भीड़ में शामिल होना आसान है, लेकिन भीड़ के बीच अपनी अलग पहचान बनाना कठिन। चमकने वाले बहुत मिल जाएंगे, मगर अपनी गुणवत्ता, विचारों और कर्मों से रोशनी बिखेरने वाले विरले ही होते हैं।
लेखक: विनोद कुमार झा
प्रकृति ने हर वस्तु को एक अलग स्वरूप और विशेषता प्रदान की है। कहीं पर्वतों की ऊंचाई है, कहीं नदियों की गहराई, कहीं फूलों की सुगंध है तो कहीं समुद्र की अथाह गहराइयों में छिपा मोती। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस मोती की कीमत उसकी गुणवत्ता और दुर्लभता से निर्धारित होती है, वही मोती यदि कंकड़-पत्थरों के बीच पड़ा हो तो अनजान नजरें उसे पहचानने में चूक सकती हैं। उसकी चमक मौजूद रहती है, उसका मूल्य भी कम नहीं होता, लेकिन उसे परखने वाली पारखी नजरों का अभाव उसकी पहचान को धुंधला कर देता है। मनुष्य के जीवन में भी कुछ ऐसा ही होता है। अनेक प्रतिभाशाली, विचारवान और कर्मठ लोग समाज में मौजूद होते हैं, लेकिन उन्हें वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पाती जिसके वे वास्तविक हकदार होते हैं।
आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां व्यक्ति की पहचान उसके गुणों से अधिक उसके बाहरी स्वरूप, पद, प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक पहुंच से निर्धारित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जिसके पास बड़ा पद है, उसके आसपास लोगों की भीड़ दिखाई देती है। जिसके पास धन और प्रभाव है, उसकी बातों को गंभीरता से सुना जाता है। वहीं दूसरी ओर, जो व्यक्ति अपनी मेहनत, ईमानदारी और सिद्धांतों के सहारे जीवन की राह तय करता है, उसे कई बार उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। उसकी योग्यता को समझने के बजाय उसकी सीमित आर्थिक स्थिति, साधारण पहनावे या सामान्य सामाजिक परिवेश से उसका मूल्यांकन कर दिया जाता है।
यहां सवाल उठता है कि क्या किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके आसपास जमा भीड़ से तय होती है? क्या लोकप्रियता ही प्रतिभा का प्रमाण है? क्या ऊंची कुर्सी पर बैठने वाला प्रत्येक व्यक्ति वास्तव में ऊंचे विचारों का भी स्वामी होता है? और क्या साधारण परिस्थितियों में जीवन बिताने वाला व्यक्ति असाधारण प्रतिभा का धनी नहीं हो सकता? इन सवालों के जवाब समाज की सोच और उसकी प्राथमिकताओं में छिपे हैं।
दरअसल, कंकड़-पत्थरों के बीच पड़ा मोती अपनी चमक खोता नहीं है, बल्कि देखने वालों की नजरों में उसकी पहचान खो जाती है। यही अंतर समझना आवश्यक है। किसी व्यक्ति की परिस्थितियां उसकी प्रतिभा का निर्धारण नहीं करतीं। गरीबी किसी की बुद्धिमत्ता को कम नहीं कर सकती, साधारण जीवनशैली किसी के विचारों को छोटा नहीं बना सकती और संसाधनों का अभाव किसी की कल्पनाशक्ति को समाप्त नहीं कर सकता। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां साधारण पृष्ठभूमि से निकले लोगों ने अपने ज्ञान, परिश्रम और संकल्प से असाधारण उपलब्धियां हासिल कीं। उनकी शुरुआत भले ही गुमनाम रही हो, लेकिन उनके कर्मों ने उन्हें ऐसी पहचान दी जिसे समय भी मिटा नहीं सका।
समाज की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि यहां कई बार प्रतिभा से अधिक उसके प्रचार को महत्व दिया जाता है। जो व्यक्ति अपने काम का ढिंढोरा पीटता है, वह चर्चा में आ जाता है, जबकि जो व्यक्ति खामोशी से अपने दायित्वों का निर्वहन करता है, उसकी मेहनत अक्सर पर्दे के पीछे रह जाती है। सोशल मीडिया के वर्तमान दौर ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। लाइक, कमेंट, फॉलोअर्स और वायरल होने की प्रतिस्पर्धा में वास्तविक विचारों की गहराई कहीं पीछे छूटती दिखाई देती है। कुछ क्षणों की लोकप्रियता को स्थायी सफलता समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविक पहचान समय, संघर्ष और निरंतर कर्म से बनती है।
राजनीति में भी यह स्थिति कम देखने को नहीं मिलती। कई बार योग्य और अनुभवी व्यक्तियों को केवल इसलिए पीछे कर दिया जाता है क्योंकि उनके पास न तो प्रभावशाली समूह होता है और न ही प्रचार का बड़ा तंत्र। इसके विपरीत, कुछ लोग अपनी वाकपटुता, संपर्कों और शक्ति प्रदर्शन के सहारे आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन राजनीति की असली कसौटी केवल चुनाव जीतना या पद प्राप्त करना नहीं है। जनता के प्रति जवाबदेही, विचारों की स्पष्टता, निर्णयों की निष्पक्षता और समाज के लिए किए गए कार्य ही किसी जनप्रतिनिधि की वास्तविक पहचान बनाते हैं। कुर्सी का कार्यकाल समाप्त हो सकता है, लेकिन अच्छे कर्मों की स्मृति लंबे समय तक जीवित रहती है।
