दुनिया को किस दिशा में ले जा रहा है अमेरिका-ईरान संघर्ष?

विनोद कुमार झा 

विश्व राजनीति में कुछ ऐसे भूभाग और समुद्री मार्ग हैं, जिनका महत्व केवल भौगोलिक नहीं बल्कि सामरिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज़ जलडमरूमध्य ऐसा ही एक समुद्री मार्ग है, जिसे विश्व ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा कहा जाता है। दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े हिस्से का परिवहन इसी संकरे रास्ते से होता है। यही कारण है कि जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था उसकी आंच महसूस करती है।

यह मुद्दा केवल अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा संघर्ष है जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। ​अगर हम मुख्य बिंदु की बात करें तो जब भी वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिरता की ओर बढ़ती दिखती है, तो कोई न कोई भू-राजनीतिक संकट उसे फिर से अस्थिर कर देता है। जैसे होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संकट को एक उदाहरण के रूप में है जो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है।

​ होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा पारगमन मार्ग है।  इस मार्ग के माध्यम से दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कच्चे तेल का निर्यात करता है। यदि यह मार्ग किसी भी कारण से बाधित होता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा,  होर्मुज़ जलडमरूमध्य का संकट केवल ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा मुद्दा है जो वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण पूरी दुनिया में अस्थिरता का माहौल पैदा हो रहा है।

 वैश्विक सुरक्षा और स्थिरता के लिए अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करना महत्वपूर्ण है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस मुद्दे को सुलझाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए और इस बात पर जोर देना चाहिए कि कोई भी संघर्ष पूरी दुनिया के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इन दिनों एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं। दोनों देश होर्मुज़ क्षेत्र में अपनी-अपनी सामरिक उपस्थिति और प्रभाव बनाए रखने के लिए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। यह कोई नया संघर्ष नहीं है। पिछले चार दशकों से यह क्षेत्र समय-समय पर अमेरिका और ईरान की शक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज दुनिया पहले से अधिक ऊर्जा-निर्भर, आर्थिक रूप से परस्पर जुड़ी हुई और भू-राजनीतिक रूप से अधिक संवेदनशील हो चुकी है।

आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है होर्मुज़?

होर्मुज़ जलडमरूमध्य की चौड़ाई कई स्थानों पर इतनी कम है कि बड़े जहाजों की आवाजाही सीमित मार्गों से ही संभव हो पाती है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देश सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ईरान अपने ऊर्जा निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचाते हैं।

विश्व के ऊर्जा बाजार की धड़कन कहीं सुनाई देती है तो वह होर्मुज़ में ही सुनाई देती है। यदि यहां कुछ दिनों के लिए भी जहाजों की आवाजाही बाधित हो जाए तो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन, कृषि, उद्योग, विमानन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ेगा।

संघर्ष की जड़ क्या है?

अमेरिका स्वयं को वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा का संरक्षक मानता है। उसकी नौसेना लंबे समय से फारस की खाड़ी में सक्रिय है। दूसरी ओर ईरान मानता है कि होर्मुज़ उसके भू-राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा है और क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों में उसकी भूमिका सर्वोपरि होनी चाहिए।

यहीं से टकराव शुरू होता है। अमेरिका समुद्री मार्गों की निर्बाध आवाजाही की बात करता है, जबकि ईरान समय-समय पर यह संकेत देता रहा है कि यदि उसके हितों पर हमला हुआ तो वह होर्मुज़ मार्ग को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। आर्थिक प्रतिबंधों, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय राजनीति को लेकर दोनों देशों के बीच अविश्वास लगातार गहराता गया है।

1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान "टैंकर युद्ध" ने पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि होर्मुज़ में अस्थिरता कितनी महंगी पड़ सकती है। तेल टैंकरों पर हमले, समुद्री बारूदी सुरंगें और सैन्य झड़पों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया था।

इसके बाद भी कई बार अमेरिकी युद्धपोतों और ईरानी नौकाओं के बीच तनावपूर्ण स्थितियां पैदा हुईं। तेल टैंकरों की जब्ती, ड्रोन गिराने की घटनाएं और प्रतिबंधों की राजनीति ने इस क्षेत्र को लगातार अस्थिर बनाए रखा है। हर बार दुनिया ने तेल की कीमतों में उछाल और आर्थिक अनिश्चितता का सामना किया है।

वर्चस्व की लड़ाई या वैश्विक दबाव की राजनीति?

