फ्री की चटनी, रसीला स्वाद

 विनोद कुमार झा 

नगर के बीचों-बीच एक प्रसिद्ध समोसे की दुकान थी। दुकान के मालिक का नाम था घनश्याम हलवाई। उनके समोसे जितने मशहूर थे, उससे कहीं अधिक मशहूर थी उनकी धनिए और पुदीने की चटनी। लोग कहते थे कि समोसा तो हर जगह मिलता है, लेकिन घनश्याम की चटनी का स्वाद कहीं नहीं मिलता।

दुकान के बाहर एक बड़ा सा बोर्ड लगा था "समोसे के साथ चटनी बिल्कुल फ्री!" यही बोर्ड देखकर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। कई लोग तो केवल चटनी के स्वाद की चर्चा सुनकर दूर-दूर से आ जाते थे। चटनी इतनी स्वादिष्ट थी कि लोग उंगलियां चाटते रह जाते थे।

उसी नगर में भोलाराम नाम का एक बड़ा चटोरा आदमी रहता था। उसे मुफ्त की चीजों का बहुत शौक था। एक दिन उसने सुना कि घनश्याम की दुकान पर चटनी मुफ्त मिलती है। उसके मन में एक अनोखा विचार आया। वह दुकान पर पहुंचा और बोला, "एक समोसा देना।"

समोसा मिला तो उसने चटनी खूब भरवा ली। समोसा खत्म होने से पहले ही चटनी खत्म हो गई। उसने फिर चटनी मांगी। घनश्याम ने मुस्कुराकर दे दी। थोड़ी देर बाद उसने फिर मांगी। इस तरह उसने पांच-छह बार चटनी ली और केवल एक समोसा खाया।

दुकान पर बैठे लोग उसकी हरकत देखकर हंसने लगे। लेकिन भोलाराम को कोई फर्क नहीं पड़ा। वह सोच रहा था कि आज तो मुफ्त में ही पेट भर जाएगा। अगले दिन वह फिर पहुंच गया। इस बार उसने एक समोसा लिया और दस बार चटनी भरवाई। तीसरे दिन तो हद ही हो गई। वह अपने साथ एक छोटी कटोरी लेकर आया और उसमें भी चटनी भरने लगा।

घनश्याम हलवाई सब समझ रहे थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे जानते थे कि मुफ्त की चीज का लालच अक्सर इंसान की समझ पर पर्दा डाल देता है।

एक दिन घनश्याम ने एक योजना बनाई। उन्होंने अपनी मशहूर चटनी में हरी मिर्च की मात्रा थोड़ी ज्यादा कर दी। स्वाद तो वही रहा, लेकिन तीखापन बढ़ गया। उसी दिन भोलाराम दुकान पर पहुंचा। उसने पहले की तरह एक समोसा लिया और बार-बार चटनी भरवाने लगा।

पहली कटोरी खत्म हुई, दूसरी खत्म हुई, तीसरी भी खत्म हो गई। अचानक उसके मुंह में आग सी लगने लगी। माथे पर पसीना आ गया। आंखों से पानी बहने लगा। उसने जल्दी से पानी मांगा। पानी पीकर कुछ राहत मिली, लेकिन लालच अभी भी कम नहीं हुआ। उसने फिर चटनी खा ली।

अब तो उसकी हालत और खराब हो गई। वह दुकान के सामने ही हांफने लगा। लोग उसे देखकर हंसने लगे। तभी एक बुजुर्ग ग्राहक ने कहा, "बेटा, मुफ्त की चटनी का स्वाद तभी तक अच्छा लगता है, जब तक उसमें लालच नहीं मिला होता।"

भोलाराम को अपनी गलती समझ आ गई। उसने सिर झुकाकर कहा, "मैंने मुफ्त की चीज का गलत फायदा उठाया। मुझे लगा कि बिना मेहनत के ज्यादा पाने में ही समझदारी है, लेकिन आज समझ आया कि जरूरत से ज्यादा लालच हमेशा नुकसान पहुंचाता है।"

घनश्याम हलवाई मुस्कुराए और बोले, "फ्री की चटनी ग्राहकों के स्वाद के लिए है, किसी के लालच को बढ़ाने के लिए नहीं।"

उस दिन के बाद भोलाराम बदल गया। अब वह जितनी जरूरत होती, उतनी ही चटनी लेता। धीरे-धीरे लोग उसकी समझदारी की भी तारीफ करने लगे। नगर में यह किस्सा इतना प्रसिद्ध हुआ कि जब भी कोई व्यक्ति मुफ्त की चीज के पीछे जरूरत से ज्यादा भागता, लोग हंसकर कहते  "भाई, फ्री की चटनी का रसीला स्वाद कहीं भोलाराम जैसा हाल न कर दे!"

शिक्षा :  मुफ्त में मिलने वाली वस्तु का सम्मान करना चाहिए। लालच में आकर किसी सुविधा का दुरुपयोग करना अंततः स्वयं के लिए ही परेशानी का कारण बनता है।

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