ढोल पीटने से नहीं बुझती आग?

 -आक्रोश, संवाद और समाधान की जरूरत...

विनोद कुमार झा 

समाज और राष्ट्र का निर्माण केवल शक्ति प्रदर्शन, नारों और प्रचार से नहीं होता, बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और दूरदर्शिता से होता है। जब कहीं आग लगती है तो उसे बुझाने के लिए पानी का सहारा लिया जाता है, हवा देने का नहीं। यदि कोई व्यक्ति आग के सामने खड़ा होकर केवल ढोल पीटता रहे या आग को आग से बुझाने की कोशिश करे, तो परिणाम विनाशकारी ही होगा। यही सिद्धांत सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों पर भी लागू होता है।

आज के दौर में देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर जनता का आक्रोश दिखाई देता है। कभी यह बेरोजगारी को लेकर होता है, कभी महंगाई पर, कभी किसी प्रशासनिक निर्णय के विरोध में तो कभी सामाजिक असमानताओं के कारण। ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता समस्या की जड़ तक पहुंचने और उसका समाधान खोजने की होती है। लेकिन कई बार देखने में आता है कि वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाजी और प्रचार का शोर अधिक सुनाई देता है। यह स्थिति उस व्यक्ति की तरह है जो आग बुझाने के बजाय उसके आसपास ढोल पीटकर यह जताने की कोशिश करता है कि वह बहुत बड़ा काम कर रहा है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब जनता अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाती है, तो उसे विरोध या विद्रोह के रूप में देखने के बजाय एक संकेत के रूप में समझा जाना चाहिए। यह संकेत बताता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था और जन अपेक्षाओं के बीच दूरी बढ़ रही है। यदि इस दूरी को समय रहते संवाद और सकारात्मक कदमों के माध्यम से कम नहीं किया गया, तो असंतोष का स्वर और अधिक तीव्र हो सकता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी समाज में समस्याओं को दबाने या केवल शब्दों के सहारे टालने से स्थायी समाधान नहीं निकलता। चाहे वह आर्थिक संकट हो, सामाजिक तनाव हो या राजनीतिक असहमति, हर समस्या का समाधान धैर्य, विवेक और सहभागिता से ही संभव हुआ है। जहां संवाद के द्वार खुले रहे, वहां विवाद धीरे-धीरे समाप्त हुए। जहां केवल शक्ति और प्रतिक्रिया को महत्व दिया गया, वहां तनाव और गहरा होता गया।

आज सूचना क्रांति के युग में जनता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। लोग अपने अधिकारों, कर्तव्यों और अपेक्षाओं को समझते हैं। ऐसे में केवल प्रचार और उपलब्धियों के ढोल पीटने से लोगों की वास्तविक चिंताएं समाप्त नहीं होतीं। यदि किसी परिवार में आर्थिक कठिनाई है, तो उसे भाषण नहीं बल्कि रोजगार और अवसर चाहिए। यदि किसान परेशान है, तो उसे आश्वासन से अधिक व्यवहारिक सहायता चाहिए। यदि युवा भविष्य को लेकर चिंतित है, तो उसे नारे नहीं बल्कि संभावनाओं के द्वार चाहिए।

देश में बढ़ता जन आक्रोश भी इसी वास्तविकता की ओर संकेत करता है। आक्रोश स्वयं में समस्या नहीं है; वह अक्सर किसी गहरी समस्या का परिणाम होता है। इसलिए आवश्यकता आक्रोश को दबाने की नहीं, बल्कि उसके कारणों को समझने की है। जब सरकारें, संस्थाएं और समाज मिलकर जनता की बात सुनते हैं, तब विश्वास मजबूत होता है। लेकिन जब केवल प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं और मूल प्रश्नों को अनदेखा किया जाता है, तब असंतोष की आग और फैलने लगती है।

एक जिम्मेदार लोकतंत्र में आलोचना को दुश्मनी नहीं माना जाता। आलोचना सुधार का अवसर होती है। जिस प्रकार चिकित्सक रोग के लक्षणों को देखकर बीमारी का उपचार करता है, उसी प्रकार समाज और शासन को भी जनता की नाराजगी और चिंताओं को समझकर समाधान तलाशना चाहिए। केवल यह बताना कि सब कुछ ठीक है, तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक आम नागरिक स्वयं अपने जीवन में सुधार का अनुभव न करे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समस्याओं पर राजनीति कम और समाधान अधिक हो। संवाद के पुल बनाए जाएं, टकराव की दीवारें नहीं। समाज में विश्वास का वातावरण तैयार किया जाए, भय और भ्रम का नहीं। विकास की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और जनता को यह महसूस हो कि उसकी आवाज सुनी जा रही है।

हमें यह याद रखना होगा कि आग को आग से नहीं बुझाया जा सकता। उसके लिए शीतलता, संयम और सही उपायों की आवश्यकता होती है। ठीक उसी प्रकार जन असंतोष, सामाजिक तनाव और राष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान भी शोर, प्रचार और टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और ठोस कार्यवाही से संभव है। ढोल पीटने से आग नहीं बुझती; उसे बुझाने के लिए पानी चाहिए। और लोकतंत्र में यह पानी है जनता का विश्वास, न्यायपूर्ण व्यवस्था और समस्याओं के प्रति ईमानदार समाधान।

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