उल्टे लटके बांस पर : अब खोने को बचा नहीं, पाने की इस मझधार में

-राजनीतिक दांव-पेच में उलझा जीवन, बंद रास्तों के बीच बदलाव की तलाश करती जनता

विनोद कुमार झा 

जीवन जब अपनी तमाम उम्मीदों, आकांक्षाओं और सपनों के साथ आगे बढ़ना चाहता है, तब कई बार परिस्थितियां उसे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं, जहां आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई नहीं देता। चारों तरफ बंद दरवाजे, सामने खड़ी चुनौतियां और पीछे छूटती उम्मीदें इंसान को भीतर तक झकझोर देती हैं। ऐसे समय में मन के भीतर एक ही सवाल उठता है कि आखिर कब तक परिस्थितियों के सामने घुटने टेके जाएं और कब तक दूसरों के बिछाए जाल में उलझकर अपनी मंजिल से दूर होते रहें? राजनीति में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखाई देती है, जहां सत्ता की चालें, कुर्सी की खींचतान, स्वार्थों का टकराव और वादों की लंबी फेहरिस्त के बीच आम आदमी की जिंदगी अक्सर किसी ऐसे बांस की तरह नजर आती है, जो उल्टा लटका हुआ है। न उसे जमीन का सहारा मिलता है और न ही आसमान की ओर बढ़ने की स्वतंत्रता। वह बीच में अटका रहता है, जबकि उसके आसपास अपनी-अपनी सुविधाओं के हिसाब से खेल खेलने वाले लोग रास्ते बदलते रहते हैं।

अब खोने को बचा नहीं, पाने की इस मझधार में, यह पंक्ति केवल निराशा का बयान नहीं, बल्कि उस मनःस्थिति का प्रतीक है, जहां इंसान लगातार संघर्ष करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि जब खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं, तो फिर डर किस बात का? यह सवाल किसी व्यक्ति के निजी जीवन से लेकर सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था तक अपनी प्रासंगिकता रखता है। जब जनता महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक दबाव, अधूरे वादों और रोजमर्रा की परेशानियों के बीच अपनी जिंदगी चलाने के लिए संघर्ष करती है, तब उसके धैर्य की भी एक सीमा होती है। उम्मीदों के सहारे वह लंबे समय तक इंतजार कर सकती है, लेकिन जब इंतजार ही उसकी नियति बना दिया जाए, तब उसके भीतर सवाल जन्म लेने लगते हैं। यही सवाल लोकतंत्र की असली ताकत हैं, क्योंकि जनता केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि अपने जीवन में दिखाई देने वाले बदलावों से संतुष्ट होती है।

राजनीतिक दांव-पेच लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनहित से हटकर केवल सत्ता, पद और व्यक्तिगत लाभ तक सीमित होता दिखाई देता है, तब जनता के मन में असमंजस पैदा होना स्वाभाविक है। चुनाव के समय उम्मीदों के दीप जलाए जाते हैं। विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने के वादे किए जाते हैं। जनता भी अपने बेहतर भविष्य की कल्पना करते हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करती है। लेकिन असली परीक्षा चुनावी भाषणों के बाद शुरू होती है। जनता यह देखना चाहती है कि उसके जीवन में कितना बदलाव आया, कितनी समस्याओं का समाधान हुआ और कितने वादे जमीन पर उतरे। यदि उसे बार-बार केवल आश्वासनों की गठरी थमाई जाती है, तो सवाल उठना तय है कि आखिर उसके हिस्से का विकास किस मोड़ पर ठहर गया?

राजनीति की बिसात पर मोहरे बदलते रहते हैं। कभी समीकरण बनते हैं, कभी बिगड़ते हैं। कभी साथ चलने वाले अलग रास्ता पकड़ लेते हैं, तो कभी विरोध की आवाजें नए गठबंधन में बदल जाती हैं। इन बदलावों के अपने राजनीतिक कारण हो सकते हैं, लेकिन आम जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह रहता है कि इन सबके बीच उसके जीवन में क्या बदला? सत्ता के गलियारों में चलने वाली चर्चाएं, बैठकों में बनने वाली रणनीतियां और सार्वजनिक मंचों से दिए जाने वाले बयान तभी सार्थक हैं, जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। अन्यथा राजनीति का पूरा खेल जनता के लिए एक ऐसे तमाशे में बदल सकता है, जिसमें मंच पर पात्र बदलते रहते हैं, संवाद नए होते रहते हैं, मगर दर्शकों की परेशानियां जस की तस बनी रहती हैं।

