मां सरस्वती की आराधना से वाणी की शुद्धता, बुद्धि की प्रखरता और जीवन में सकारात्मक दृष्टि का विकास होता है।
-वसंत पंचमी का मूल संदेश है नवजीवन, नवचेतना और निरंतर ज्ञान साधना।
विनोद कुमार झा
भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल तिथि या परंपरा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे प्रकृति, चेतना और आत्मिक विकास से गहराई से जुड़े होते हैं। वसंत पंचमी उन्हीं विशिष्ट पर्वों में से एक है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी 23 जनवरी को वसंत पंचमी श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाई जाएगी। यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि विद्या, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की उपासना का पावन अवसर भी है।
कलियुग में भी वसंत पंचमी का महत्व उतना ही प्रामाणिक और प्रभावशाली माना जाता है, क्योंकि यह पर्व आज भी सतयुग, त्रेता और द्वापर के उन दिव्य भावों की अनुभूति कराता है, जिनमें ज्ञान, साधना और सृजन को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। शायद यही कारण है कि हमारे धर्मग्रंथों में जितना व्यापक और गहन वर्णन मां सरस्वती का मिलता है, उतना किसी अन्य देवी-देवता के विषय में विरल है।
वसंत पंचमी: ऋतु और जीवन का उत्सव
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आती है। भारतीय पंचांग में वसंत ऋतु को ‘ऋतुओं का राजा’ कहा गया है। शीत ऋतु की कठोरता समाप्त होने लगती है और प्रकृति नवजीवन से भर उठती है। खेतों में सरसों और गेहूं की फसलें लहलहाने लगती हैं, पेड़ों पर नई पत्तियां और पुष्प खिल उठते हैं, पक्षियों का कलरव वातावरण को मधुर बना देता है और मानव जीवन में भी नई ऊर्जा तथा आशा का संचार होता है।
प्रकृति के इसी नवोन्मेष और सौंदर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है वसंत पंचमी। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि जैसे प्रकृति निरंतर सृजन करती है, वैसे ही मानव जीवन में भी ज्ञान और रचनात्मकता का प्रवाह बना रहना चाहिए। इसी कारण इस पर्व को ‘श्री पंचमी’ और ‘ज्ञान पंचमी’ भी कहा जाता है।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, सृष्टि की रचना के पश्चात भगवान ब्रह्मा को संसार में मौन और नीरसता का अनुभव हुआ। सृष्टि में रूप तो था, परंतु उसमें चेतना, वाणी और संगीत का अभाव था। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से अनुमति लेकर अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का। तभी जल से एक दिव्य, तेजस्वी और चतुर्भुजी देवी प्रकट हुईं।
देवी के एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथे में वर मुद्रा थी। ये देवी थीं मां सरस्वती। जब उन्होंने अपनी वीणा के तारों को छेड़ा, तो संपूर्ण सृष्टि में वाणी, नाद और संगीत का संचार हो गया। जीव-जंतु बोलने लगे, प्रकृति सजीव हो उठी और संसार को अभिव्यक्ति का माध्यम प्राप्त हुआ। तभी से मां सरस्वती को वाणी, विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
वसंत पंचमी पर पूजन का विधान और सांस्कृतिक परंपरा
वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन पीले रंग का व्यापक प्रयोग किया जाता है, क्योंकि पीला रंग ज्ञान, ऊर्जा, आशा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। घरों, विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
पूजन विधि में प्रमुख रूप से मां सरस्वती की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर उन्हें श्वेत या पीत वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। पीले पुष्प, अक्षत और गुलाल अर्पित कर हलवा, खीर और फल का भोग लगाया जाता है। “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” मंत्र का जप विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन छोटे बच्चों का विद्यारंभ संस्कार कर उन्हें अक्षर ज्ञान कराया जाता है।
शास्त्रों में वसंत और सरस्वती का उल्लेख
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने वसंत ऋतु को अपनी विभूतियों में स्थान देते हुए इसे सृजन और आनंद का प्रतीक बताया है। ऋग्वेद में मां सरस्वती को न केवल देवी, बल्कि दिव्य नदी और ज्ञान की धारा के रूप में वर्णित किया गया है। वेदों के अनुसार सरस्वती केवल एक देवी नहीं, बल्कि चेतना का प्रवाह हैं, जो मानव को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाती हैं।
मां सरस्वती के विविध रूप और अवतार
शास्त्रों में मां सरस्वती के अनेक रूपों का उल्लेख मिलता है। महा सरस्वती को सर्वोच्च शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो महाकाली और महालक्ष्मी के साथ त्रिदेवों की शक्तियों को पूर्ण करती हैं। विद्या सरस्वती समस्त ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। शारदाम्बा का स्वरूप श्रृंगेरी शारदापीठ से जुड़ा है, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी।
सावित्री और गायत्री के रूप में मां सरस्वती को ब्रह्मा की शक्ति माना गया है। वहीं नील सरस्वती का उग्र स्वरूप तांत्रिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है। ब्राह्मणी रूप में वे अष्ट मातृकाओं में सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त महाविद्याओं में काली, मातंगी और तारा को भी मां सरस्वती का ही विस्तार माना गया है।
मां सरस्वती के दो अवतार विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। एक सरस्वती नदी, जिसे प्राचीन काल में सभ्यता की जननी माना गया, और दूसरा मां शारदा, जिनका शारदा पीठ कश्मीर में स्थित है और जिसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
आज के समय में वसंत पंचमी का महत्व और भी बढ़ जाता है, जब समाज को ज्ञान, विवेक और संवाद की सबसे अधिक आवश्यकता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि सच्ची उन्नति केवल भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि विद्या, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से होती है।
वसंत पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व प्रकृति और अध्यात्म, ज्ञान और संस्कृति के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। मां सरस्वती की आराधना से वाणी की शुद्धता, बुद्धि की प्रखरता और जीवन में सकारात्मक दृष्टि का विकास होता है। यही वसंत पंचमी का मूल संदेश है नवजीवन, नवचेतना और निरंतर ज्ञान साधना।

