वर्चस्व की लड़ाई में दुनिया का भविष्य

 विनोद कुमार झा 

जब भी दुनिया यह मानने लगती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिरता की ओर बढ़ रही है, तब कोई न कोई भू-राजनीतिक संकट उसे फिर अस्थिर कर देता है। आज एक बार फिर दुनिया की निगाहें होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर टिकी हैं, जहां अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की परीक्षा बनता जा रहा है।

फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व अर्थव्यवस्था की उन धमनियों में से एक है, जिनमें ऊर्जा का रक्त प्रवाहित होता है। विश्व के समुद्री मार्ग से निर्यात होने वाले कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का एक बड़ा भाग इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां पैदा होने वाली किसी भी अस्थिरता का प्रभाव सीधे पेट्रोल पंपों से लेकर शेयर बाजारों तक दिखाई देता है।

अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव अचानक पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे चार दशकों से अधिक पुरानी अविश्वास की कहानी है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। आर्थिक प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव की राजनीति और सैन्य शक्ति प्रदर्शन ने इस अविश्वास को और गहरा किया है। आज होर्मुज़ उसी संघर्ष का सबसे संवेदनशील मोर्चा बन गया है।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका क्या चाहता है और ईरान क्या चाहता है। असली प्रश्न यह है कि दोनों देशों की इस शक्ति प्रतिस्पर्धा की कीमत कौन चुका रहा है। इसका उत्तर स्पष्ट है पूरी दुनिया।

अमेरिका स्वयं को वैश्विक समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा का प्रहरी मानता है। उसकी नौसैनिक उपस्थिति दुनिया के अनेक समुद्री क्षेत्रों में दिखाई देती है। दूसरी ओर ईरान का मानना है कि उसके पड़ोस में स्थित सामरिक जलमार्गों पर बाहरी शक्तियों का वर्चस्व उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए चुनौती है। परिणामस्वरूप दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बताकर पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते।

इतिहास बताता है कि होर्मुज़ में पैदा होने वाला तनाव केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। 1980 के दशक का टैंकर युद्ध, तेल टैंकरों पर हमले, समुद्री मार्गों में बाधाएं और सैन्य टकराव दुनिया पहले भी देख चुकी है। हर बार इसका परिणाम ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, व्यापारिक अनिश्चितता और आर्थिक दबाव के रूप में सामने आया है।

आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक ऊर्जा-निर्भर और आपस में जुड़ी हुई है। वैश्वीकरण ने देशों को आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर बनाया है। इसलिए किसी एक क्षेत्र का संकट अब केवल स्थानीय नहीं रह जाता। यदि होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो उसका असर एशिया की फैक्ट्रियों, यूरोप के उद्योगों और अफ्रीका के विकासशील देशों तक महसूस किया जाएगा।

भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर महंगाई, परिवहन, कृषि, उद्योग और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। भारत की आर्थिक प्रगति और विकास की गति ऊर्जा सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए होर्मुज़ में बढ़ता तनाव नई दिल्ली के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक हितों का प्रश्न भी है।

वर्चस्व की इस लड़ाई का एक और पहलू है, जिस पर कम चर्चा होती है। आधुनिक विश्व में युद्ध अब केवल सैनिकों और हथियारों के बीच नहीं लड़े जाते। आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री नाकेबंदी, साइबर हमले, आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करना और ऊर्जा को राजनीतिक हथियार बनाना भी युद्ध की नई रणनीतियों का हिस्सा बन चुके हैं। होर्मुज़ का संकट इसी बदलती वैश्विक राजनीति का प्रतीक है।

यदि सैन्य शक्ति के आधार पर देखा जाए तो अमेरिका निस्संदेह ईरान से कहीं अधिक शक्तिशाली है। उसकी नौसेना, वायुसेना, तकनीकी क्षमता और वैश्विक गठबंधन उसे बढ़त प्रदान करते हैं। लेकिन भू-राजनीति केवल सैन्य शक्ति से संचालित नहीं होती। ईरान की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय प्रभाव, मिसाइल क्षमता और असममित युद्ध रणनीति उसे एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाती है। यही कारण है कि वर्षों से चले आ रहे तनाव के बावजूद कोई भी पक्ष निर्णायक समाधान तक नहीं पहुंच पाया है।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि यह संघर्ष ऐसे समय में उभर रहा है जब दुनिया पहले ही अनेक संकटों से जूझ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर किया है। ऐसे में मध्य-पूर्व में नया तनाव वैश्विक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

यह भी सत्य है कि होर्मुज़ केवल समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक बन चुका है। यहां होने वाली हर गतिविधि दुनिया की बड़ी शक्तियों के इरादों और महत्वाकांक्षाओं को उजागर करती है। लेकिन यदि यह क्षेत्र शक्ति प्रदर्शन का स्थायी मंच बन गया, तो इसका नुकसान केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।

समय की मांग है कि संवाद को संघर्ष पर प्राथमिकता दी जाए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख वैश्विक शक्तियों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

अतः प्रश्न यह नहीं है कि होर्मुज़ पर किसका वर्चस्व स्थापित होगा। प्रश्न यह है कि क्या दुनिया एक और ऐसे संकट को टाल पाएगी, जो करोड़ों लोगों के जीवन, रोजगार और भविष्य को प्रभावित कर सकता है। यदि महाशक्तियां अपने प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की होड़ में लगी रहीं, तो जीत चाहे किसी की भी हो, हार मानवता की ही होगी। इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियां तब जन्म लेती हैं जब शक्ति विवेक पर हावी हो जाती है। होर्मुज़ आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।

(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक )

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