। जो बात हमारे सुधार में सहायक हो, उसे स्वीकार करें। जो केवल किसी की कुंठा हो, उसे अपने मन पर बोझ न बनाएं।

दूसरों की सफलता से जलना स्वयं को जलाना है : ईर्ष्या का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे सामने वाले से ज्यादा हमारा अपना मन जलता है। जिस व्यक्ति से हम जलते हैं, उसे शायद पता भी नहीं होता कि हम उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। वह अपने जीवन में आगे बढ़ रहा होता है और हम उसके बारे में सोच-सोचकर अपना समय और मानसिक ऊर्जा नष्ट कर रहे होते हैं।

इससे अच्छा है कि किसी की सफलता को प्रेरणा बनाया जाए।अगर कोई हमसे आगे है तो उससे सीखें। अगर किसी ने कठिन परिस्थिति में सफलता पाई है तो उसकी यात्रा समझें। अगर कोई आर्थिक रूप से आगे बढ़ा है तो उसके अनुभव से सीखें।दूसरे की सफलता को देखकर जलने के बजाय उससे सीखने वाला व्यक्ति ही वास्तव में आगे बढ़ता है।

हर व्यक्ति का अपना समय होता है : जीवन कोई ऐसी दौड़ नहीं जिसमें सभी लोग एक ही समय पर एक ही स्थान पर पहुंचें। किसी को सफलता जल्दी मिल जाती है, किसी को देर से। किसी को संघर्ष विरासत में मिलता है तो किसी को अवसर। किसी को परिवार का सहयोग मिलता है, किसी को अकेले लड़ना पड़ता है। इसलिए अपने जीवन की तुलना किसी दूसरे के जीवन से करना उचित नहीं।

जिस पेड़ को फल देने में वर्षों लगते हैं, उसे देखकर कोई यह नहीं कहता कि वह असफल है। फिर मनुष्य से यह अपेक्षा क्यों कि उसे तुरंत सफलता मिल जाए? समय हर व्यक्ति को उसका अवसर देता है, बस धैर्य और कर्म नहीं छोड़ना चाहिए।

दर्पण में चेहरा नहीं, चरित्र देखिए : सुबह जब हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं तो कपड़े ठीक करते हैं, बाल संवारते हैं और चेहरे की कमियां खोजते हैं। लेकिन क्या कभी हमने उसी दर्पण में अपने व्यवहार को देखने की कोशिश की?

काश, हमारे घरों में एक ऐसा दर्पण भी होता जिसमें चेहरा नहीं, हमारा चरित्र दिखाई देता। उसमें दिखाई देता कि हम अपने से कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उसमें दिखाई देता कि हम अपने से छोटे व्यक्ति से कैसे बात करते हैं। उसमें दिखाई देता कि किसी गरीब को देखकर हमारे मन में क्या आता है। उसमें दिखाई देता कि किसी की सफलता पर हमारा मन खुश होता है या बेचैन यही असली परख है। क्योंकि इंसान की पहचान उसके कपड़ों, गाड़ी, मकान, बैंक बैलेंस या पद से नहीं होती। उसकी पहचान उसके व्यवहार से होती है।

अहंकार जितना बढ़ता है, इंसान उतना ही अकेला होता जाता है। अहंकार धीरे-धीरे रिश्तों को खा जाता है। शुरुआत में व्यक्ति केवल अपनी उपलब्धियों का बखान करता है। फिर वह दूसरों की बात काटने लगता है। उसके बाद वह हर किसी को अपने से कम समझने लगता है। धीरे-धीरे लोग उससे दूरी बनाने लगते हैं। एक दिन उसके पास धन तो बहुत होता है, लेकिन मन की बात कहने वाला कोई नहीं होता।

इसलिए सफलता के साथ विनम्रता को बचाकर रखना बहुत जरूरी है। पेड़ पर फल जितने अधिक आते हैं, उसकी डालियां उतनी ही झुकती हैं। मनुष्य को भी अपनी उपलब्धियों के साथ झुकना सीखना चाहिए।

जीवन में सबसे बड़ा धन संतोष है : जिसके पास बहुत कुछ है लेकिन संतोष नहीं, वह गरीब है। और जिसके पास सीमित साधन हैं लेकिन संतोष, आत्मसम्मान और प्रेम है, वह वास्तव में समृद्ध है।

