सुंदरता की बखान करती प्रकृति...

 लेखक: विनोद कुमार झा 

सुबह की पहली किरण जब पूर्व दिशा से झांकती है, तो ऐसा लगता है मानो धरती ने अपनी पलकों से रात की नींद झटक दी हो। हल्की सुनहरी रोशनी खेतों पर फैलती है, ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमकती हैं और दूर से मंदिर की घंटियों की ध्वनि वातावरण में एक मधुर लय भर देती है। इसी शांत, पवित्र और जीवंत परिवेश में बसा था छोटा-सा गाँव सोनपुर जहाँ प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य का उत्सव मनाती प्रतीत होती थी।

गाँव के चारों ओर सरसों के पीले खेत लहराते, आम के बागों में कोयल की कूक गूँजती और नीम के पेड़ों पर चिड़ियों की चहचहाहट सुबह का स्वागत करती। तालाब का पानी इतना स्वच्छ कि उसमें आसमान का प्रतिबिंब साफ दिखाई देता। मानो धरती और आकाश एक-दूसरे से बातें कर रहे हों।

इसी गाँव में रहती थी नायिका सुमन। उसका नाम ही जैसे फूलों की सुगंध का पर्याय था। वह साधारण परिवार की बेटी थी, पर उसकी आँखों में असाधारण चमक थी। सुबह-सुबह वह तालाब किनारे जाती, सूरज को अर्घ्य देती और फिर खेतों में काम करती अपनी माँ की मदद करती। उसके बालों में अक्सर गुलाब या चमेली का फूल सजा होता, और उसकी मुस्कान में मानो बसंत की मिठास छिपी रहती।

गाँव के दूसरे छोर पर रहता था नायक आरव। वह चित्रकार था, लेकिन उसके चित्र कैनवास से ज्यादा प्रकृति पर आधारित होते। वह पेड़ों की छाल, नदी की लहरें, पक्षियों की उड़ान और फूलों के रंगों में जीवन खोजता। उसके लिए प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवंत आत्मा थी।

एक सुबह आरव तालाब के किनारे बैठकर चित्र बना रहा था। अचानक उसकी नजर सुमन पर पड़ी, जो पानी में झुकी हुई कमल का फूल तोड़ रही थी। सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं, जिससे वह किसी देवी की तरह प्रतीत हो रही थी। आरव के हाथ स्वतः ही ब्रश चलने लगे। उसने बिना बोले सुमन का चित्र उकेरना शुरू कर दिया।

सुमन ने यह देखा तो हल्की-सी मुस्कान दी। उसने पूछा, “आप किसे बना रहे हैं?”

आरव थोड़ा झिझका, फिर बोला, “प्रकृति को… और शायद उसमें छिपी सबसे सुंदर रचना को।”

दोनों की आँखें मिलीं, और उसी क्षण प्रेम का बीज बो दिया गया—बिना किसी बड़े वादे के, बिना शब्दों के।

दिन बीतते गए। सुमन और आरव अक्सर खेतों में मिलते। कभी वे सरसों के बीच चलते, कभी आम के पेड़ के नीचे बैठकर बातें करते। पक्षी मानो उनके प्रेम के गवाह बनकर गीत गाते। मोर अपनी रंगीन पंख फैलाकर नाचते, तो पपीहे बारिश का आह्वान करते।

बरसात का मौसम आया। आसमान काले बादलों से घिर गया, और पहली बूंद धरती पर गिरी तो मिट्टी की सौंधी खुशबू चारों ओर फैल गई। सुमन और आरव बारिश में भीगते हुए हँस रहे थे। पानी की बूँदें उनके चेहरे पर चमक रही थीं, जैसे प्रकृति खुद उन्हें आशीर्वाद दे रही हो। पर जीवन केवल सुंदरता नहीं, संघर्ष भी लाता है।

गाँव में सूखा पड़ने लगा। तालाब सूखने लगा, खेतों में दरारें पड़ गईं, और पक्षियों का कलरव भी धीमा हो गया। लोग चिंतित थे। सुमन की माँ बीमार पड़ गईं और आरव के पिता कर्ज में डूब गए।

इसी संकट के समय सुमन और आरव ने निर्णय लिया—वे गाँव को बचाने के लिए कुछ करेंगे।

आरव ने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई, जिसमें उसने सोनपुर की प्राकृतिक सुंदरता को दिखाया हरे-भरे खेत, पक्षियों का संसार, तालाब, पेड़ और लोगों की सरल जीवनशैली। उसके चित्र देखकर शहर के एक समाजसेवी समूह ने गाँव को गोद लेने का प्रस्ताव रखा।

साथ ही सुमन ने महिलाओं के साथ मिलकर वृक्षारोपण अभियान शुरू किया। हर घर के सामने एक पौधा लगाया गया नीम, पीपल, आम और बरगद। बच्चों को भी इसमें शामिल किया गया ताकि वे प्रकृति से जुड़ाव महसूस करें।

धीरे-धीरे गाँव फिर से हरा-भरा होने लगा। तालाब में पानी भर गया, पक्षी लौट आए और खेतों में नई फसल लहलहाने लगी। सोनपुर फिर से जीवन से भर उठा।

एक दिन, उसी तालाब किनारे, सूरज ढलते समय आरव ने सुमन का हाथ पकड़ा और कहा, “तुम सिर्फ मेरी प्रेमिका नहीं, बल्कि इस धरती की आत्मा हो।”

सुमन मुस्कुराई और बोली, “और तुम इस प्रकृति की आवाज़ हो।” दोनों ने साथ मिलकर प्रण लिया कि वे जीवन भर प्रकृति की रक्षा करेंगे, प्रेम को संजोएंगे और मानवता की सुंदरता को बचाए रखेंगे। यह कहानी बताती है कि प्रकृति, प्रेम और मानव जीवन एक-दूसरे से जुड़े हैं।

जहाँ प्रकृति सुंदर होगी, वहाँ प्रेम पनपेगा;

जहाँ प्रेम होगा, वहाँ जीवन फल-फूलेगा।

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