#बारिश और मेंढकों की बारात

लेखक: विनोद कुमार झा 

सावन की पहली संध्या थी। दिन भर की उमस के बाद आसमान पर काले बादलों ने अपना डेरा जमा लिया था। दूर क्षितिज पर बादलों की लंबी कतारें किसी राजा की सेना की तरह आगे बढ़ रही थीं। हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे प्रकृति किसी लंबे इंतजार के समाप्त होने की खबर सुन चुकी हो।

धरती तपकर थक चुकी थी। खेतों की मेड़ों पर पड़ी दरारें उसकी पीड़ा की कहानी कह रही थीं। पेड़-पौधे भी मानो आसमान की ओर टकटकी लगाए खड़े थे। तभी अचानक बादलों ने गरजकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कुछ ही क्षणों बाद बारिश की पहली बूंद धरती पर गिरी।

उस बूंद के गिरते ही मिट्टी से उठी सोंधी खुशबू ने पूरे वातावरण को अपने आगोश में ले लिया। ऐसा लगा जैसे वर्षों बाद किसी माँ ने अपने बिछड़े बच्चे को सीने से लगाया हो। बूंदें धीरे-धीरे बढ़ने लगीं और देखते ही देखते रिमझिम बारिश ने पूरे गांव को भिगो दिया।

गांव के बाहर एक पुराना तालाब था। गर्मियों में उसका पानी सिकुड़ गया था, लेकिन आज बारिश की बूंदें उसे फिर से जीवन देने आई थीं। तालाब के किनारे की झाड़ियों में रहने वाले मेंढक जैसे इसी पल का इंतजार कर रहे थे।

पहली तेज फुहार पड़ते ही एक मेंढक बाहर निकला। फिर दूसरा, तीसरा और देखते ही देखते सैकड़ों मेंढक तालाब के आसपास इकट्ठा हो गए। उनकी टर्र-टर्र की आवाजें बारिश की बूंदों के साथ मिलकर ऐसा संगीत रच रही थीं कि लगता था मानो किसी बड़े विवाह समारोह की शहनाई बज रही हो।

एक छोटा-सा मेंढक था मोनू। उसने अपनी जिंदगी की पहली सावन की बारिश देखी थी। वह आश्चर्य से अपने साथियों को देख रहा था।

"सब इतने खुश क्यों हैं?" उसने अपने दादा मेंढक से पूछा

दादा ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, यह सिर्फ बारिश नहीं है। यह जीवन का उत्सव है।"

मोनू ने पूछा, "कैसा उत्सव?"

दादा ने अपनी बूढ़ी आंखों से आसमान की ओर देखते हुए कहा, "जब धरती गर्मी में तड़पती है, तब बादल दूर समुद्रों से पानी लेकर उसके पास आते हैं। यह मिलन किसी प्रेमी और प्रेमिका के मिलन से कम नहीं होता। देखो, ये बूंदें धरती को चूम रही हैं और धरती उन्हें अपनी गोद में समेट रही है।"

मोनू ने ऊपर देखा। सचमुच, काले बादलों से गिरती बूंदें किसी प्रेम-पत्र की तरह लग रही थीं, जिन्हें आसमान धरती के नाम भेज रहा था।

इधर मेंढकों की टोली पूरी मस्ती में थी। कोई पानी में गोते लगा रहा था, कोई ऊंची छलांग लगाकर अपनी खुशी जाहिर कर रहा था। उनकी टर्र-टर्र अब किसी साधारण आवाज की तरह नहीं लग रही थी। वह तो जैसे बारिश के स्वागत में गाया जा रहा मंगलगीत था।

मोनू ने कल्पना की कि वह एक बारात में शामिल है। तालाब दूल्हे का महल है, बादल बाराती हैं, बिजली रंग-बिरंगी आतिशबाजी है और बारिश की बूंदें फूलों की वर्षा। सभी मेंढक शहनाई बजाने वाले कलाकार बन गए थे।

अचानक बिजली चमकी। पूरे आकाश में उजाला फैल गया। उस रोशनी में बारिश की बूंदें मोतियों की तरह चमक उठीं। तालाब का पानी लहराकर जैसे खुशी से नाच उठा।

मोनू भी अपने साथियों के बीच कूद पड़ा। उसकी छोटी-सी टर्र-टर्र भी अब उस विशाल संगीत का हिस्सा बन चुकी थी। उसे लगा जैसे पूरी प्रकृति उसके साथ गा रही हो।

रात गहराने लगी। बारिश कुछ धीमी हो गई, लेकिन मेंढकों का उत्सव अभी भी जारी था। दूर कहीं एक किसान अपने घर के आंगन में खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखों में भी वही खुशी थी जो मेंढकों की आंखों में थी। क्योंकि यह बारिश सिर्फ मेंढकों के लिए नहीं, खेतों, पेड़ों, पक्षियों और इंसानों, सभी के लिए नई उम्मीद लेकर आई थी।

दादा मेंढक ने धीरे से कहा, "याद रखना मोनू, जीवन में कठिन गर्मियां हमेशा नहीं रहतीं। कभी न कभी सावन जरूर आता है। और जब सावन आता है, तो वह केवल पानी नहीं, उम्मीद, प्रेम और खुशियां भी साथ लाता है।"

मोनू ने आसमान की ओर देखा। बादल अब भी बरस रहे थे। उसे लगा जैसे धरती और आकाश एक-दूसरे से मिलकर मुस्कुरा रहे हैं।

तभी क्षितिज पर हल्का-सा इंद्रधनुष दिखाई दिया। वह मानो इस प्रेम कथा का अंतिम गीत था, एक ऐसा गीत, जो हर वर्ष सावन के साथ लौटता है और हमें याद दिलाता है कि प्रकृति का सबसे सुंदर संगीत प्रेम, मिलन और जीवन का संगीत है।

उस रात बारिश की बूंदें लोरी बन गईं, तालाब झूला बन गया और मेंढकों की टर्र-टर्र एक ऐसी मधुर शहनाई, जो देर तक सावन की कहानी सुनाती रही।

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