भिक्षा, भिक्षुक और भिखारी परंपरा, समाज और शब्दों का बदलता अर्थ

 भारतीय समाज में भिक्षा की अवधारणा पर एक विमर्श

विनोद कुमार झा 

भारतीय समाज में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका मूल अर्थ समय के साथ इतना बदल गया कि आज वे अपने वास्तविक स्वरूप से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। "भिक्षा", "भिक्षुक" और "भिखारी" ऐसे ही शब्द हैं। आधुनिक भारत में जब भी "भिखारी" शब्द सुनाई देता है तो आंखों के सामने किसी सड़क, चौराहे, रेलवे स्टेशन, मंदिर या ट्रैफिक सिग्नल पर हाथ फैलाकर दान मांगने वाले व्यक्ति की छवि उभर आती है। लेकिन भारतीय परंपरा, धर्मग्रंथों और सामाजिक इतिहास में भिक्षा का अर्थ इतना सीमित नहीं था।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भिक्षा और भिक्षावृत्ति के बीच के अंतर को समझा जाए तथा यह जाना जाए कि आखिर भारतीय सभ्यता में भिक्षा की व्यवस्था क्यों बनी थी और आधुनिक समाज में उसका स्वरूप कैसे बदल गया।

भिक्षा का प्राचीन भारतीय अर्थ

संस्कृत में "भिक्षा" का अर्थ केवल दान मांगना नहीं, बल्कि समाज से जीवन-निर्वाह हेतु स्वेच्छा से प्राप्त अन्न या सहायता है। वैदिक और उत्तरवैदिक काल में अनेक आश्रमों, गुरुकुलों और तपस्वियों का जीवन भिक्षा पर आधारित था।

गुरुकुलों में अध्ययनरत छात्र गांव-गांव जाकर भिक्षा लाते थे। इसे अपमानजनक नहीं बल्कि शिक्षा का एक हिस्सा माना जाता था। इसका उद्देश्य छात्रों में विनम्रता, अनुशासन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना था।

इसी प्रकार अनेक ऋषि, संन्यासी और तपस्वी भी भिक्षा ग्रहण करते थे। वे बदले में समाज को ज्ञान, शिक्षा, आध्यात्मिक मार्गदर्शन और नैतिक मूल्यों का उपदेश देते थे। इसलिए भिक्षा केवल लेने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि समाज और ज्ञानपरंपरा के बीच एक प्रकार का आदान-प्रदान था।

ब्राह्मण और भिक्षा का संबंध

धर्मशास्त्रों और अनेक पुराणों में ब्राह्मणों को भिक्षा ग्रहण करने का अधिकार बताया गया है। इसका कारण यह था कि उनका प्रमुख कार्य अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ-विधान और ज्ञान का संरक्षण माना जाता था।

पारंपरिक व्यवस्था में आदर्श ब्राह्मण से अपेक्षा की जाती थी कि वह धन संचय को जीवन का लक्ष्य न बनाए। वह समाज को ज्ञान प्रदान करे और बदले में समाज उसके जीवन-निर्वाह की व्यवस्था करे। इसीलिए "भिक्षुक" शब्द कई ग्रंथों में सम्मानजनक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

यहां यह समझना आवश्यक है कि प्राचीन "भिक्षुक" और आधुनिक "भिखारी" एक ही अर्थ के शब्द नहीं हैं। एक व्यक्ति ज्ञान, साधना या शिक्षा के उद्देश्य से भिक्षा ग्रहण करता था, जबकि दूसरा व्यक्ति आजीविका के अभाव या अन्य कारणों से भीख मांगता है।

बौद्ध और जैन परंपराओं में भिक्षा

भारतीय संस्कृति में केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि बौद्ध और जैन परंपराओं में भी भिक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

भगवान बुद्ध के अनुयायी भिक्षु प्रतिदिन भिक्षाटन करते थे। जैन मुनि भी गृहस्थों से आहार ग्रहण करते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया कठोर नियमों से बंधी होती थी। इसका उद्देश्य धन संग्रह नहीं, बल्कि न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीवन व्यतीत करना था। इस दृष्टि से भिक्षा त्याग, संयम और सादगी का प्रतीक थी, न कि पेशा।

आधुनिक भिखारियों की बढ़ती संख्या

आज महानगरों, शहरों, धार्मिक स्थलों, रेलवे स्टेशनों और ट्रैफिक सिग्नलों पर बड़ी संख्या में लोग भीख मांगते दिखाई देते हैं। इसके पीछे अनेक सामाजिक और आर्थिक कारण हैं।

गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन, मानसिक रोग, नशे की लत, पारिवारिक विघटन और सामाजिक सुरक्षा की कमी ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनके कारण लोग भिक्षावृत्ति की ओर धकेले जाते हैं।

कई स्थानों पर संगठित गिरोह भी भिक्षावृत्ति को व्यवसाय के रूप में संचालित करते हैं। ऐसे मामलों में महिलाएं, बच्चे और दिव्यांग व्यक्ति भी शोषण का शिकार बनते हैं।

इसलिए आधुनिक भिक्षावृत्ति को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यह सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता और मानवीय गरिमा से जुड़ा विषय भी है।

क्या हर भिखारी किसी विशेष जाति का होता है?

यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या सड़कों पर दिखाई देने वाले भिखारियों में किसी विशेष जाति के लोग होते हैं या नहीं।वास्तविकता यह है कि आधुनिक भिक्षावृत्ति किसी एक जाति, समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है। गरीबी और सामाजिक संकट जातीय सीमाओं को नहीं देखते। विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग भिक्षावृत्ति में पाए जा सकते हैं।

इसलिए यह मान लेना कि सड़क पर भीख मांगने वाला व्यक्ति किसी एक जाति विशेष का प्रतिनिधि है, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

भारत की जनगणना और विभिन्न सामाजिक अध्ययनों से भी यह स्पष्ट होता है कि भिक्षावृत्ति का संबंध मुख्यतः आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों से है, न कि किसी एक जातीय पहचान से।

शब्दों का भ्रम और सामाजिक धारणा

समस्या का एक बड़ा कारण भाषा और शब्दों का बदलता अर्थ भी है। प्राचीन साहित्य में "भिक्षुक" सम्मानजनक शब्द था। वह व्यक्ति ज्ञान, तपस्या या आध्यात्मिक साधना के लिए भिक्षा ग्रहण करता था। वहीं आज "भिखारी" शब्द आमतौर पर सामाजिक और आर्थिक विवशता से जुड़े व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है।

समय के साथ इन दोनों अवधारणाओं का अंतर धुंधला हो गया। परिणामस्वरूप कई बार लोग ऐतिहासिक संदर्भों को वर्तमान परिस्थितियों पर लागू कर देते हैं और भ्रम पैदा होता है।

समाज की विडंबना या सहानुभूति?

यह सच है कि भारतीय समाज ने सदियों तक ज्ञान परंपरा को संरक्षित रखने वालों का सम्मान किया। गुरुओं, आचार्यों, विद्वानों और संन्यासियों को समाज से सहयोग मिलता रहा।

दूसरी ओर यह भी सच है कि आज लाखों लोग आर्थिक मजबूरियों के कारण जीवन के संघर्ष से जूझ रहे हैं। उनके प्रति सहानुभूति और पुनर्वास की आवश्यकता है।

विडंबना तब पैदा होती है जब ज्ञान के लिए ग्रहण की जाने वाली भिक्षा और मजबूरी में की जाने वाली भिक्षावृत्ति को एक ही तराजू में तौल दिया जाता है। दोनों की परिस्थितियां, उद्देश्य और सामाजिक भूमिका अलग-अलग हैं।

भारतीय परंपरा में भिक्षा केवल हाथ फैलाने का नाम नहीं थी। यह ज्ञान, तपस्या, सेवा और समाज के बीच पारस्परिक सहयोग की व्यवस्था थी। वहीं आधुनिक भिक्षावृत्ति अधिकांशतः सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का परिणाम है।

इसलिए "भिक्षुक" और "भिखारी" के बीच के ऐतिहासिक और सामाजिक अंतर को समझना आवश्यक है। किसी भी समुदाय, जाति या वर्ग को आधुनिक भिक्षावृत्ति के आधार पर परिभाषित करना न तो न्यायसंगत है और न ही ऐतिहासिक दृष्टि से सही।

भारतीय समाज की वास्तविक चुनौती यह नहीं है कि भिक्षा किसने मांगी, बल्कि यह है कि ज्ञान का सम्मान बना रहे और कोई व्यक्ति भूख, अभाव या विवशता के कारण भीख मांगने को मजबूर न हो। यही एक संवेदनशील, समतामूलक और सभ्य समाज की पहचान होगी।

(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)

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