दिखावे की रोशनी में खोती इंसानियत

राजनीतिक नारों, सामाजिक दिखावे या कैंडल की रोशनी से नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और इंसानियत के उजाले से मिटेगा मन का अंधकार

विनोद कुमार झा

दीपावली आते ही आसमान में रोशनी की चादर बिछने लगती है। गलियों में दीप सजते हैं, घरों की चौखटें जगमगाती हैं, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और पटाखों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देने लगती है। हर तरफ उत्सव का माहौल होता है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल मन के भीतर दस्तक देता है कि आखिर पटाखों का यह शोर कहां-कहां तक पहुंचेगा? क्या इसकी गूंज उन लोगों के मन तक भी पहुंचेगी, जिनके जीवन में वर्षों से निराशा, अभाव, अन्याय और उपेक्षा का अंधेरा पसरा हुआ है? क्या दीपावली की यह चमक उन चेहरों को भी रोशन कर पाएगी, जिनकी आंखों में उम्मीद के दीप कब के बुझ चुके हैं?

दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और आतिशबाजी करने का पर्व नहीं है। यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है। लेकिन आज दीपावली का स्वरूप कहीं-कहीं बाहरी चमक-दमक और दिखावे तक सीमित होता दिखाई देने लगा है। घरों की सजावट पर हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं, आसमान को रंगीन बनाने के लिए पटाखों पर धन बहाया जाता है, मगर उसी समाज में ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जिनके घरों में दो वक्त की रोटी जुटाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दीपावली का वास्तविक उद्देश्य केवल अपने घर को रोशन करना है, या फिर समाज के उन कोनों तक भी प्रकाश पहुंचाना है, जहां आज भी अंधकार का साम्राज्य कायम है?

पटाखों की आवाज कुछ क्षणों के लिए वातावरण को गुंजायमान कर देती है। आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी दिखाई देती है, लेकिन यह चमक कुछ ही पलों में समाप्त हो जाती है। उसके बाद फिर वही अंधेरा, वही सन्नाटा और वही जीवन की कठिनाइयां सामने खड़ी हो जाती हैं। पटाखों का शोर वातावरण को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों, छोटे बच्चों और पशु-पक्षियों के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता है। वायु प्रदूषण की समस्या भी दीपावली के बाद एक गंभीर सामाजिक चिंता बनकर सामने आती है।

लेकिन क्या हमने कभी उस शोर पर विचार किया है, जो हमारे समाज में प्रतिदिन सुनाई देता है? बेरोजगार युवाओं की निराशा का शोर, किसानों की समस्याओं का शोर, महंगाई से जूझते परिवारों की विवशता का शोर, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठती आवाजों का शोर और न्याय की प्रतीक्षा में वर्षों से भटकते लोगों की पीड़ा का शोर।

यह शोर पटाखों की तरह कुछ क्षणों में समाप्त नहीं होता। यह मनुष्य के भीतर लगातार गूंजता रहता है। शायद दीपावली के अवसर पर हमें इन आवाजों को सुनने की जरूरत है। क्योंकि जिस समाज में संवेदनाएं मौन हो जाएं, वहां दीपों की संख्या बढ़ाने से भी वास्तविक प्रकाश नहीं फैल सकता।

दीपावली के अवसर पर राजनीतिक गलियारों में भी रोशनी दिखाई देती है। शुभकामनाओं के संदेश, बड़े-बड़े पोस्टर, विज्ञापन, भाषण और जनसंपर्क के माध्यम से जनप्रतिनिधि जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। राजनीतिक दलों के लिए दीपावली एक अवसर बन जाती है, जब वे अपने विचारों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन राजनीति का वास्तविक प्रकाश तब दिखाई देगा, जब जनप्रतिनिधियों के निर्णयों से आम आदमी के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा। जब बेरोजगार युवा को रोजगार मिलेगा, जब गरीब परिवार को शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा मिलेगी, जब किसानों की समस्याओं का समाधान होगा, जब भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगेगा और जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुंचेगी।

राजनीति में दीपावली का अर्थ केवल सत्ता के गलियारों को रोशन करना नहीं होना चाहिए। यह उन जनहितकारी विचारों का पर्व भी होना चाहिए, जो समाज को नई दिशा प्रदान करें।

राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन मनभेद समाज को कमजोर करते हैं। यदि राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संवाद का दीप जल सके, यदि सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे को केवल विरोधी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सहभागी के रूप में देखें, तो संभव है कि राजनीति के भीतर भी एक नई दीपावली का उदय हो।

समाज में दीपावली का उत्सव सामूहिकता, प्रेम, भाईचारे और सद्भाव का संदेश देता है। लेकिन आज एक प्रश्न यह भी है कि क्या हम वास्तव में एक-दूसरे के दुख-दर्द को समझ पा रहे हैं?

एक ओर आलीशान भवनों में दीपों की कतारें सजाई जाती हैं, तो दूसरी ओर फुटपाथों पर जीवन गुजारने वाले परिवार खुले आसमान के नीचे रात बिताते हैं। एक ओर महंगी मिठाइयों और उपहारों का आदान-प्रदान होता है, तो दूसरी ओर ऐसे बच्चे भी हैं, जिनके लिए दीपावली पर एक नई पोशाक पहनना भी सपना बनकर रह जाता है।

क्या हमारी सामाजिक जिम्मेदारी केवल अपने परिवार तक सीमित है? क्या हम अपने आसपास रहने वाले जरूरतमंदों की पीड़ा को महसूस करते हैं? क्या किसी गरीब के घर में मिठाई पहुंचाना, किसी बच्चे को शिक्षा के लिए सहयोग देना, किसी बुजुर्ग का सहारा बनना या किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद देना दीपावली का हिस्सा नहीं हो सकता?