वास्तव में यह संघर्ष केवल समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, ऊर्जा संसाधनों पर प्रभाव, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन और वैश्विक राजनीति में प्रभाव बढ़ाने की होड़ भी शामिल है।

अमेरिका नहीं चाहता कि खाड़ी क्षेत्र में उसकी रणनीतिक पकड़ कमजोर हो। वहीं ईरान यह संदेश देना चाहता है कि उसे नजरअंदाज कर मध्य-पूर्व की कोई भी सुरक्षा व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। दोनों देश अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियों और राष्ट्रीय हितों के कारण पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते।ऐसी स्थिति में होर्मुज़ केवल एक जलडमरूमध्य नहीं रह जाता, बल्कि वह शक्ति संतुलन का प्रतीक बन जाता है।

भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश की तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि होर्मुज़ में संकट गहराता है तो सबसे पहले इसका असर भारत के ऊर्जा आयात बिल पर दिखाई देगा।

तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, महंगाई पर दबाव बढ़ेगा और औद्योगिक उत्पादन की लागत भी प्रभावित होगी। इसके अतिरिक्त खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार रहते हैं। किसी बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए होर्मुज़ का मुद्दा केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा प्रश्न है।

कौन भारी, अमेरिका या ईरान?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि यदि संघर्ष बढ़ता है तो अमेरिका और ईरान में किसका पलड़ा भारी होगा। सैन्य शक्ति, तकनीक, नौसैनिक क्षमता और वैश्विक गठबंधनों के आधार पर अमेरिका स्पष्ट रूप से अधिक शक्तिशाली है। उसके पास दुनिया की सबसे आधुनिक सैन्य व्यवस्था और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन तंत्र है।

लेकिन ईरान की ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय नेटवर्क, मिसाइल क्षमता और असममित युद्ध रणनीति में निहित है। वह जानता है कि सीधे युद्ध में अमेरिका को चुनौती देना कठिन है, लेकिन वह क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करके वैश्विक दबाव अवश्य बना सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस संघर्ष में सैन्य जीत किसी एक पक्ष की हो सकती है, लेकिन आर्थिक और राजनीतिक नुकसान दोनों को उठाना पड़ेगा।

दुनिया की असली चिंता

सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि अमेरिका और ईरान में कौन जीतेगा। असली चिंता यह है कि इस संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा, निवेशकों की चिंता और वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाएं बढ़ सकती हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया पहले ही ऊर्जा संकट, महंगाई और भू-राजनीतिक तनावों का सामना कर चुकी है। ऐसे में होर्मुज़ क्षेत्र में नया संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक और बड़ा झटका साबित हो सकता है।

समाधान का रास्ता

इतिहास बताता है कि सैन्य शक्ति तनाव को कुछ समय के लिए दबा सकती है, लेकिन स्थायी समाधान केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव है। संयुक्त राष्ट्र, खाड़ी सहयोग परिषद, यूरोपीय शक्तियों और अन्य प्रमुख देशों को मध्यस्थता की भूमिका निभानी चाहिए। होर्मुज़ जैसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के समुद्री मार्गों की सुरक्षा को किसी एक देश के वर्चस्व का विषय बनाने के बजाय वैश्विक सहयोग का विषय बनाया जाना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा आज पूरी मानवता की साझा आवश्यकता है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का विवाद नहीं है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इस संघर्ष में यदि कोई सबसे बड़ा दांव पर लगा है तो वह है दुनिया की शांति और विकास। वर्चस्व की इस लड़ाई में भले ही कोई पक्ष स्वयं को विजेता घोषित कर दे, लेकिन यदि तेल की कीमतें आसमान छूने लगें, व्यापारिक मार्ग बाधित हो जाएं और वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में पड़ जाए, तो इतिहास यही कहेगा कि इस युद्ध में हार पूरी दुनिया की हुई थी।

- (स्वतंत्र लेखक एवं सामाजिक विश्लेषक)

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