लोकसभा का हालिया सत्र भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण भी है और उसकी चुनौतियों का आईना भी। बजट पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा अमेरिका के साथ हुई कथित ट्रेड डील को “संपूर्ण सरेंडर” करार देना और सरकार पर “दबाव में हस्ताक्षर” करने का आरोप लगाना सियासी तापमान को चरम पर ले गया। दूसरी ओर सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को तथ्यहीन बताते हुए विशेषाधिकार हनन की चेतावनी दी। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में मूल प्रश्न यह है कि क्या संसद में बहस तथ्यों और तर्कों पर केंद्रित रहेगी, या फिर राजनीतिक कटाक्ष ही विमर्श का केंद्र बन जाएगा?
राहुल गांधी ने किसानों की आजीविका, ऊर्जा सुरक्षा, डेटा लोकलाइजेशन, टेक्सटाइल उद्योग और टैक्स ढांचे जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने संकेत दिया कि यदि किसी व्यापार समझौते से देश के रणनीतिक हित प्रभावित होते हैं, तो उसकी शर्तों और प्रक्रिया पर पारदर्शिता अनिवार्य है। यह विपक्ष का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है कि वह संभावित जोखिमों की ओर ध्यान दिलाए। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि स्वस्थ बहस की पूर्वशर्त है।
किन्तु उतना ही आवश्यक है कि आरोपों के साथ ठोस प्रमाण और स्पष्ट तथ्य भी प्रस्तुत किए जाएं। संसद भावनात्मक नारों का मंच नहीं, नीतिगत स्पष्टता का मंच है। यदि डील में वाकई ऐसे प्रावधान हैं जो दीर्घकालिक रूप से देशहित के प्रतिकूल हैं, तो सरकार को श्वेतपत्र जारी कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं विपक्ष को भी तथ्यों की प्रामाणिकता के साथ अपनी बात रखनी चाहिए, ताकि चर्चा व्यक्तिगत हमलों से ऊपर उठकर नीतिगत विमर्श में परिवर्तित हो सके।
सत्ता पक्ष की ओर से कांग्रेस पर अतीत के निर्णयों और विदेशी संबंधों को लेकर पलटवार किया गया। अनुराग ठाकुर और किरेन रिजीजू ने राहुल गांधी के आरोपों को झूठा और नियम विरुद्ध बताया। यह स्वाभाविक है कि सरकार अपनी नीतियों का बचाव करेगी, लेकिन जवाब का स्तर भी उतना ही गंभीर और तथ्याधारित होना चाहिए जितने गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संसद में “कौन पहले गया” या “कौन कितनी देर रुका” जैसे मुद्दे बहस की गुणवत्ता को कम ही करते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का आचरण उल्लेखनीय रहा। विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में तकनीकी त्रुटियां होने के बावजूद उसे खारिज करने के बजाय सुधार का अवसर देना संसदीय मर्यादा का उदाहरण है। यह संदेश देता है कि पद की गरिमा दलगत राजनीति से ऊपर है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता ऐसे ही निर्णयों से मजबूत होती है।
वास्तव में यह समय राजनीतिक अंकगणित का नहीं, आर्थिक और रणनीतिक स्पष्टता का है। वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है ऊर्जा आपूर्ति, तकनीकी संप्रभुता, कृषि प्रतिस्पर्धा और डेटा सुरक्षा जैसे विषय राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आयाम बन चुके हैं। यदि कोई भी व्यापार समझौता इन क्षेत्रों को प्रभावित करता है, तो उसकी शर्तें जनता के सामने स्पष्ट होनी चाहिए। पारदर्शिता से ही विश्वास पैदा होता है।
संसद देश की सामूहिक चेतना का मंच है। यहां उठे सवालों का समाधान शोर से नहीं, संवाद से निकलता है। विपक्ष को अपनी आलोचना में तथ्यों की दृढ़ता रखनी होगी और सरकार को जवाब में पारदर्शिता व संयम दिखाना होगा। लोकतंत्र की असली ताकत इसी संतुलन में निहित है। आरोपों की आंधी थम सकती है, लेकिन जवाबदेही की कसौटी स्थायी होती है।

