कलम की जंजीर...

लेखक : विनोद कुमार झा 

गांव के उस पुराने मकान की दीवारों पर समय की परतें जम चुकी थीं। बरामदे के कोने में रखी लकड़ी की मेज, जिस पर वर्षों से एक पुरानी स्याहीदानी और कुछ पीले पड़ चुके कागज़ रखे थे, आज भी किसी की प्रतीक्षा करती दिखाई देती थी। उस मेज से एक ऐसी कहानी जुड़ी थी, जो केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की कहानी थी जिनके सपने परिस्थितियों की धूल में दब जाते हैं, लेकिन मरते नहीं।

उस मेज का मालिक था रघुवीर प्रसाद। रघुवीर बचपन से ही शब्दों का प्रेमी था। जब उसके हमउम्र बच्चे खेतों में खेलते थे, वह पेड़ की छांव में बैठकर किताबों के पन्ने पलटता रहता। गांव के मास्टरजी अक्सर कहा करते थे, "यह लड़का बड़ा होकर लेखक बनेगा। इसके शब्दों में आग भी है और पानी भी।"

रघुवीर यह सुनकर मुस्कुरा देता। उसके मन में एक सपना पलता था वह ऐसा लेखक बनेगा जिसकी कलम समाज की आवाज बनेगी। लेकिन जीवन केवल सपनों से नहीं चलता।

जब वह बीस वर्ष का हुआ, तभी उसके पिता का अचानक देहांत हो गया। घर की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। मां बीमार रहने लगीं, दो छोटी बहनें थीं जिनकी पढ़ाई और विवाह की चिंता अलग थी। उस दिन पहली बार उसने महसूस किया कि गरीबी केवल जेब की कमी नहीं होती, वह सपनों की भी दुश्मन होती है।

रघुवीर ने शहर जाकर नौकरी कर ली। दिनभर दफ्तर में फाइलों के बीच उलझा रहता और रात को थका हुआ लौटता। उसके भीतर का लेखक हर दिन कुछ लिखना चाहता था, लेकिन जिम्मेदारियों की जंजीरें उसकी उंगलियों को रोक लेती थीं।

फिर भी उसने अपनी पुरानी डायरी नहीं छोड़ी। जब भी समय मिलता, वह अपने मन की बातें उसमें लिख देता। कभी मां की तकलीफ, कभी मजदूरों का संघर्ष, कभी किसानों की व्यथा, तो कभी उन बच्चों के सपने जो अभावों में पल रहे थे।

धीरे-धीरे वह डायरी उसकी सबसे बड़ी मित्र बन गई। समय बीतता गया। बहनों की शादी हो गई। मां भी एक दिन उसे छोड़कर चली गईं। घर में अब सन्नाटा था और रघुवीर की उम्र पचपन वर्ष पार कर चुकी थी।

एक रात उसने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे। हर पन्ने पर जीवन का एक अध्याय दर्ज था। उसकी आंखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे उसकी कलम उससे शिकायत कर रही हो।

"तुमने मुझे क्यों बांध दिया?" वह देर तक उस सवाल से जूझता रहा। उसे याद आया कि कितनी कहानियां उसके भीतर जन्म लेकर मर गईं। कितने विचार कागज़ पर उतरने से पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गए।

उस रात वह सो नहीं पाया। सुबह होते ही उसने एक निर्णय लिया। अब वह लिखेगा। उम्र चाहे जो हो, लेकिन सपनों की कोई उम्र नहीं होती। उसने नौकरी से अवकाश लिया और पूरे मन से लेखन शुरू कर दिया।

शुरुआत आसान नहीं थी। प्रकाशकों ने उसकी पांडुलिपियां लौटाईं। कुछ ने कहा कि उसकी भाषा पुरानी है, कुछ ने कहा कि ऐसे विषय अब नहीं बिकते।

लेकिन रघुवीर हार मानने वालों में से नहीं था। वह लगातार लिखता रहा। उसे विश्वास था कि सच्चे शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते। एक दिन उसकी कहानी एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई। कहानी थी "मिट्टी की आवाज"।

यह कहानी एक किसान के संघर्ष पर आधारित थी। कहानी पढ़कर हजारों पाठकों ने पत्र लिखे। किसी ने कहा कि यह उसके पिता की कहानी है, किसी ने कहा कि इसमें उसका अपना जीवन दिखाई देता है।

