दहेज का रंग लाल...

लेखक: विनोद कुमार झा 

बसंत की हवा में सरसों की महक घुली हुई थी, पर रामपुर गांव के आसमान में इन दिनों खुशी नहीं, बल्कि भय की धुंध तैर रही थी। खेतों में पीला रंग फैला था, लेकिन हर घर की दीवारों पर कहीं न कहीं एक अदृश्य लाल दाग दिखाई देता था दहेज की क्रूरता का दाग।

गांव की गलियां पतली थीं, पर उनमें छुपा दर्द बहुत चौड़ा था। औरतें कुएं पर पानी भरते हुए फुसफुसाती थीं, पुरुष चौपाल पर खामोशी से बीड़ी सुलगाते रहते थे, और बच्चे अनजान होकर खेलते रहते थे मानो उन्हें अभी पता ही न हो कि इस समाज की सड़ांध कितनी गहरी है।

इसी गांव में रहती थी आकांक्षा एक पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी और संवेदनशील लड़की। उसके पिता रामनारायण एक छोटा किसान थे, जिनके पास दो बीघा जमीन और ढेर सारी जिम्मेदारियां थीं। मां पार्वती देवी दिन-रात मेहनत करती थीं—कभी खेत में, कभी घर में, कभी दूसरों के घरों में मजदूरी करके।

आकांक्षा ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की, फिर कस्बे के कॉलेज से बीए किया। वह चाहती थी कि आगे पढ़े, शिक्षक बने, और गांव की लड़कियों को पढ़ाए। लेकिन समाज की दीवारें उसके सपनों से ऊंची थीं। जैसे ही उसने कॉलेज खत्म किया, रिश्तों का तांता लग गया। हर रिश्ता पहले लड़की नहीं, दहेज देखता था।

एक दिन ठाकुर साहब का रिश्ता आया। उनका बेटा शहर में नौकरी करता था। बात शुरू होते ही उन्होंने कहा, “लड़की तो ठीक है, पर हमें गाड़ी, फ्रिज, सोना और दस लाख नकद चाहिए।” रामनारायण का चेहरा उतर गया। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “साहब, इतना हमसे नहीं हो पाएगा।”

ठाकुर साहब हंस पड़े “तो फिर बेटी को घर में ही रखिए। आजकल बिना दहेज के कौन शादी करता है?” यह सुनकर आकांक्षा भीतर से टूट गई। उसने रात में मां से पूछा “मां, क्या मैं बोझ हूं? क्या मेरी पढ़ाई, मेरा चरित्र, मेरा स्वाभिमान कुछ मायने नहीं रखता?”

मां रो पड़ीं। उनके पास कोई उत्तर नहीं था सिर्फ आंसू थे। कुछ महीनों बाद एक और रिश्ता आया सुधीर नाम का लड़का, जो बैंक में क्लर्क था। उसके परिवार ने भी मांग रखी, “पांच लाख नकद, बाइक और फर्नीचर चाहिए।”

इस बार रामनारायण ने खेत गिरवी रख दिया। साहूकार से कर्ज लिया। गांव वाले फुसफुसाए, “बेचारी बेटी के लिए बाप ने सब कुछ दांव पर लगा दिया।” शादी धूमधाम से हुई। मंडप में आकांक्षा के हाथ पीले थे, माथे पर सिंदूर, गले में मंगलसूत्र पर दिल में डर था। वह जानती थी कि दहेज की यह आग अभी बुझी नहीं, सिर्फ ढकी हुई है।

ससुराल पहुंचते ही असली चेहरा सामने आ गया। सास ने ताना मारा,  “तुम्हारे मायके वालों ने हमें छोटा समझ लिया। और दे सकते थे।” हर दिन नए-नए आरोप लगते। कभी खाने में नमक ज्यादा, कभी कम। कभी कपड़े ठीक नहीं, कभी आवाज ऊंची। आकांक्षा को कमरे में बंद कर दिया जाता। उसका फोन छीन लिया गया।

गांव में लोग सब जानते थे, पर कोई बोलता नहीं था। पंचायत भी चुप थी, क्योंकि सुधीर का परिवार प्रभावशाली था। एक दिन सुधीर ने शराब पीकर आकांक्षा पर हाथ उठाया। उसने चिल्लाते हुए कहा, “अगर और पैसे नहीं आए, तो यहां रहना मुश्किल होगा।”

आकांक्षा रात भर रोती रही। उसने सोचा क्या यही शादी है? क्या यही समाज है? क्या बेटी का जन्म लेना ही अपराध है?

कुछ दिनों बाद आकांक्षा के पिता ने किसी तरह दो लाख और भेजे। पर यह भी पर्याप्त नहीं था। ससुराल वालों की भूख बढ़ती गई। फिर एक काली रात आई। गांव में खबर फैली “आकांक्षा जल गई… स्टोव फट गया।”

अस्पताल में वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। उसके शरीर का बड़ा हिस्सा जल चुका था। पुलिस ने मामला दर्ज किया, पर परिवार ने दबाव डालकर बयान बदलवा दिया।आखिरकार आकांक्षा की मौत हो गई।

उसकी अर्थी उठी तो गांव की गलियों में फिर वही लाल रंग फैल गया इस बार खून का, आंसुओं का, और शर्म का।

अंतिम संस्कार में पंडित ने कहा, “यह तो भगवान की मर्जी थी।” लेकिन आकांक्षा की छोटी बहन अनन्या खड़ी होकर चिल्ला पड़ी, “यह मर्जी नहीं, यह हत्या है! यह दहेज की हत्या है!” पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। पहली बार किसी लड़की ने खुलेआम सच बोला था।

अनन्या ने ठान लिया कि वह चुप नहीं बैठेगी। उसने पुलिस में शिकायत दी, महिला आयोग से संपर्क किया, और गांव की औरतों को संगठित किया।

उसने पंचायत में कहा, “अगर दहेज बंद नहीं हुआ, तो हर घर में एक आकांक्षा जलेगी।” धीरे-धीरे बदलाव की हवा चली। कुछ लड़कियों ने बिना दहेज शादी करने का फैसला किया। कुछ लड़कों ने खुलकर विरोध किया। स्कूल में दहेज-विरोधी कार्यक्रम शुरू हुए।

पर सवाल अब भी जिंदा थे, क्या बेटी सच में अभिशाप है? क्या बिना दहेज के उसके हाथ पीले नहीं हो सकते? कब तक बाप कर्ज में डूबते रहेंगे? कब तक बेटियां जलती रहेंगी? और सबसे बड़ा सवाल दहेज आखिर रुकेगा कैसे?

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह तो एक आंदोलन की शुरुआत है, उस दिन की उम्मीद की, जब, दहेज का रंग लाल खून का नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक बनेगा।

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