उल्टे लटके बांस की तस्वीर अपने भीतर एक गहरा व्यंग्य समेटे हुए है। बांस सामान्यतः जमीन में जड़ें जमाकर ऊपर की ओर बढ़ता है। उसकी मजबूती उसकी जड़ों में होती है, उसकी ऊंचाई उसकी निरंतर वृद्धि का प्रमाण होती है। लेकिन जब उसे उल्टा लटका दिया जाए, तो उसकी स्वाभाविक दिशा और उपयोग दोनों बदल जाते हैं। यही स्थिति तब पैदा होती है, जब किसी व्यवस्था में प्राथमिकताएं उलट जाती हैं। जिन मुद्दों पर सबसे पहले ध्यान दिया जाना चाहिए, वे पीछे छूट जाते हैं और जिन विषयों को बाद में देखा जा सकता है, वे बहस के केंद्र में आ जाते हैं। जनता की बुनियादी जरूरतें किनारे खड़ी रहती हैं और राजनीतिक प्रतिष्ठा, आरोप-प्रत्यारोप तथा शक्ति प्रदर्शन चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। ऐसे में सवाल किसी एक व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि उस कार्यशैली का है, जिसमें व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही धुंधला पड़ने लगता है।

जीवन की मझधार में फंसे व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह अपने भीतर की उम्मीद को किस तरह बचाए। नदी के बीच नाव डगमगाने लगे, किनारे दूर दिखाई दें और लहरें लगातार दिशा बदलती रहें, तब नाविक को केवल पानी की गहराई का अनुमान नहीं लगाना होता, बल्कि अपने साहस और विवेक को भी संभालना पड़ता है। जनता भी कुछ ऐसी ही नाव की सवारी कर रही होती है। उसे अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करना है, बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना है, रोजगार की तलाश करनी है और बढ़ती जरूरतों के बीच जीवन को संतुलित रखना है। उसके सामने राजनीतिक बहसों से अधिक महत्वपूर्ण रोटी, रोजगार, सम्मान और सुरक्षा के प्रश्न होते हैं। यदि इन प्रश्नों का उत्तर उसे समय पर नहीं मिलता, तो उसकी बेचैनी बढ़ती है। वह पुराने रास्तों पर दोबारा विचार करती है और नए विकल्पों की तलाश शुरू करती है।

मरता तो क्या नहीं करता जनता, इस कथन का अर्थ केवल मजबूरी में कोई कदम उठा लेना नहीं है, बल्कि उस सीमा को समझना है, जहां लगातार दबाव झेल रहा समाज बदलाव की जरूरत महसूस करने लगता है। जब किसी व्यक्ति के सामने सभी रास्ते बंद दिखाई देते हैं, तो वह दीवार के सहारे बैठकर अपनी किस्मत को कोस सकता है, लेकिन वह दीवार में दरवाजा खोजने या नया रास्ता बनाने का प्रयास भी कर सकता है। समाज की प्रगति इसी दूसरी प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। निराशा यदि विवेक को समाप्त कर दे, तो वह विनाश का कारण बन सकती है; लेकिन वही निराशा यदि जागरूकता, संगठन और रचनात्मक प्रयास में बदल जाए, तो परिवर्तन की शुरुआत बन सकती है। इसलिए जनता की बेचैनी को केवल असंतोष कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। उसके पीछे छिपे कारणों को समझना और उनका समाधान तलाशना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

बंद रास्तों के बीच नया रास्ता बनाना आसान नहीं होता। इसके लिए साहस के साथ धैर्य, भावनाओं के साथ विवेक और नारों के साथ ठोस कार्ययोजना की जरूरत होती है। समाज में बदलाव केवल आक्रोश से नहीं आता, बल्कि तब आता है, जब लोग अपनी समस्याओं को पहचानते हैं, उनके कारणों पर विचार करते हैं और समाधान के लिए एकजुट होकर प्रयास करते हैं। लोकतंत्र नागरिकों को अपनी बात रखने, सवाल पूछने, शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने और संवैधानिक माध्यमों से बदलाव की मांग करने का अवसर देता है। जनता की असली ताकत इसी जागरूक भागीदारी में निहित है। वह अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांग सकती है, नीतियों का मूल्यांकन कर सकती है और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपने निर्णय ले सकती है। इस प्रक्रिया में न तो अंधसमर्थन उपयोगी है और न ही बिना विचार किया गया विरोध। जरूरी है कि हर निर्णय जनहित, जवाबदेही और दूरगामी परिणामों की कसौटी पर परखा जाए।

