विनोद कुमार झा
लगातार नौवीं बार केंद्रीय बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को जिस आर्थिक दृष्टिकोण का खाका रखा, वह देखने में भव्य, सुनने में महत्वाकांक्षी और बयानबाजी में भविष्यवादी प्रतीत होता है, लेकिन आम आदमी के जीवन की जमीनी सच्चाइयों से इसका तालमेल कितना बैठता है यही बड़ा प्रश्न है। 85 मिनट के लंबे भाषण में विकास के कई बड़े वादे, नई योजनाएँ और ढांचागत निवेश की घोषणाएँ की गईं, मगर महंगाई, बेरोजगारी और मध्यम वर्ग की कर-पीड़ा जैसे बुनियादी मुद्दे कहीं किनारे पड़ते दिखे। इसलिए यह बजट कुछ हद तक “दही खट्टे हैं, थोड़ी गुड़ मिला लो” वाली कहावत की याद दिलाता है कड़वी सच्चाइयों पर मीठे शब्दों की परत चढ़ाने की कोशिश।
बड़े सपने, पर छोटे राहत-पैकेज : बजट में सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, तीन नए एम्स, सेमीकंडक्टर मिशन, बायोफार्मा विस्तार, मेडिकल टूरिज्म हब, डेटा सेंटर प्रोत्साहन और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर जैसी घोषणाएँ निस्संदेह दीर्घकालिक दृष्टि दिखाती हैं। किसानों के लिए बहुभाषी एआई टूल, एमएसएमई के लिए स्वचालित कर-प्रणाली और खादी-हस्तशिल्प के लिए “महात्मा गांधी ग्राम समाज” पहल सराहनीय कदम माने जा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है क्या ये घोषणाएँ आज की ज्वलंत समस्याओं का समाधान हैं? महंगाई चरम पर है, रोजगार सृजन धीमा है, घरेलू बचत घट रही है और आम आदमी की क्रय-शक्ति लगातार कमजोर पड़ रही है। इन मुद्दों पर बजट लगभग मौन दिखाई देता है।
बाजार की प्रतिक्रिया: भरोसा या संदेह?
बजट पेश होते ही शेयर बाजार में गिरावट इस बात का संकेत थी कि निवेशकों को पर्याप्त भरोसा नहीं मिला। शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे कठोर शब्दों में “आम आदमी विरोधी बजट” बताया और कहा कि इसमें न टैक्स कटौती है, न जीएसटी में राहत और न ही वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का ठोस जवाब। दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इसे “भविष्य की टेक्नोलॉजी का बजट” बताया। डेटा सेंटर, क्रिटिकल मिनरल्स, परमानेंट मैग्नेट और स्किल डेवलपमेंट पर जोर निश्चित रूप से भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति दिला सकता है। परंतु यह भविष्य की तैयारी है आज की रोटी-पानी का समाधान नहीं।
रेल सुरक्षा बनाम यात्री सुविधाएँ : रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दावा किया कि दुर्घटनाओं में 95 प्रतिशत कमी आई है और “कवच” प्रणाली के विस्तार के साथ सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा। सात हाई-स्पीड कॉरिडोर की घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन आम यात्री आज भी भीड़, देरी और असुविधाओं से जूझ रहा है। सवाल यह है कि तेज़ ट्रेनों के साथ-साथ क्या आम रेल सेवाएँ भी बेहतर होंगी?
‘वास्तविक संकटों से अनजान बजट’ : राहुल गांधी ने बजट को “भारत के असली संकटों से आंख मूंदने वाला” करार दिया। उनके अनुसार बेरोजगारी, गिरता विनिर्माण, घटता निवेश और किसान संकट को नजरअंदाज किया गया है। ममता बनर्जी ने इसे “हम्प्टी-डम्प्टी बजट” कहकर खारिज कर दिया और आरोप लगाया कि बंगाल को कुछ नहीं मिला। आम आदमी पार्टी ने भी पंजाब की उपेक्षा और महंगाई पर चुप्पी को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया।
आत्मनिर्भरता की बड़ी तस्वीर :केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कंटेनर निर्माण के लिए 10,000 करोड़ रुपये के प्रावधान को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम बताया। यदि यह सही ढंग से लागू हुआ तो भारत वैश्विक समुद्री व्यापार में बड़ी भूमिका निभा सकता है। खेल सामग्री निर्माण को बढ़ावा देने और “खेलो इंडिया” के तहत खेल अवसंरचना मजबूत करने की घोषणा भी सराहनीय है, क्योंकि यह रोजगार और स्थानीय उद्योग दोनों को गति दे सकती है।
किसानों और ग्रामीण भारत के लिए कितना ठोस?
हिमाचल की सांसद कंगना रनौत ने मूंगफली किसानों के लिए बजट को प्रोत्साहन बताया, जबकि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इसे “विकसित भारत 2047” की दिशा में मील का पत्थर कहा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल बीमा, सिंचाई और कृषि ऋण राहत पर कोई बड़ा क्रांतिकारी कदम दिखाई नहीं दिया।
संतुलन की जरूरत : यह बजट न पूरी तरह विफल है, न पूरी तरह सफल। इसमें दीर्घकालिक दृष्टि है, तकनीकी महत्वाकांक्षा है और ढांचागत विकास की बड़ी योजनाएँ हैं लेकिन इसमें आम आदमी की तात्कालिक पीड़ा का समाधान कम दिखता है।अगर सरकार सचमुच “विकसित भारत 2047” चाहती है तो उसे भविष्य के साथ-साथ वर्तमान को भी मजबूत करना होगा महंगाई पर लगाम, रोजगार सृजन, कर राहत और कृषि सुरक्षा के ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा यह बजट इतिहास में एक और “विजनरी भाषण” बनकर रह जाएगा और आम जनता के लिए वही पुरानी कहावत सच साबित होगी:“दही खट्टे हैं… बस थोड़ी गुड़ मिला दी गई है।”
