मन की आजादी और अहंकारों का शोर



मन की आजादी आवाजों में घिर गई है,

सच की राह भी अब खामोशी में छिप गई है।

दर्द किसे सुनाऊं, किससे अपना हाल कहूं,

हर शख्स यहां अपने ही अहंकार में डूबा है।

दुख की दास्तां सुनने वाला कोई नहीं,

भीड़ तो है बहुत, मगर अपना कोई नहीं।

हर जुबां पर अपने सच का दावा है,

लेकिन आईना देखने का साहस किसी में नहीं।

अब सच साबित हो रहा है गलियों की आवाजों में,

झूठ पल रहा है सत्ता और साजिशों के राजों में।

कल तक जो सिर उठाकर चलने की बात करते थे,

आज घुटने टेकने को आतुर हैं अपने ही समाजों में।

कहां गई वह सोच, कहां गया वह स्वाभिमान,

क्यों मौन हो गया इंसान का आत्मसम्मान?

आवाज उठाना अब बगावत समझा जाता है,

और सच बोलने वाला ही कठघरे में खड़ा किया जाता है।

मगर याद रखना, खामोशी हमेशा हार नहीं होती,

हर झुकी हुई नजर में स्वीकारोक्ति नहीं होती।

जिस दिन मन की आजादी आवाज बनकर उठेगी,

अहंकार की हर दीवार अपने आप टूटेगी।

क्योंकि सच को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं,

आवाज को कुछ पल रोका जा सकता है, सुलाया नहीं।

समाज की असली पहचान उसके स्वाभिमान में है,

न कि किसी के अहंकार के सामने झुक जाने में है।

-विनोद झा


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