होली के रंगों में घुला प्रेमी-प्रेमिका का प्यार

 -मन के सारे भेद मिटाकर प्रेम के रंग में रंग जाएं

विनोद कुमार झा 

फाल्गुन का महीना आते ही जैसे धरती पर रंगों की चादर बिछ जाती है। खेतों में लहलहाती फसल, आम के पेड़ों पर आए मंजर की भीनी-भीनी खुशबू और कोयल की कूक से गूंजता वातावरण सब मिलकर यह घोषणा कर देते हैं कि होली बस दस्तक देने ही वाली है। शहर हो या गांव, हर ओर एक ही चर्चा इस बार होली कैसी होगी?

गांव के बीचों-बीच बसे गुलाब के गुवाड़ में बैठी राधिका की आंखें आज रास्ते पर टिकी थीं। उसका पिया अरुण शहर में नौकरी करता था। पिछली होली वह नहीं आ सका था। इस बार उसने वादा किया था “फाल्गुन की पूर्णिमा से पहले पहुंच जाऊंगा।” राधिका का मन हर आहट पर चौंक उठता। कभी बैलों की घंटियों की आवाज, कभी मोटरसाइकिल की घरघराहट उसे लगता, शायद अरुण आ गया।

मोबाइल फोन उसके हाथ में ही रहता। जैसे ही स्क्रीन चमकती, दिल धड़क उठता। कई बार बेकार के संदेश आते, तो कभी सहेलियों के फोन। पर जिस रिंग का इंतजार था, वह अब तक नहीं आई थी। प्रेम का यह इंतजार भी अपने आप में एक उत्सव था मीठा, बेचैन और उम्मीदों से भरा।

उधर गांव के नवयुवक मंडल ने चौपाल पर बैठक कर ली थी। रंग, गुलाल और पिचकारियों की सूची बन रही थी। कोई कह रहा था “इस बार बाजार से इत्र वाला गुलाल लाएंगे।” तो कोई बोला “ढोलक और मंजीरे भी ठीक कर लो, इस बार की होली यादगार होनी चाहिए।” उनके मन में सिर्फ उत्सव नहीं, एक मीठी शरारत भी थी किसी को अपनी मनचाही को रंग लगाने की चाह, तो किसी को पहली बार अपने मन की बात कहने का साहस।

बाजारों की रौनक देखते ही बनती थी। मिठाई की दुकानों पर ताजे गुझिए तलते हुए कढ़ाई से उठती खुशबू हवा में घुल रही थी। रंग-बिरंगे गुलाल से सजी दुकानें, पिचकारियों की कतारें, और बच्चों की आंखों में चमक सब मिलकर एक जीवंत चित्र रच रहे थे। दुकानदार भी मुस्कुरा रहे थे, मानो उनके लिए भी यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि भावनाओं का पर्व हो।

गांव की चौपाल पर बैठे बड़े-बूढ़े अपनी जवानी के किस्से सुनाते। कोई कहता “हमारे समय में होली में पूरे गांव की टोली निकलती थी, ढोलक बजती थी, और हम सुबह से शाम तक रंग में डूबे रहते थे।” दूसरा हंसते हुए जोड़ता “और तब किसी की नाराजगी भी होली के रंग में धुल जाती थी।” उनकी बातों में अनुभव का रंग था, अपनापन था, और एक संदेश भी कि होली केवल रंगों का नहीं, रिश्तों को जोड़ने का त्योहार है।

राधिका की सहेली मीरा नवविवाहिता थी। यह उसकी ससुराल की पहली होली थी। मन में संकोच भी था और उत्साह भी। वह सोच रही थी “कैसे होंगे यहां के रीति-रिवाज? क्या मैं सबके साथ खुलकर रंग खेल पाऊंगी?” उसका पति रोहन उसे आश्वस्त करता “होली में सब अपने हो जाते हैं। यहां देवर-भाभी, शाली-जीजाजी सब हंसी-मजाक में रंगते हैं। डरने की जरूरत नहीं।”

फाल्गुन की हवा में जैसे प्रेम घुला था। आम के मंजर की खुशबू और कोयल की मीठी आवाज राधिका के मन को और भी व्याकुल कर रही थी। उसे अरुण की बातें याद आतीं “जब कोयल बोलेगी, समझना मैं पास ही हूं।” वह मुस्कुरा देती, फिर आंखें नम हो जातीं।

इसी बीच होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो गईं। बच्चे लकड़ियां इकट्ठी कर रहे थे। महिलाएं गीत गा रही थीं “होली आई रे…” पूरे गांव में एक आध्यात्मिक उल्लास फैल गया। होलिका दहन की अग्नि के चारों ओर सबने परिक्रमा की। किसी ने मन की कड़वाहट को आग में समर्पित किया, तो किसी ने नए रिश्तों की शुरुआत का संकल्प लिया।

होलिका दहन की रात, जब राधिका निराश होकर अपने आंगन में बैठी थी, तभी फोन की रिंग बजी। स्क्रीन पर नाम चमका “अरुण।” कांपते हाथों से उसने फोन उठाया। उधर से आवाज आई “मैं बस स्टैंड पर हूं, लेने नहीं आओगी?” राधिका की आंखों से आंसू बह निकले इस बार खुशी के।

अगली सुबह गांव रंगों में डूब गया। ढोल की थाप पर युवक नाच रहे थे। देवर-भाभी की छेड़छाड़, शाली-जीजाजी की हंसी, बच्चों की किलकारियां हर ओर उमंग का समंदर था। अरुण ने जब राधिका के गाल पर हल्का सा गुलाल लगाया, तो वह लजा गई। उसके इंतजार का हर पल उस एक स्पर्श में सिमट आया था।

मीरा भी अब पूरे आत्मविश्वास से रंग खेल रही थी। ससुराल के आंगन में वह अब नई नहीं, अपनी लगने लगी थी। रोहन ने उसके माथे पर रंग लगाया, और परिवार ने तालियां बजाईं। होली ने उसे नए घर से जोड़ दिया था।

शाम होते-होते पूरा गांव थककर भी मुस्कुरा रहा था। रंगों से सने चेहरे, भीगे कपड़े और दिलों में भरा अपनापन यह दृश्य किसी चित्रकार की कल्पना से कम नहीं था।

होली का यह उत्सव केवल एक दिन का नहीं, बल्कि एक एहसास है जो दूर बैठे प्रेमी को घर खींच लाता है, जो नवविवाहिता को नए परिवार से जोड़ देता है, जो युवाओं को अपने प्रेम का इजहार करने का साहस देता है, और जो बुजुर्गों को अपनी मीठी यादों में फिर से जवान बना देता है।

फाल्गुन की इस रंगभरी हवा में एक संदेश छिपा है रंग चाहे कितने भी अलग हों, मिलकर ही खूबसूरत लगते हैं। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।  मन के सारे भेद मिटाकर प्रेम के रंग में रंग जाएं, क्योंकि अंततः यही रंग सबसे गहरा और स्थायी होता है।

(बुरा न मानो होली है)

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