आखिर इंतजार कब तक?

 -उम्मीदों के देश में लंबी होती प्रतीक्षा की परछाइयाँ

विनोद कुमार झा 

कहते हैं कि समय कभी नहीं रुकता। घड़ी की सुइयाँ निरंतर चलती रहती हैं, सूरज हर दिन उगता और अस्त होता है, मौसम बदलते हैं और जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है। लेकिन जिन लोगों की आँखों में कोई अधूरी उम्मीद बसती है, उनके लिए समय की रफ्तार थम जाती है। उनके लिए एक दिन एक वर्ष जैसा और एक वर्ष एक युग जैसा प्रतीत होता है। यही कारण है कि हमारे समाज में सदियों से कहा जाता रहा है कि "इंतजार की घड़ी सबसे लंबी होती है।"

आज यदि हम अपने आसपास नजर दौड़ाएँ तो पाएँगे कि हमारा पूरा समाज किसी न किसी प्रतीक्षा में खड़ा है। युवा नौकरी की राह देख रहा है, किसान अच्छी फसल और उचित मूल्य की प्रतीक्षा कर रहा है, माता-पिता अपने बच्चों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं, प्रेमी अपने प्रेम की मंजिल का इंतजार कर रहा है, याचिकाकर्ता न्याय की आस लगाए बैठा है और आम जनता विकास के उन वादों के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रही है जो हर चुनाव के साथ नए रंगों में उसके सामने प्रस्तुत किए जाते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि लोग इंतजार क्यों कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि आखिर यह इंतजार अब तक क्यों जारी है?

हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में समेट दिया है। संदेश सेकंडों में पहुँच जाते हैं, मशीनें मिनटों में हजारों काम कर देती हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है और देश विकास के नए-नए दावे कर रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि सुविधाओं की इस तेज रफ्तार दुनिया में इंसानी उम्मीदों की गाड़ी अब भी कई जगह धीमी गति से चल रही है।

देश का युवा आज सबसे अधिक बेचैन दिखाई देता है। वह वर्षों तक पढ़ाई करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी खपा देता है, परिवार की उम्मीदों का भार उठाता है और एक सम्मानजनक रोजगार की आशा करता है। लेकिन जब भर्ती प्रक्रियाएँ वर्षों तक लंबित रहती हैं, परीक्षाएँ रद्द हो जाती हैं, परिणाम अटक जाते हैं या नियुक्तियाँ टलती रहती हैं, तब केवल रोजगार ही नहीं रुकता, बल्कि लाखों सपनों की उड़ान भी थम जाती है।

एक बेरोजगार युवक की आँखों में झाँककर देखिए। वहाँ केवल नौकरी का इंतजार नहीं मिलेगा, वहाँ अपने बूढ़े पिता का सहारा बनने की इच्छा मिलेगी, अपनी माँ की दवाइयों का खर्च उठाने का सपना मिलेगा, अपनी बहन की शादी की चिंता मिलेगी और अपने जीवन को सम्मानपूर्वक जीने की आकांक्षा मिलेगी। जब नौकरी नहीं मिलती तो केवल आय का स्रोत नहीं रुकता, आत्मविश्वास भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।

इसी प्रकार भारत के गाँवों और कस्बों में माता-पिता का इंतजार भी कम मार्मिक नहीं है। कभी संयुक्त परिवारों की चहल-पहल से भरे आँगन आज खामोश दिखाई देते हैं। रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में बच्चे महानगरों की ओर निकल गए हैं। माँ हर त्योहार पर बेटे के आने की उम्मीद करती है। पिता दरवाजे पर आती हर आहट को पहचानने का प्रयास करते हैं। मोबाइल फोन ने दूरियाँ कम की हैं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट का स्थान नहीं ले पाया है।

कई घरों में आज भी भोजन की थाली परोसते समय एक अतिरिक्त प्लेट की कल्पना जीवित रहती है। यह केवल किसी व्यक्ति का इंतजार नहीं है, यह उस अपनत्व का इंतजार है जिसने भारतीय परिवार व्यवस्था को सदियों तक मजबूत बनाए रखा।

