लेखक: विनोद कुमार झा
मई का महीना अपना रौद्र रुप के अंतिम सप्ताह में चल रहे हैं और जून का महीना आने वाले हैं। सूरज मानो आसमान से आग बरसा रहा हो। धरती तवे की तरह तप रही है और हवाओं में ऐसी जलन घुल चुकी है कि सांस लेना तक कठिन लगने लगा है। गांव की पगडंडियां सुनसान थीं। दोपहर होते-होते ऐसा लगता मानो पूरा गांव किसी अदृश्य भय से घरों में कैद हो गया हो। पेड़ों की पत्तियां धूल और गर्मी से झुलस चुकी थीं। कुएं का पानी भी गर्म हो गया था। दूर खेतों में सूखी मिट्टी की दरारें किसानों की टूटी उम्मीदों जैसी दिखाई दे रही थीं।
गांव के अंतिम छोर पर मिट्टी और खपरैल से बना एक छोटा-सा घर था। उसी घर में रहता था रामदीन। उम्र लगभग पचपन वर्ष, शरीर कमजोर, चेहरे पर संघर्ष की गहरी रेखाएं और आंखों में परिवार को बचाए रखने की चिंता। गरीबी उसके जीवन की ऐसी सच्चाई थी, जिससे वह चाहकर भी मुंह नहीं मोड़ सकता था। घर में बूढ़ी मां, पत्नी सुशीला, बेटा मोहन और छोटी बेटी गुड़िया थी। परिवार का पूरा भार रामदीन के कंधों पर था।
हर रोज की तरह उस दिन भी वह सुबह चार बजे उठ गया। बाहर अभी हल्का अंधेरा था, लेकिन गर्मी का असर रात में भी कम नहीं हुआ था। वह आंगन में रखे मटके से पानी निकालकर मुंह धोने लगा। तभी उसकी बूढ़ी मां खांसते हुए बोली, “बेटा, इतनी गर्मी में मत जाया कर। शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा।”
रामदीन मुस्कुरा दिया। “अम्मा, अगर मैं नहीं जाऊंगा तो घर कैसे चलेगा?” उसकी आवाज में मजबूरी साफ झलक रही थी।
सुशीला चूल्हे पर सूखी रोटियां सेंक रही थी। घर में सब्जी नहीं थी, इसलिए उसने नमक और प्याज के साथ रोटियां बांध दीं। जाते-जाते उसने धीरे से कहा, “जल्दी लौट आइएगा। कल भी आपको चक्कर आ गया था।”
रामदीन ने गमछा सिर पर बांधा और बिना कुछ बोले घर से निकल पड़ा। गांव की गलियों से गुजरते हुए वह शहर जाने वाली सड़क पर पहुंचा। रास्ते में उसे कई मजदूर मिले। सबके चेहरे पर थकान और चिंता थी। गर्मी इतनी भयानक थी कि सूरज निकलने से पहले ही शरीर पसीने से भीग जाता था।
शहर लगभग दस किलोमीटर दूर था। रामदीन रोज साइकिल से वहां जाता था। रास्ते में कहीं छांव नहीं थी। गर्म हवा के थपेड़े उसके चेहरे पर पड़ते और ऐसा लगता जैसे कोई आग का गोला शरीर से टकरा रहा हो। लेकिन उसके मन में सिर्फ एक ही चिंता थी आज काम मिलेगा या नहीं।
शहर पहुंचते-पहुंचते सूरज तेज हो चुका था। सड़कें तप रही थीं। लोग सिर ढककर तेजी से अपने काम पर जा रहे थे। निर्माणाधीन इमारत के पास मजदूरों की भीड़ लगी थी। ठेकेदार ने कुछ मजदूरों को काम पर रखा। रामदीन भी उनमें शामिल हो गया। उसे ईंट और सीमेंट ढोने का काम मिला।
सुबह के कुछ घंटे तो किसी तरह निकल गए, लेकिन दोपहर होते-होते गर्मी ने विकराल रूप ले लिया। हवा मानो आग उगल रही थी। मजदूरों के गले सूखने लगे। किसी के पास पर्याप्त पानी नहीं था। पास लगे नल से गर्म पानी निकल रहा था। फिर भी लोग वही पीकर काम कर रहे थे।
रामदीन लगातार काम करता रहा। उसके माथे से पसीना बह रहा था। हाथ कांपने लगे थे। अचानक उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वह जमीन पर गिर पड़ा।
“अरे रामदीन!” एक मजदूर चिल्लाया। सभी लोग उसके पास दौड़े। किसी ने पानी डाला, किसी ने गमछा भिगोकर उसके सिर पर रखा। थोड़ी देर बाद उसे होश आया। उसकी सांसें तेज चल रही थीं। ठेकेदार ने नाराज होकर कहा, “अगर काम नहीं कर सकते तो घर बैठो।”
यह सुनकर रामदीन की आंखें झुक गईं। उसे अपनी बीमारी या दर्द से ज्यादा मजदूरी कटने का डर था। उसने कमजोर आवाज में कहा, “मालिक, थोड़ा ठीक लग रहा है… काम कर लूंगा।”
दूसरे मजदूर उसकी मजबूरी समझ रहे थे। आखिर गरीब आदमी के पास बीमारी से लड़ने की फुर्सत कहां होती है?