धन कमाइए, खूब कमाइए, मेहनत कीजिए, अपने परिवार को सुख-सुविधा दीजिए। लेकिन धन को अपने व्यक्तित्व का मालिक मत बनने दीजिए। धन आपके पास रहे, लेकिन आपका मन धन के पास न चला जाए। क्योंकि जब धन हमारी पहचान बन जाता है, तब हम उन लोगों को भी छोटा समझने लगते हैं जिनके पास हमसे कम है। अपने जीवन की दिशा दूसरों की प्रतिक्रिया से तय मत कीजिए।

किसी ने आपकी तारीफ की तो आप खुश हो गए और किसी ने आलोचना कर दी तो आपका मन खराब हो गया यह भावनात्मक निर्भरता है। जीवन में इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि प्रशंसा मिले तो सिर न चढ़े और आलोचना मिले तो पैर न डगमगाएं। आपको पता होना चाहिए कि आपने क्या किया है, क्यों किया है और किस उद्देश्य से किया है। 

यदि आपका रास्ता सही है तो लोगों की बातें आपकी गति को प्रभावित न करें। लोग तो तब भी बोलेंगे जब आप संघर्ष कर रहे होंगे और तब भी बोलेंगे जब आप सफल होंगे। इसलिए लोगों की आवाज से ज्यादा अपने अंतर्मन की आवाज सुनना सीखिए।

दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलें : हम चाहते हैं कि दूसरा विनम्र हो, दूसरा ईमानदार हो, दूसरा सम्मान करे, दूसरा आलोचना न करे और दूसरा ईर्ष्या न करे। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि इन गुणों की शुरुआत हमसे भी हो सकती है?

यदि हम चाहते हैं कि समाज में सम्मान हो तो हमें दूसरों का सम्मान करना होगा। यदि हम चाहते हैं कि लोग हमारी सफलता से खुश हों तो हमें भी दूसरों की सफलता पर खुश होना सीखना होगा। यदि हम चाहते हैं कि कोई हमारी गलती पर हमारा अपमान न करे तो हमें भी दूसरों की गलती पर उन्हें नीचा नहीं दिखाना चाहिए। बदलाव हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार बदलाव की शुरुआत दर्पण के सामने खड़े व्यक्ति से होती है।

अंततः सवाल दूसरों से नहीं, खुद से है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि हमने कितने लोगों को पीछे छोड़ा। महत्वपूर्ण यह होगा कि हमने कितने लोगों का हाथ पकड़ा। यह मायने नहीं रखेगा कि हमने कितनी बार किसी को नीचा दिखाया। मायने यह रखेगा कि हमारी वजह से कितने लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा।

यह भी महत्वपूर्ण नहीं होगा कि हमारे पास कितना धन था। महत्वपूर्ण यह होगा कि उस धन ने हमारे जीवन को कितना सुखी और दूसरों के जीवन को कितना बेहतर बनाया। इसलिए जब भी मन में किसी दूसरे को छोटा दिखाने का विचार आए, एक बार दर्पण के सामने खड़े होकर खुद से पूछिए:-

क्या मुझे महान बनने के लिए वास्तव में किसी दूसरे को छोटा करना जरूरी है? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो समझिए कि आपने जीवन का एक बड़ा सत्य समझ लिया। खुश रहिए कि आपके पास धन है। खुश रहिए कि आपको सफलता मिली। खुश रहिए कि आपकी मेहनत रंग लाई। लेकिन इस खुशी को किसी की आलोचना का कारण मत बनाइए।

किसी की नजर से डरने की जरूरत नहीं, किसी की ईर्ष्या का बोझ उठाने की जरूरत नहीं और किसी को हराने की बेचैनी भी नहीं। अपना कर्म करते रहिए, अपने भीतर झांकते रहिए और समय-समय पर खुद की परख दर्पण में करते रहिए। क्योंकि दुनिया को जीतने से पहले अपने अहंकार को जीतना जरूरी है।

और अंत में याद रखिए:- दूसरों को छोटा करके मिली ऊंचाई बहुत कमजोर होती है, लेकिन अपने चरित्र से मिली ऊंचाई को कोई छीन नहीं सकता। यही असली महानता है। यही आत्ममंथन है। और यही जीवन का सच्चा दर्पण है।

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