राजनीति में सबसे बड़ी विडंबना तब दिखाई देती है, जब जनता के नाम पर लिए जाने वाले फैसलों में जनता की आवाज ही कमजोर पड़ जाती है। आम नागरिक अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनता है कि वे उसकी समस्याओं को समझें, उसकी जरूरतों को प्राथमिकता दें और सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग जनकल्याण के लिए करें। प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के प्रति उत्तरदायी बने रहना भी है। जनादेश किसी को मनमानी करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का अवसर प्रदान करता है। इसी तरह जनता का समर्थन भी स्थायी और बिना शर्त मिलने वाली कोई वस्तु नहीं है। भरोसा काम से बनता है, संवाद से मजबूत होता है और जवाबदेही से कायम रहता है। जहां इन तीनों का अभाव होता है, वहां जनता और व्यवस्था के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

यह भी समझना जरूरी है कि हर राजनीतिक संघर्ष को केवल सत्ता पाने और खोने की लड़ाई मान लेना पर्याप्त नहीं है। नीतियों पर मतभेद, विचारों का टकराव और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र में स्वाभाविक हैं। लेकिन इन सबके बीच सार्वजनिक हित की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य केवल विरोधी को कमजोर करना रह जाए, तो विकास और जनसमस्याओं पर होने वाली चर्चा पीछे छूट सकती है। किसी भी दल या प्रतिनिधि का मूल्यांकन केवल उसके भाषणों, नारों अथवा विरोधियों पर लगाए गए आरोपों से नहीं, बल्कि उसके काम, निर्णयों, उपलब्धियों और जनता के प्रति जवाबदेही से होना चाहिए। नागरिकों के लिए भी यही उचित है कि वे राजनीतिक दावों को तथ्यों के आधार पर परखें और अपनी राय बनाने से पहले अलग-अलग पक्षों को समझें।

आज के समय में जनता पहले की तुलना में अधिक सूचनाएं प्राप्त कर सकती है। मोबाइल, समाचार माध्यमों और सामाजिक मंचों ने सूचनाओं तक पहुंच आसान बनाई है, हालांकि भ्रामक खबरों और अधूरी जानकारियों की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे वातावरण में जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हर वायरल संदेश सच नहीं होता और हर प्रभावशाली भाषण किसी समस्या का समाधान नहीं होता। किसी भी दावे की पुष्टि करना, तथ्य और राय के बीच अंतर समझना तथा बिना जांचे-परखे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना लोकतांत्रिक चेतना का आवश्यक हिस्सा है। जनता जब जानकारी के आधार पर सवाल करती है, तभी राजनीतिक संवाद अधिक सार्थक बनता है। इससे न केवल प्रतिनिधियों की जवाबदेही मजबूत होती है, बल्कि समाज को भावनात्मक उकसावे और भ्रम से बचने में भी मदद मिलती है।

लेकिन जनता से केवल जागरूक रहने की अपेक्षा करना भी पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह लोगों की शिकायतें सुने, समस्याओं का समयबद्ध समाधान करे और अपनी नीतियों तथा निर्णयों की जानकारी पारदर्शी ढंग से उपलब्ध कराए। रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं को अवसर चाहिए, किसानों को अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल चाहिए, छोटे कारोबारियों को स्थिर परिस्थितियां चाहिए और परिवारों को शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं तक उचित पहुंच चाहिए। इन जरूरतों को किसी राजनीतिक नारे में समेटकर उनकी वास्तविक कठिनाइयों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। जनता के जीवन में सकारात्मक बदलाव तभी दिखाई देगा, जब योजनाओं की घोषणा के साथ उनके क्रियान्वयन पर भी ध्यान दिया जाएगा। कागजों पर बनी योजनाएं तभी सार्थक होती हैं, जब उनका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे।

