विनोद कुमार झा
भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जाति का प्रश्न समय के साथ कमजोर होने के बजाय नए-नए रूपों में सामने आता रहा है। गांव और शहर, गली-मोहल्ले, धार्मिक स्थल, विवाह, सामाजिक व्यवहार और सरकारी नौकरियों तक जाति की छाया लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देती है। संविधान लागू होने के बाद यह अपेक्षा बनी थी कि शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा के संस्थान, इस सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर समानता और बौद्धिक स्वतंत्रता के केंद्र बनेंगे। इसी कारण विश्वविद्यालयों को ‘विद्या के मंदिर’ की संज्ञा दी गई।
हाल के दिनों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 ने इसी मूल धारणा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सरकार और UGC का दावा है कि ये नियम उच्च शिक्षा में समानता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाए गए हैं, लेकिन जिस प्रकार इन प्रावधानों की व्याख्या हो रही है और जिस तरह से शिक्षण समुदाय में असंतोष उभरा है, उसने इस दावे की विश्वसनीयता को कमजोर किया है।
समानता के नाम पर नई रेखाएं : शिक्षकों और छात्रों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ये नियम सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय शिक्षा व्यवस्था में जातिगत पहचान को और अधिक संस्थागत बना सकते हैं। नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक ढांचे और अकादमिक मूल्यांकन में यदि जाति निर्णायक तत्व बनती है, तो इससे योग्यता, स्वतंत्र चिंतन और शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
उच्च शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल प्रतिनिधित्व का संतुलन नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजन, आलोचनात्मक विवेक और सामाजिक समरसता का निर्माण भी है। यदि विश्वविद्यालय स्वयं समाज की तरह खांचों में बंट जाएंगे, तो वे परिवर्तन के केंद्र के बजाय उसी असमानता के प्रतिबिंब बनकर रह जाएंगे, जिसे मिटाने की जिम्मेदारी उनसे अपेक्षित है।
नीतिगत उद्देश्य या राजनीतिक गणना?
यह प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ऐसे समय में, जब भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा, शोध की गुणवत्ता और बुनियादी संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब सरकार का ध्यान इस प्रकार के नियमों पर केंद्रित होना क्या प्राथमिकताओं के सही निर्धारण को दर्शाता है?
आलोचकों का तर्क है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जाति आधारित नीतियों का विस्तार कहीं न कहीं राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों से प्रेरित प्रतीत होता है। यदि ऐसा है, तो यह शिक्षा की स्वायत्तता और उसकी दीर्घकालिक भूमिका के लिए चिंताजनक संकेत है।
सुप्रीम कोर्ट की दखल का अर्थ : इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। शीर्ष अदालत की सक्रियता यह स्पष्ट करती है कि शिक्षा से जुड़े नीतिगत निर्णय भी संविधान की कसौटी पर परखे जाएंगे। समानता का अर्थ विभाजन नहीं हो सकता और सामाजिक न्याय का उद्देश्य नई असमानताओं को जन्म देना नहीं है यह संदेश इस दखल में निहित है।
शिक्षा को जोड़ने का माध्यम बने रहने देना होगा : भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था से अपेक्षा है कि वह समाज को जोड़ने का काम करे, न कि पहले से मौजूद सामाजिक दरारों को और गहरा करे। सामाजिक न्याय एक अनिवार्य संवैधानिक लक्ष्य है, लेकिन उसे लागू करने के तरीके उतने ही संतुलित, पारदर्शी और संवादपरक होने चाहिए। सरकार और UGC के लिए यह आवश्यक है कि वे शिक्षकों, छात्रों और विशेषज्ञों के साथ व्यापक विमर्श करें और यह सुनिश्चित करें कि समानता के प्रयास शिक्षा की गुणवत्ता, स्वायत्तता और बौद्धिक स्वतंत्रता को क्षति न पहुंचाएं।
जिस समाज में जाति का प्रश्न पहले से ही गहरी जड़ें जमा चुका हो, वहां शिक्षा ही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को उसकी पहचान से ऊपर उठने का अवसर देती है। यदि वही माध्यम विभाजन का औज़ार बन जाए, तो यह न केवल शिक्षा के उद्देश्य के विरुद्ध होगा, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के साथ भी अन्याय होगा।अब निर्णय सरकार के हाथ में है क्या वह विश्वविद्यालयों को सामाजिक एकता और बौद्धिक प्रगति के केंद्र के रूप में सशक्त करेगी, या उन्हें भी उस विभाजन का हिस्सा बनने देगी, जिससे देश दशकों से उबरने का प्रयास कर रहा है।
