गंगा दशहरा 25 को, आस्था और पुण्य का महापर्व

 विनोद कुमार झा 

भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि वे समाज की चेतना और मानवता के मूल्यों का प्रतीक बन जाते हैं। गंगा दशहरा ऐसा ही एक पावन पर्व है, जो श्रद्धा, शुद्धता, दान और आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश देता है। ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में जब श्रद्धालु “हर-हर गंगे” के जयघोष के साथ गंगा तटों की ओर बढ़ते हैं, तब यह पर्व केवल स्नान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मशुद्धि और लोककल्याण का माध्यम बन जाता है।

मान्यता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसलिए गंगा दशहरा को “गंगा अवतरण दिवस” भी कहा जाता है।

इस वर्ष गंगा दशहरा 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार दशमी तिथि का आरंभ 25 मई को प्रातः लगभग 04:30 बजे से होगा और समापन 26 मई को प्रातः लगभग 05:10 बजे तक रहेगा।

स्नान मुहूर्त : धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त और सूर्योदय के समय गंगा स्नान विशेष पुण्यदायी माना जाता है। इस वर्ष प्रातः 04:30 बजे से 07:00 बजे तक का समय स्नान के लिए शुभ रहेगा।

मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। “दशहरा” का अर्थ भी दस पापों का हरण माना गया है।

धार्मिक महत्व : भारतीय सभ्यता में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि “माँ” का स्वरूप मानी जाती हैं। गंगा का जल करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन का आधार रहा है। पुराणों के अनुसार गंगा स्नान, पूजा और ध्यान से व्यक्ति को मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है।

हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज और वाराणसी जैसे तीर्थों में इस दिन लाखों श्रद्धालु स्नान और पूजा-अर्चना करते हैं। गंगा आरती और दीपदान का दृश्य वातावरण को भक्तिमय बना देता है।

दान का महत्व : गंगा दशहरा पर दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। भीषण गर्मी के समय जल, शरबत, फल, वस्त्र और अन्न का दान श्रेष्ठ माना जाता है। कई लोग प्याऊ लगाकर राहगीरों को शीतल जल पिलाते हैं। यह परंपरा सेवा और मानवता की भावना को मजबूत करती है।

धर्मग्रंथों में जलदान को महादान कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

पौराणिक कथा : कथा के अनुसार राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ गंगा पृथ्वी पर आने को तैयार हुईं।

गंगा के प्रचंड वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया और फिर पृथ्वी पर प्रवाहित किया। गंगा के स्पर्श से सगर पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। तभी से गंगा दशहरा मोक्ष और शुद्धि का पर्व माना जाता है।

गंगा दशहरा केवल पूजा और स्नान का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है। आज गंगा प्रदूषण और प्लास्टिक जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में हर श्रद्धालु का कर्तव्य है कि वह गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखने में योगदान दे। सच्ची श्रद्धा तभी सार्थक होगी, जब हम गंगा की पवित्रता को बनाए रखने का संकल्प लें।

गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां आस्था के साथ सेवा, धर्म के साथ मानवता और पूजा के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश जुड़ा हुआ है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन की वास्तविक पवित्रता केवल बाहरी स्नान में नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों की शुद्धता में होती है।

“हर-हर गंगे” का उद्घोष आज भी भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा को प्रकट करता है।

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