‘अब खोने को बचा नहीं’ की मनःस्थिति में छिपी पीड़ा को भी समझना होगा। जब व्यक्ति लगातार असफलताओं, उपेक्षा या अन्याय का अनुभव करता है, तो उसके भीतर व्यवस्था से मोहभंग होने का खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन किसी समाज की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि वह कभी निराश न हो, बल्कि यह है कि निराशा के समय भी वह अपने विवेक, मानवीय मूल्यों और भविष्य के प्रति विश्वास को जीवित रखे। किसी भी कठिन परिस्थिति में जल्दबाजी, हिंसा या अंधानुकरण को समाधान मान लेना नई समस्याएं पैदा कर सकता है। वास्तविक साहस वह है, जो कठिन सवाल पूछने के साथ सही रास्ते पर टिके रहने की क्षमता भी दे। अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना एक स्वस्थ समाज की पहचान है।

राजनीति में जनता को केवल भीड़ समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। भीड़ कुछ समय के लिए किसी नारे के पीछे चल सकती है, लेकिन जागरूक नागरिक अपने अनुभव, विवेक और अपेक्षाओं के आधार पर निर्णय करता है। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसके जीवन की कठिनाइयों को कितनी गंभीरता से लिया गया। उसे भाषणों में सम्मान देने से अधिक जरूरी है कि व्यवहार में उसकी गरिमा सुरक्षित रहे। उसकी शिकायतों को सुनना, सवालों का जवाब देना और गलतियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करना नेतृत्व की जिम्मेदारी है। जनता की अपेक्षाओं और व्यवस्था के निर्णयों के बीच संवाद जितना मजबूत होगा, अविश्वास की खाई उतनी ही कम होगी।

उल्टे लटके बांस पर खड़े होकर मंजिल तलाशना शायद असंभव-सा प्रतीत हो, लेकिन यह प्रतीक हमें व्यवस्था की दिशा पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। क्या हमारी प्राथमिकताएं सही हैं? क्या जनहित को वास्तव में सर्वोपरि रखा जा रहा है? क्या राजनीति का उद्देश्य समाज को आगे बढ़ाना है या केवल एक-दूसरे को पीछे खींचना? क्या जनता की आवाज निर्णय प्रक्रिया तक पहुंच पा रही है? इन सवालों के उत्तर किसी एक भाषण या बयान में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के कामकाज और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों में मिलते हैं। यदि रास्ता गलत दिशा में जा रहा है, तो उसे सुधारना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का परिचायक है। समय रहते दिशा बदल लेना उस स्थिति से बेहतर है, जब मंजिल से दूरी इतनी बढ़ जाए कि लौटना भी कठिन हो जाए।

आखिरकार, जीवन की मझधार में फंसे समाज के सामने दो रास्ते होते हैं, या तो वह परिस्थितियों को अपनी नियति मानकर बैठ जाए, या अपनी समस्याओं को समझकर बेहतर भविष्य के लिए प्रयास शुरू करे। राजनीतिक दांव-पेच कितने भी जटिल क्यों न हों, जनता के जीवन से जुड़े सवालों को हमेशा केंद्र में रहना चाहिए। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि सत्ता और समाज के बीच संवाद बना रहे, निर्णयों में जनहित को महत्व मिले और नागरिकों को अपने भविष्य के निर्माण में भागीदारी का अवसर प्राप्त हो।

जब सारे रास्ते बंद होते दिखाई दें, तब नया रास्ता तलाशने की जरूरत सबसे अधिक होती है। यह रास्ता निराशा से नहीं, जागरूकता से निकलेगा; अंधसमर्थन से नहीं, विवेकपूर्ण सवालों से बनेगा; और केवल नारों से नहीं, ठोस प्रयासों से आगे बढ़ेगा। जनता की असली शक्ति उसकी संख्या भर में नहीं, बल्कि उसके विचार, एकता, संवैधानिक अधिकारों और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता में है। इसलिए ‘अब खोने को बचा नहीं, पाने की इस मझधार में’ को केवल हताशा का वाक्य मानना उचित नहीं होगा। यह उस मोड़ का संकेत भी हो सकता है, जहां इंसान अपनी परिस्थितियों पर पुनर्विचार करता है, पुराने रास्तों की सीमाओं को पहचानता है और नई दिशा की तलाश शुरू करता है। क्योंकि जब रास्ते बंद होते हैं, तभी यह तय करने का अवसर मिलता है कि आगे बढ़ने के लिए केवल पुराने दरवाजों पर दस्तक देनी है या अपने विवेक, साहस और सामूहिक प्रयास से एक नया रास्ता बनाना है।

( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)

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