- जब लेखनी सवाल उठाती है, तो विचारों से अधिक अहंकार को चोट लगती है!
विनोद कुमार झा
लेखन केवल शब्दों को कागज पर उतारने का नाम नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने विचारों का आईना रखने का एक माध्यम है। एक लेखक अपनी कलम से उन सवालों को उठाता है, जिन्हें कई बार लोग देख तो रहे होते हैं, लेकिन उन पर खुलकर बोलने से बचते हैं। जब किसी लेख पर टिप्पणियां होने लगती हैं, उसके विचारों पर बहस छिड़ती है और लोग उससे सहमत या असहमत होने लगते हैं, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि लेखनी ने पाठकों के मन में विचारों की हलचल पैदा की है। आखिर जिस लेख को पढ़कर कोई प्रतिक्रिया ही न दे, उस पर चर्चा भी कैसे होगी? हालांकि, केवल टिप्पणियों की संख्या से किसी लेख की गुणवत्ता तय नहीं होती, लेकिन तर्कपूर्ण प्रतिक्रिया विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है।
आलोचना को हमेशा विरोध की नजर से देखना उचित नहीं है। आलोचना वह कसौटी है, जिस पर विचारों की मजबूती परखी जाती है। यदि कोई लेखक अपनी बात रखता है और पाठक उससे असहमति जताते हैं, तो यह लोकतांत्रिक विचार प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। असली सवाल यह है कि असहमति किस आधार पर व्यक्त की जा रही है। यदि किसी लेख में तथ्यात्मक गलती है, तो तथ्य सामने रखे जाने चाहिए। यदि विचारों में विरोधाभास है, तो तर्क के साथ उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। लेकिन जब किसी विचार का जवाब देने के बजाय लेखक की नीयत, व्यक्तित्व या विचारधारा पर ही हमला शुरू हो जाए, तब बहस का उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।
राजनीति के क्षेत्र में यह स्थिति और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। जब कोई लेखक किसी राजनीतिक दल, उसकी नीतियों, उसके नेताओं या उनके निर्णयों पर सवाल उठाता है, तो उस दल के समर्थकों की प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक है। समर्थकों को अपने पसंदीदा दल का बचाव करने का अधिकार है, लेकिन बचाव और अंधसमर्थन के बीच एक महीन अंतर होता है। किसी दल की उपलब्धियों को स्वीकार करना और उसकी कमियों पर सवाल उठाना, दोनों ही स्वस्थ राजनीतिक विमर्श के हिस्से हैं। लोकतंत्र में किसी भी दल, नेता या विचारधारा को सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता।
समस्या तब पैदा होती है, जब राजनीतिक निष्ठा व्यक्ति की विचार करने की स्वतंत्रता पर हावी होने लगती है। अपने पसंदीदा दल की हर बात को सही और दूसरे दल की हर बात को गलत मान लेना विचारों को सीमित कर देता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति किसी मुद्दे का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिणामों के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर करने लगता है कि उससे लाभ किसे और नुकसान किसे होगा। यही वह मोड़ है, जहां तर्क की जगह भावनात्मक पक्षधरता और संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप लेने लगते हैं।
'एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति' का भाव यदि अहंकार और अपनी ही सर्वोच्चता के दावे के रूप में लिया जाए, तो यह किसी भी स्वस्थ संवाद के लिए बाधा बन सकता है। जब व्यक्ति यह मानने लगता है कि केवल वही सही है और उसके विचारों से अलग कोई दूसरा विचार स्वीकार करने योग्य नहीं है, तब सीखने और समझने के रास्ते बंद होने लगते हैं। यह प्रवृत्ति केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। सामाजिक जीवन, साहित्य, पत्रकारिता और सोशल मीडिया पर भी इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। हर व्यक्ति अपनी बात को अंतिम सत्य मानने लगे, तो संवाद की गुंजाइश ही कहां बचेगी?
लेखक का दायित्व केवल प्रशंसा प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और व्यवस्था से जुड़े सवालों को सामने रखना भी है। कलम की सार्थकता इस बात में है कि वह सत्ता, समाज और स्वयं लेखक के विचारों को भी प्रश्नों के दायरे में रख सके। इसका अर्थ यह नहीं कि लेखक जो कुछ लिखे, वह हर परिस्थिति में सही ही हो। लेखक भी गलत हो सकता है, उसके निष्कर्षों में त्रुटियां हो सकती हैं और उसके विचारों से असहमत होने के ठोस कारण भी हो सकते हैं। लेकिन इन कमियों को सामने लाने का सबसे प्रभावी तरीका तर्क, प्रमाण और तथ्य हैं, न कि व्यक्तिगत कटाक्ष।
आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है। यह लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। किसी लेख को पढ़े बिना टिप्पणी करना, अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालना या असहमति रखने वाले व्यक्ति को विरोधी खेमे का सदस्य मान लेना विचारों की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। आलोचना का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि विचारों को अधिक स्पष्ट और मजबूत बनाना होना चाहिए। इसी तरह लेखक को भी आलोचना सुनने, अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने और आवश्यक होने पर अपने विचारों में सुधार करने का साहस रखना चाहिए।
सही मार्ग वह है, जिस पर चलने वाला व्यक्ति प्रश्नों से नहीं घबराता, बल्कि उनसे सीखने का प्रयास करता है। पगडंडी पर चलना आसान लग सकता है, क्योंकि वहां कई बार अपने अनुकूल विचार ही दिखाई देते हैं। लेकिन व्यापक रास्ता वही बनता है, जहां अलग-अलग मतों को सुनने, समझने और तर्क के आधार पर परखने की गुंजाइश हो। आलोचना इसी व्यापक रास्ते का एक हिस्सा है। हालांकि, हर आलोचना सही नहीं होती और हर विरोध किसी विचार की मजबूती का प्रमाण भी नहीं होता। इसलिए आवश्यक है कि आलोचना करने वाला अपने तर्कों के प्रति ईमानदार रहे और आलोचना सुनने वाला अपने अहंकार से ऊपर उठकर बात को समझने का प्रयास करे।
अंततः लेखनी का उद्देश्य किसी एक दल, व्यक्ति या विचारधारा को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि पाठकों के सामने सवाल रखना और उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। यदि किसी लेख से असहमति पैदा होती है, तो उसका उत्तर भी विचारों और तथ्यों के माध्यम से दिया जाना चाहिए। प्रशंसा लेखक को प्रोत्साहित कर सकती है, लेकिन सार्थक आलोचना उसे अपनी बात को और बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर देती है। इसलिए आलोचना से डरिए मत, उसे समझिए। असहमति से भागिए मत, उसका सामना कीजिए। क्योंकि जहां सवाल पूछने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहां विचारों का विकास भी ठहरने लगता है। कलम की असली ताकत केवल लिखने में नहीं, बल्कि सच को परखने, गलतियों को स्वीकार करने और निरंतर सीखते रहने में है। आलोचना सही दिशा दिखा सकती है, बशर्ते उसमें तर्क हो; और लेखनी समाज को रास्ता दिखा सकती है, बशर्ते उसमें निष्पक्षता हो।
