तपती धूप में साजन प्रदेश में..

 विनोद कुमार झा 

गांव की पगडंडियों पर जेठ की धूप अंगारों की तरह बरस रही थी। खेतों की मिट्टी तपकर ऐसी हो गई थी मानो धरती भी आग उगल रही हो। हवा चलती तो गर्म लपटों का एहसास होता। आम के पेड़ों पर बैठे पंछी भी चुप थे, जैसे सूरज की तपिश ने उनकी आवाज़ें छीन ली हों। ऐसे मौसम में गांव के लोग दोपहर होते ही अपने-अपने घरों में दुबक जाते, लेकिन राधा हर रोज़ दोपहर के समय गांव के बाहर पुराने पीपल के पेड़ के नीचे जाकर बैठ जाती।

राधा की आंखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। उसका पति मोहन रोज़गार की तलाश में कई महीने पहले “साजन प्रदेश” चला गया था। गांव में लोग शहर को ही साजन प्रदेश कहते थे, क्योंकि वहां जाकर लोग अपने सपनों के साथ-साथ अपनों से भी दूर हो जाते थे। मोहन ने जाते समय कहा था, “राधा, बस कुछ महीने की बात है। पैसे कमा लूं, फिर तुम्हें कभी दुख नहीं होने दूंगा।”

राधा ने मुस्कुराकर उसकी बात मान ली थी, लेकिन उसे क्या पता था कि कुछ महीने इतने लंबे हो जाएंगे कि हर दिन एक साल जैसा लगेगा।

मोहन शहर में एक निर्माण कंपनी में मजदूरी करता था। वहां ऊंची-ऊंची इमारतें बनती थीं, लेकिन उन इमारतों के नीचे मजदूरों के सपने अक्सर टूट जाया करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले काम शुरू होता और रात के अंधेरे तक चलता। मोहन जब भी थककर बैठता, उसकी आंखों के सामने राधा का चेहरा आ जाता। वह सोचता, “मैं ये सब उसी के लिए तो कर रहा हूं।”

इधर गांव में राधा की जिंदगी भी आसान नहीं थी। बूढ़ी सास की सेवा, खेत का काम और समाज के ताने  सब कुछ उसे अकेले झेलना पड़ रहा था। गांव की औरतें अक्सर कहतीं, “शहर गए मर्द जल्दी बदल जाते हैं।” यह सुनकर राधा का दिल कांप उठता, लेकिन उसे अपने मोहन पर पूरा भरोसा था।

एक दिन दोपहर में जब धूप अपने चरम पर थी, डाकिया गांव में आया। उसके हाथ में एक पुराना-सा लिफाफा था। राधा दौड़कर बाहर आई। पत्र मोहन का था। कांपते हाथों से उसने खत खोला।

“प्रिय राधा,

यहां की धूप गांव से भी ज्यादा तपती है। सीमेंट और पत्थरों के बीच काम करते-करते शरीर जल जाता है, लेकिन तुम्हारी याद मुझे ठंडी छांव जैसी लगती है। मैं जल्दी लौटूंगा। बस थोड़ा और इंतजार करना…”

राधा की आंखों से आंसू बह निकले। उसने उस खत को सीने से लगा लिया। उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि दूरी केवल शरीरों की होती है, दिलों की नहीं।

दिन बीतते गए। सावन आया, फिर चला गया। गांव में त्योहार आए, लेकिन राधा के चेहरे की उदासी कम नहीं हुई। एक रात अचानक गांव में तेज आंधी आई। बिजली चमक रही थी और बारिश मूसलाधार हो रही थी। उसी रात दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।

राधा ने डरते-डरते दरवाजा खोला। सामने मोहन खड़ा था  धूल, पसीने और बारिश से भीगा हुआ। उसके हाथ में एक छोटा-सा बैग था और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। राधा कुछ पल उसे देखती रह गई। फिर उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

“तुम आ गए…?”

मोहन ने मुस्कुराकर कहा, “तपती धूप बहुत सह ली राधा… अब अपनी छांव में जीना है।” उस रात बरसात गांव पर ही नहीं, उनके सूखे जीवन पर भी बरसी। मोहन ने बताया कि शहर की जिंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखाया है। पैसे जरूरी हैं, लेकिन अपनों से बढ़कर कुछ नहीं।

धीरे-धीरे दोनों ने गांव में ही छोटा-सा काम शुरू किया। मोहन ने मजदूरी से जो पैसे बचाए थे, उनसे खेत के पास एक छोटी दुकान खोल ली। अब वह रोज़ शाम को घर लौट आता और राधा उसके लिए आंगन में चूल्हे पर रोटियां सेंकती।

एक दिन राधा ने मुस्कुराकर पूछा, “शहर की चमक याद नहीं आती?”

मोहन ने उसकी ओर देखकर कहा, “जिस घर में अपना प्यार हो, वही सबसे बड़ा शहर होता है।”

पीपल के पेड़ के नीचे अब राधा अकेली नहीं बैठती थी। वहां अक्सर मोहन उसके साथ बैठकर शाम की ठंडी हवा का आनंद लेता। तपती धूप अब भी आती थी, लेकिन अब उनके जीवन में प्रेम की ऐसी छांव थी, जिसने हर कठिनाई को आसान बना दिया था।

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