वास्तव में समाज का अंधकार तभी दूर होगा, जब हम अपने भीतर की स्वार्थपरता, अहंकार, भेदभाव और संवेदनहीनता को समाप्त करने का प्रयास करेंगे। सामाजिक बदलाव किसी एक व्यक्ति, संस्था या सरकार से नहीं आता। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका समझनी होगी।

क्या कैंडल की रोशनी मन का अंधेरा मिटा सकती है?

आज किसी सामाजिक घटना, विरोध प्रदर्शन या जागरूकता अभियान के दौरान कैंडल मार्च निकालना एक प्रचलित माध्यम बन चुका है। मोमबत्तियों की रोशनी में लोग एकजुट होकर न्याय, शांति और संवेदनशीलता का संदेश देते हैं। कैंडल की लौ निश्चित रूप से उम्मीद का प्रतीक है। यह अंधकार के विरुद्ध एक सामूहिक आवाज बन सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कैंडल जलाने से मन का अंधेरा दूर हो जाएगा?

कैंडल की रोशनी तभी सार्थक है, जब उसके पीछे विचारों की स्पष्टता हो। यदि हम मोमबत्ती जलाकर किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, लेकिन अगले दिन उसी अन्याय को देखकर मौन हो जाते हैं, तो उस रोशनी का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

यदि हम दीपावली पर दीप जलाकर घर को सजाते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में कटुता, ईर्ष्या और द्वेष को बनाए रखते हैं, तो हमारे भीतर का अंधकार समाप्त नहीं होगा। प्रकाश केवल आंखों को दिखाई देने वाली वस्तु नहीं है। प्रकाश एक विचार है, एक चेतना है, एक जिम्मेदारी है। जब मनुष्य अपने विचारों को सकारात्मक बनाता है, तब उसके भीतर वास्तविक प्रकाश का जन्म होता है।

दीपावली का वास्तविक संदेश आत्ममंथन से जुड़ा हुआ है। यह पर्व हमें अपने भीतर झांकने का अवसर प्रदान करता है। हमें यह समझना होगा कि मनुष्य के भीतर सबसे बड़ा अंधकार अज्ञान, अहंकार, लालच, ईर्ष्या और नफरत का होता है। इन भावनाओं को दूर किए बिना समाज में स्थायी प्रकाश की कल्पना करना कठिन है।

यदि शिक्षा का दीप जलाया जाए, तो अज्ञानता का अंधकार मिट सकता है। यदि समानता का दीप जलाया जाए, तो भेदभाव की दीवारें कमजोर हो सकती हैं। यदि संवेदनशीलता का दीप जलाया जाए, तो समाज में उपेक्षित लोगों को सम्मान मिल सकता है। यदि ईमानदारी का दीप जलाया जाए, तो भ्रष्टाचार के अंधकार को चुनौती दी जा सकती है। यदि प्रेम और सद्भाव का दीप जलाया जाए, तो धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विभाजन के बीच संवाद का रास्ता खुल सकता है।दीपावली का अर्थ केवल दीपों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को मजबूत करना है, जिनसे मानव जीवन सुंदर और सार्थक बनता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि दीपावली के उत्सव को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार, सामाजिक रूप से संवेदनशील और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण बनाया जाए। पटाखों के अनावश्यक शोर से बचते हुए दीपों, सद्भाव और सेवा के माध्यम से उत्सव मनाया जा सकता है। किसी जरूरतमंद के घर में खुशियों का दीप जलाना, किसी भूखे को भोजन कराना, किसी गरीब बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी अकेले बुजुर्ग के साथ कुछ समय बिताना और किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद देना, ये सभी ऐसे कार्य हैं जो दीपावली की चमक को स्थायी बना सकते हैं।

आखिरकार, दीपावली का प्रकाश तभी पूर्ण होगा, जब वह केवल घरों की दीवारों तक सीमित न रहकर मनुष्य के हृदय तक पहुंचे। पटाखों की आवाज कुछ समय बाद शांत हो जाएगी। कैंडल की लौ भी बुझ जाएगी। दीपों का तेल भी समाप्त हो जाएगा। लेकिन यदि हमारे भीतर इंसानियत, प्रेम, सद्भाव, ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी का दीप जल गया, तो उसकी रोशनी पीढ़ियों तक कायम रह सकती है।

इस दीपावली एक सवाल स्वयं से अवश्य पूछें हमने कितने दीप जलाए, यह महत्वपूर्ण है या हमारे कारण कितने जीवन में उजाला आया? क्योंकि मन का अंधकार न तो राजनीतिक नारों से दूर होगा, न सामाजिक दिखावे से और न ही केवल कैंडल की रोशनी से। यह अंधकार दूर होगा हमारे विचारों की शुद्धता, हमारे कर्मों की ईमानदारी और हमारे हृदय में जीवित इंसानियत से। यही दीपावली का वास्तविक संदेश है। यही प्रकाश पर्व की सार्थकता है।

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