सामाजिक जीवन में भी यही तस्वीर दिखाई देती है। किसी आयोजन में मंच पर बैठने वाले व्यक्ति को विशेष सम्मान मिलता है, जबकि पर्दे के पीछे रहकर व्यवस्था संभालने वाले लोगों का योगदान कई बार अनदेखा रह जाता है। किसी संस्था की सफलता का श्रेय उसके प्रमुख को मिल जाता है, लेकिन उस सफलता के पीछे दिन-रात मेहनत करने वाले सहयोगियों को उचित स्थान नहीं मिलता। किसी परिवार में भी ऐसा होता है कि कम बोलने वाले, जिम्मेदारियां निभाने वाले सदस्य की अहमियत तब समझ आती है, जब उसकी अनुपस्थिति महसूस होने लगती है। यानी कई बार व्यक्ति की उपयोगिता उसकी मौजूदगी में नहीं, बल्कि उसके न रहने पर समझी जाती है।
पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी पहचान का संघर्ष अलग रूप में दिखाई देता है। कलम की ताकत उसके शब्दों की संख्या में नहीं, बल्कि उन शब्दों में छिपे सत्य, संवेदना और साहस में होती है। कोई लेखक या पत्रकार लोकप्रियता की दौड़ से दूर रहकर भी समाज के लिए महत्वपूर्ण काम कर सकता है। उसकी लेखनी यदि व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाती है, समाज को आईना दिखाती है और लोगों को सोचने के लिए विवश करती है तो उसका महत्व केवल प्रशंसा या पुरस्कार से नहीं आंका जा सकता। आलोचना से घबराने के बजाय विचारों का मूल्यांकन करना ही स्वस्थ समाज की पहचान है। जो समाज प्रश्न पूछने वालों को दबाता है, वह धीरे-धीरे अपनी विवेकशीलता खोने लगता है।
हालांकि यह भी आवश्यक है कि हर उपेक्षित व्यक्ति स्वयं को मोती और दूसरों को कंकड़-पत्थर समझने की भूल न करे। केवल अलग सोच रखने या स्वयं को योग्य मान लेने से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता। वास्तविक प्रतिभा को अपने आचरण, ज्ञान, व्यवहार और निरंतर परिश्रम से प्रमाणित करना पड़ता है। विनम्रता, आत्ममंथन और सीखने की इच्छा किसी भी व्यक्तित्व को निखारने का काम करती है। जो व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार नहीं कर सकता, वह अपनी खूबियों का भी सही मूल्यांकन नहीं कर सकता। इसलिए पहचान पाने की चाह से पहले स्वयं को पहचानना और अपनी क्षमताओं को विकसित करना जरूरी है।
कई बार जीवन में ऐसा समय भी आता है जब व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करता है, लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। वह निराश होता है, परिस्थितियों को दोष देता है और कभी-कभी अपनी योग्यता पर भी संदेह करने लगता है। लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि हर बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है और हर मोती को पहचानने के लिए पारखी की आवश्यकता होती है। किसी की उपेक्षा से उसकी वास्तविक क्षमता समाप्त नहीं हो जाती। जरूरी है कि वह अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहे और परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता रहे।
यहां समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी बनती है। हमें ऐसी दृष्टि विकसित करनी होगी जो व्यक्ति को उसके बाहरी आवरण से नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद गुणों से पहचाने। किसी को अवसर देने से पहले उसकी आर्थिक हैसियत या सामाजिक प्रभाव नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और कार्यक्षमता देखी जानी चाहिए। संस्थाओं में प्रतिभा को प्रोत्साहन मिले, राजनीति में सिद्धांतों को महत्व मिले, पत्रकारिता में निष्पक्षता का सम्मान हो और सामाजिक जीवन में निस्वार्थ सेवा करने वालों को उचित स्थान मिले। तभी प्रतिभा का वास्तविक सम्मान संभव हो सकेगा।
समय का अपना एक अलग न्याय होता है। आज जिसे लोग नजरअंदाज कर रहे हैं, संभव है कल वही अपने काम से सबका ध्यान आकर्षित करे। आज जिसकी आवाज भीड़ के शोर में दब रही है, वही कल अपने विचारों से समाज को नई दिशा दे सकता है। लेकिन इसके लिए केवल प्रतीक्षा करना पर्याप्त नहीं है। अपने भीतर की क्षमता को पहचानना, उसे निरंतर निखारना और सही दिशा में उसका उपयोग करना भी उतना ही आवश्यक है।
अंततः हमें यह समझना होगा कि हर चमक सोना नहीं होती और हर साधारण दिखने वाली वस्तु मूल्यहीन नहीं होती। कंकड़-पत्थरों के बीच पड़ा मोती अपनी कीमत नहीं खोता, भले ही उसे पहचानने में दुनिया को समय लग जाए। उसी तरह किसी इंसान का मूल्य उसकी लोकप्रियता, पद, धन या प्रभाव से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, विचार, संस्कार, संघर्ष और कर्मों से तय होना चाहिए।
क्योंकि भीड़ में चमकना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाना वास्तविक सफलता है। मोती को कंकड़-पत्थरों के बीच रख देने से उसकी कीमत कम नहीं होती, बल्कि पारखी नजरों की कमी उजागर होती है।
याद रखिए, पहचान पाने के लिए चमक का प्रदर्शन जरूरी नहीं, बल्कि व्यक्तित्व में वह गुणवत्ता होनी चाहिए जो समय के साथ स्वयं अपनी पहचान बना सके।

