-जो रिश्ता बाहरी चमक-दमक पर टिका हो, वह समय के साथ टूट जाता है
- सच्चा प्यार त्याग, विश्वास और साथ निभाने का नाम है, दिखावे का नहीं
विनोद कुमार झा
शाम का वक्त था शहर की भागदौड़ जिंदगी के बीच एक छोटा-सा पार्क हमेशा की तरह शांत दिखाई दे रहा था। उसी पार्क की एक बेंच पर बैठा आरव अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहा था। हर पन्ने पर सिर्फ एक ही नाम लिखा था “नैना”। वह नाम, जो कभी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत हकीकत हुआ करता था, आज सिर्फ एक अधूरी याद बनकर रह गया था।
आरव और नैना की मुलाकात कॉलेज के दिनों में हुई थी। आरव साधारण परिवार का सीधा-सादा लड़का था, जबकि नैना खूबसूरत, चंचल और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। शुरुआत में दोनों सिर्फ दोस्त थे, लेकिन धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई। कॉलेज की कैंटीन, लाइब्रेरी की खामोशियां और बारिश में भीगती सड़कें सब उनके प्यार के गवाह बन गए।
नैना अक्सर आरव से कहा करती थी, “तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी अधूरी है।” और आरव उस पर आंख बंद करके विश्वास कर लेता था। उसने अपने हर सपने में नैना को शामिल कर लिया था। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं। परिवारों के विरोध के बावजूद आरव ने हर मुश्किल का सामना किया। उसने नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत की ताकि वह नैना को एक बेहतर जिंदगी दे सके।
समय बीतता गया और आखिर वह दिन भी आया जब दोनों का प्यार अपने अंजाम तक पहुंच गया। परिवार मान गए और धूमधाम से उनकी शादी हो गई। आरव को लगा कि अब उसकी जिंदगी पूरी हो गई है। वह नैना की हर छोटी-बड़ी खुशी का ध्यान रखता। उसकी मुस्कान के लिए खुद की इच्छाओं तक को भूल जाता।
कुछ महीनों बाद उनके घर एक नन्ही बेटी ने जन्म लिया। वह उनकी मोहब्बत का सबसे सुंदर प्रतिफल थी। आरव अपनी बेटी को गोद में लेकर घंटों खेलता रहता। उसे लगता था कि भगवान ने उसकी जिंदगी में सारी खुशियां भर दी हैं। लेकिन धीरे-धीरे नैना बदलने लगी।
अब उसे आरव का साधारण जीवन पसंद नहीं आता था। वह अक्सर सोशल मीडिया पर अमीर लोगों की जिंदगी देखकर खुद की तुलना करने लगी। महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ियां और चमक-दमक वाली दुनिया उसे अपनी ओर खींचने लगी।
एक दिन उसने आरव से कहा, “तुम मुझे वो जिंदगी नहीं दे सकते जिसकी मैंने कल्पना की थी।” आरव यह सुनकर हैरान रह गया। उसने समझाने की कोशिश की, “नैना, प्यार में सुख-दुख साथ होते हैं। मैंने हमेशा तुम्हें खुश रखने की कोशिश की है।” लेकिन नैना के दिल में अब प्यार से ज्यादा दिखावे की चाहत घर कर चुकी थी।
धीरे-धीरे उसने आरव से दूरी बनानी शुरू कर दी। पहले बातें कम हुईं, फिर मुस्कानें गायब हो गईं और आखिरकार एक दिन वह अपनी बेटी को छोड़कर मायके चली गई। जाते-जाते सिर्फ इतना कहा “मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है।”
उस दिन आरव पूरी तरह टूट गया। जिस लड़की के लिए उसने दुनिया से लड़ाई लड़ी, वही उसे अकेला छोड़ गई थी। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी बेटी को मां और पिता दोनों का प्यार दिया। हर रात जब बेटी अपनी मां के बारे में पूछती, तो उसकी आंखें नम हो जातीं, लेकिन वह मुस्कुराकर कहता, “तुम्हारी मां बहुत अच्छी है, बस थोड़ी दूर रहती है।” साल बीत गए।
एक दिन अचानक नैना वापस उसी पार्क में आरव के सामने खड़ी थी। उसके चेहरे की चमक फीकी पड़ चुकी थी। जिस दिखावे और दौलत के पीछे वह भागी थी, वहां उसे सिर्फ अकेलापन मिला। जिन लोगों की दुनिया उसे आकर्षित करती थी, वहां रिश्तों की कोई कीमत नहीं थी।
उसने धीमी आवाज में कहा, “आरव, क्या तुम मुझे माफ कर सकते हो?” आरव कुछ पल चुप रहा। फिर मुस्कुराकर बोला, “माफ तो मैंने तुम्हें उसी दिन कर दिया था, जिस दिन तुम गई थीं। क्योंकि सच्चा प्यार नफरत करना नहीं सिखाता।”
नैना की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे एहसास हो चुका था कि असली खुशी दिखावे में नहीं, बल्कि उस इंसान के साथ होती है जो हर हाल में आपका साथ निभाए। लेकिन कुछ रिश्ते टूटने के बाद दोबारा पहले जैसे नहीं बन पाते।
आरव अपनी बेटी का हाथ पकड़कर वहां से चला गया। नैना दूर खड़ी उसे जाते हुए देखती रही। उस दिन उसे समझ आया कि दिखावे की चमक कुछ समय के लिए आंखों को जरूर आकर्षित कर सकती है, लेकिन सच्चे प्यार की रोशनी जिंदगी भर दिल को सुकून देती है।
जो रिश्ता सिर्फ बाहरी चमक-दमक पर टिका हो, वह समय के साथ टूट जाता है। सच्चा प्यार त्याग, विश्वास और साथ निभाने का नाम है, दिखावे का नहीं।