शाम तक किसी तरह काम खत्म हुआ। मजदूरी में उसे सिर्फ चार सौ रुपये मिले। उसने कांपते हाथों से पैसे जेब में रखे और साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में गर्म हवाएं अब भी चल रही थीं। सूरज ढल रहा था, लेकिन तपिश कम नहीं हुई थी।
घर पहुंचते ही गुड़िया दौड़कर उससे लिपट गई।
“बाबूजी, मेरे लिए क्या लाए?”
रामदीन ने मुस्कुराते हुए जेब से दो टॉफियां निकालीं। बेटी की आंखें चमक उठीं। उस छोटी-सी खुशी ने उसकी सारी थकान कुछ पल के लिए मिटा दी।
रात को सब लोग आंगन में लेटे थे। बिजली फिर चली गई थी। आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। गर्म हवा अब भी बह रही थी। सुशीला ने धीरे से पूछा, “सच बताइए, तबीयत ठीक है ना?”
रामदीन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “आज काम करते-करते गिर पड़ा था।” सुशीला घबरा गई। “हे भगवान! फिर भी काम करते रहे?”
रामदीन ने गहरी सांस ली। “क्या करता? अगर मजदूरी कट जाती तो बच्चों को खाना कैसे खिलाता?” यह सुनकर सुशीला की आंखें भर आईं। गरीबी इंसान को कितना मजबूर बना देती है, यह बात वह अच्छी तरह समझती थी।
अगले दिन गांव में खबर फैली कि शहर में लू लगने से कई मजदूरों की मौत हो गई है। लोग सहमे हुए थे। गांव के बुजुर्ग चौपाल पर बैठे मौसम की मार की चर्चा कर रहे थे। कोई कहता, “अब पहले जैसी गर्मी नहीं रही।” कोई कहता, “पेड़ कट गए, इसलिए प्रकृति नाराज है।”
लेकिन इन चर्चाओं से गरीबों की जिंदगी नहीं बदलती। अगले ही दिन मजदूर फिर शहर की ओर निकल पड़े। खेतों में किसान फिर हल चलाने लगे। रिक्शावाले फिर तपती सड़कों पर सवारियां ढूंढने लगे। क्योंकि जिंदगी रुकती नहीं।
कुछ दिनों बाद रामदीन का बेटा मोहन स्कूल से लौटा। उसके हाथ में रिपोर्ट कार्ड था। वह खुशी से बोला, “बाबूजी, मैं कक्षा में प्रथम आया हूं!”
रामदीन की आंखों में चमक आ गई। उसने बेटे को गले लगा लिया। उस क्षण उसे लगा मानो उसकी सारी मेहनत सफल हो गई हो। उसने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बेटा, खूब पढ़-लिख लेना। ताकि तुम्हें मेरी तरह इस तपती धूप में मजदूरी न करनी पड़े।” मोहन ने मासूमियत से पूछा, “तब आप काम नहीं करेंगे?”
रामदीन हल्का मुस्कुराया। “जब तुम बड़े आदमी बन जाओगे ना, तब मैं आराम करूंगा।” उस रात लंबे समय बाद रामदीन ने सुकून महसूस किया। बाहर लू के थपेड़े अब भी चल रहे थे, लेकिन उसके भीतर उम्मीद की ठंडी छांव जन्म ले चुकी थी।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। गर्मी कम हुई, बारिश आई, खेत फिर हरे हुए। लेकिन रामदीन के जीवन का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। फिर भी उसने हार नहीं मानी। क्योंकि उसे पता था कि जिंदगी का असली अर्थ कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद बनाए रखना है।
लू सिर्फ शरीर को झुलसाती है, लेकिन संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है। गरीब आदमी की जिंदगी तपती धूप में जलते उस दीपक जैसी होती है, जो आंधियों और गर्म हवाओं के बीच भी बुझने से इंकार कर देता है। परिवार की मुस्कान, बच्चों के सपने और भविष्य की उम्मीद ही उसके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं।
और शायद यही जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है :- मुश्किलें चाहे जितनी भी बड़ी हों, इंसान उम्मीद के सहारे जीना नहीं छोड़ता।
