विनोद कुमार झा
देश में पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की परेशानियों को और गहरा कर दिया है। हर सुबह तेल कंपनियों द्वारा जारी नए दाम अब केवल आर्थिक आंकड़े नहीं रह गए हैं, बल्कि यह आम नागरिक की चिंता, परिवार के बिगड़ते बजट और देश की आर्थिक दिशा का संकेत बन चुके हैं। शहरों में कार्यालय जाने वाला कर्मचारी हो, गांव का किसान हो, छोटा व्यापारी हो या मध्यम वर्गीय परिवार हर कोई इस महंगाई की मार झेल रहा है।
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का असर केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। माल ढुलाई से लेकर खेती, उद्योग, सार्वजनिक परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं तक हर क्षेत्र कहीं न कहीं ईंधन पर निर्भर है। यही कारण है कि जैसे ही तेल के दाम बढ़ते हैं, वैसे ही बाजार में महंगाई की लहर दौड़ पड़ती है। सब्जियों से लेकर खाद्यान्न, दूध से लेकर निर्माण सामग्री तक सब कुछ महंगा होने लगता है।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं या पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति बनती है, तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर बढ़ती अस्थिरता, युद्ध जैसे हालात और तेल आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर पहुंचा दिया है। इसका परिणाम भारतीय उपभोक्ताओं को महंगे पेट्रोल और डीजल के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
हालांकि केवल वैश्विक परिस्थितियां ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले भारी टैक्स भी कीमतों को ऊंचाई तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए ताकि आम जनता को राहत मिल सके, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका है। सरकारों के लिए ईंधन से मिलने वाला राजस्व आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है।
महंगाई का सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग और गरीब तबके पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित है, उनके लिए रोजमर्रा के खर्चों को संभालना कठिन होता जा रहा है। किसान डीजल की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं क्योंकि सिंचाई और खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है। छोटे व्यापारी माल ढुलाई के खर्च से जूझ रहे हैं। आम नागरिक के सामने स्थिति यह है कि आय वही है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी ईंधन मूल्य वृद्धि हमेशा बड़ा मुद्दा बन जाती है। विपक्ष सरकार को घेरता है, जबकि सरकार वैश्विक कारणों का हवाला देती है। लेकिन जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर राहत कब मिलेगी? केवल बयानबाजी से समस्या का समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता ठोस और दूरदर्शी नीति की है।
आज समय की मांग है कि भारत ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से आगे बढ़े। इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा, जैव ईंधन और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। यदि देश तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करने में सफल होता है, तभी भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकेगा।
सरकार को भी चाहिए कि वह ईंधन पर टैक्स ढांचे की समीक्षा करे और आम जनता को राहत देने के उपाय तलाशे। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, किसानों और छोटे व्यापारियों को विशेष सहायता देना तथा ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। बढ़ती ईंधन कीमतों की सच्चाई केवल महंगाई की कहानी नहीं है। यह देश की आर्थिक चुनौतियों, वैश्विक निर्भरता और ऊर्जा नीति की कमजोरियों का आईना है। यदि समय रहते दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
आज जरूरत केवल कीमतों पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि उस भविष्य को सुरक्षित करने की है जिसमें आम आदमी राहत की सांस ले सके और देश आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन सके।