यदि भावनाओं की दुनिया में जाएँ तो प्रेम भी प्रतीक्षा का ही दूसरा नाम है। प्रेम में मिलने की खुशी जितनी गहरी होती है, इंतजार का दर्द भी उतना ही गहरा होता है। किसी संदेश का इंतजार, किसी मुलाकात का इंतजार, किसी वादे के पूरा होने का इंतजार ये सब प्रेम के ऐसे अध्याय हैं जिन्हें हर पीढ़ी ने अपने-अपने तरीके से जिया है। लेकिन आज के तेज रफ्तार दौर में भी दिल की धड़कनों का समय नहीं बदला। प्रेम आज भी इंतजार मांगता है और इंतजार आज भी धैर्य की परीक्षा लेता है।

दूसरी ओर लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति-जनता भी प्रतीक्षा में है। हर चुनाव में नए वादे होते हैं। विकास के नए सपने दिखाए जाते हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी और सुरक्षा के आश्वासन दिए जाते हैं। चुनावी मंचों पर भविष्य के सुनहरे चित्र उकेरे जाते हैं। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद भी देश के अनेक क्षेत्रों में लोग उन्हीं बुनियादी सुविधाओं की राह देखते दिखाई देते हैं जिनका वादा वर्षों पहले किया गया था।

जनता का इंतजार केवल विकास परियोजनाओं का नहीं है। वह व्यवस्था में संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता की भी प्रतीक्षा कर रही है। वह चाहती है कि योजनाएँ कागजों से निकलकर उसके जीवन में बदलाव का माध्यम बनें। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तब होगी जब नागरिकों को अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा न करनी पड़े।

न्याय की प्रतीक्षा शायद सबसे पीड़ादायक प्रतीक्षा है। अदालतों में लंबित लाखों मुकदमे केवल कानूनी आँकड़े नहीं हैं। उनके पीछे टूटते परिवार, बिखरती उम्मीदें और संघर्ष करते लोग हैं। किसी की जमीन का विवाद वर्षों से लंबित है, कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है, कोई निर्दोष होकर भी निर्णय की प्रतीक्षा में है।

न्याय मिलने में जितनी अधिक देरी होती है, विश्वास उतना ही कमजोर होता जाता है। इसलिए न्याय केवल दिया जाना ही पर्याप्त नहीं है, समय पर दिया जाना भी उतना ही आवश्यक है।

और यदि धैर्य की सबसे बड़ी मिसाल किसी को कहा जाए तो वह भारतीय किसान है। वह मिट्टी में बीज डालता है और फिर प्रकृति के भरोसे अपनी उम्मीदें छोड़ देता है। उसे बारिश का इंतजार रहता है, मौसम के अनुकूल रहने का इंतजार रहता है, फसल तैयार होने का इंतजार रहता है और अंततः अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलने का इंतजार रहता है।

किसान जानता है कि उसकी मेहनत का परिणाम तुरंत नहीं मिलेगा। फिर भी वह हर मौसम में नई उम्मीद बोता है। यही आशा भारतीय कृषि की आत्मा है। लेकिन जब उसकी मेहनत का उचित सम्मान नहीं मिलता, तब उसका इंतजार पीड़ा में बदल जाता है।

दरअसल, इंतजार केवल समय का प्रश्न नहीं है। यह व्यवस्था, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रश्न भी है। यदि युवाओं को समय पर रोजगार मिले, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, न्याय समय पर मिले, विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और परिवारों के बीच संवाद बना रहे, तो प्रतीक्षा का दर्द काफी हद तक कम हो सकता है।

आज आवश्यकता केवल योजनाओं की नहीं, बल्कि परिणामों की है। केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की है। केवल वादों की नहीं, बल्कि विश्वास की है। क्योंकि जब उम्मीदें लगातार टलती हैं, तब समाज में निराशा जन्म लेती है और जब उम्मीदें पूरी होती हैं, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है।

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यह अवसरों का देश है, संभावनाओं का देश है और सपनों का देश है। लेकिन यह तभी वास्तविक अर्थों में विकसित राष्ट्र बनेगा जब इसके नागरिकों को अपनी बुनियादी आकांक्षाओं के लिए अंतहीन प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।

अब समय आ गया है कि हम सामूहिक रूप से यह प्रश्न पूछें, युवाओं को रोजगार का इंतजार कब तक? किसानों को सम्मानजनक आय का इंतजार कब तक? माता-पिता को अपने बच्चों के समय का इंतजार कब तक? जनता को विकास का इंतजार कब तक? और नागरिकों को न्याय का इंतजार कब तक?

क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बड़े आँकड़ों से नहीं मापी जाती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि उसके नागरिकों की उम्मीदें कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से पूरी होती हैं।

अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ भी यही पूछती रहेंगी, "आखिर इंतजार कब तक?"

(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)

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