रघुवीर पहली बार समझ पाया कि शब्दों की ताकत क्या होती है। उसकी कलम अब केवल उसकी नहीं रही थी, वह समाज की आवाज बन चुकी थी। धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी।

उसकी कहानियां मजदूरों, किसानों, महिलाओं, बुजुर्गों और वंचित लोगों की पीड़ा को सामने लाती थीं। लोग कहते थे कि रघुवीर की रचनाओं में दर्द बोलता है। लेकिन रघुवीर जानता था कि वह दर्द उसका अपना नहीं, समाज का है।

एक दिन उसे एक पत्र मिला। पत्र एक जेल में बंद युवक का था। उसने लिखा था  "आपकी कहानी पढ़कर मैंने अपने जीवन को नए नजरिए से देखना शुरू किया है। मैं अपराध की दुनिया में चला गया था, लेकिन आपकी रचनाओं ने मुझे बदल दिया। अब मैं पढ़ाई करना चाहता हूं और समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहता हूं।"

पत्र पढ़ते-पढ़ते रघुवीर की आंखों से आंसू बह निकले। उसे लगा कि उसकी कलम की जंजीर आखिर टूट चुकी है। वह कलम जो वर्षों तक जिम्मेदारियों में बंधी रही, आज किसी के जीवन को दिशा दे रही थी।

कुछ वर्षों बाद रघुवीर का नाम देश के प्रमुख साहित्यकारों में गिना जाने लगा। उसे पुरस्कार मिले, सम्मान मिले, मंच मिले।लेकिन उसके लिए सबसे बड़ा सम्मान तब था जब कोई साधारण पाठक कहता  "आपने हमारी कहानी लिख दी।"

एक साहित्यिक समारोह में उनसे पूछा गया  "आपकी सफलता का रहस्य क्या है?" रघुवीर कुछ क्षण मौन रहे।

फिर उन्होंने अपनी पुरानी डायरी उठाई और कहा, "यह डायरी मेरी सबसे बड़ी शिक्षक है। इसने मुझे सिखाया कि परिस्थितियां इंसान को रोक सकती हैं, लेकिन उसके सपनों को नहीं मार सकतीं।" सभा में सन्नाटा छा गया।

उन्होंने आगे कहा, "हर व्यक्ति के हाथ में एक कलम होती है। किसी के पास सचमुच की कलम, किसी के पास कर्म की कलम, किसी के पास विचारों की कलम। लेकिन अक्सर हम उसे डर, जिम्मेदारियों, असफलताओं और समाज की अपेक्षाओं की जंजीरों से बांध देते हैं। असली संघर्ष उन जंजीरों को तोड़ने का है।" तालियों की गड़गड़ाहट देर तक गूंजती रही।

समारोह समाप्त होने के बाद एक युवा लेखक उनके पास आया। उसने कहा, "सर, मुझे लगता है कि मेरी परिस्थितियां मुझे लिखने नहीं देंगी।" रघुवीर मुस्कुराए।

उन्होंने अपनी जेब से एक पुराना पेन निकाला और युवक को देते हुए बोले, "परिस्थितियां जंजीर बन सकती हैं, लेकिन कलम की ताकत उनसे बड़ी होती है। जब तक तुम्हारे भीतर सच जीवित है, तब तक लिखते रहो।" युवक की आंखों में चमक आ गई।

रघुवीर ने आकाश की ओर देखा। उन्हें लगा जैसे वर्षों पहले छूटे हुए उनके सारे सपने आज मुस्कुरा रहे हों। उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि कलम कभी कैद नहीं होती। कैद तो केवल मन होता है। जब मन की जंजीरें टूटती हैं, तब शब्द उड़ान भरते हैं और इतिहास बन जाते हैं।

"कलम की जंजीर" केवल एक लेखक की कहानी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की कहानी है जो अपने सपनों को परिस्थितियों की कैद में जीता है। यह कहानी बताती है कि जिम्मेदारियां जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन यदि मन में विश्वास जीवित रहे तो देर से ही सही, सपनों को पंख अवश्य मिलते हैं। क्योंकि शब्दों की दुनिया में हार अंतिम सत्य नहीं होती, बल्कि एक नई शुरुआत का पहला अध्याय होती है।

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