विनोद कुमार झा
कभी-कभी सच इ उसतना कड़वा नहीं होता, जितना उसे कहने का तरीका उसे बना देता है। शब्द वही होते हैं, बात वही होती है और सामने खड़ा व्यक्ति भी वही होता है, लेकिन परिस्थितियां बदलते ही सच का स्वाद बदल जाता है। किसी के मुंह से निकला वही वाक्य कभी सलाह लगता है, कभी शिकायत और कभी अपमान। जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि लोग अक्सर सच सुनना तो चाहते हैं, लेकिन ऐसा सच नहीं, जो उनके भीतर छिपे आईने को उनके सामने ला खड़ा करे। इसलिए सच जब अहंकार की दीवार से टकराता है तो उसमें कड़वाहट घुल जाती है और रिश्तों की मिठास धीरे-धीरे कम होने लगती है।
शहर के एक पुराने मोहल्ले में रघुवीर नाम का एक व्यक्ति रहता था। उम्र करीब साठ वर्ष, चेहरे पर अनुभव की गहरी लकीरें और बोलचाल में एक ऐसी साफगोई, जो आज के समय में कम ही दिखाई देती थी। मोहल्ले के लोग उसे पसंद भी करते थे और उससे बचते भी थे। पसंद इसलिए कि वह किसी के साथ अन्याय होता देख चुप नहीं रहता था और बचते इसलिए थे कि रघुवीर सामने वाले के चेहरे की ओर देखकर वही कहता था, जो उसे सच दिखाई देता था। उसकी आदत थी कि बात को घुमाकर कहने के बजाय सीधे शब्दों में अपनी बात रख देता था।
रघुवीर का एक बेटा था अमित। पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी कर रहा था। पिता को उस पर गर्व था, लेकिन दोनों के बीच विचारों की दूरी बढ़ती जा रही थी। अमित को लगता था कि पिता हर बात में कमी निकालते हैं और रघुवीर को लगता था कि बेटा सफलता की दौड़ में उन मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है, जिनके सहारे उसने उसे बड़ा किया था।
एक दिन अमित घर लौटा तो उसके हाथ में एक फाइल थी। उसने पिता को बताया कि कंपनी में उसकी पदोन्नति होने वाली है। इसके लिए उसे एक ऐसे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे जल्द से जल्द पूरा करना था। अमित उत्साह में था। उसने कहा, “पिताजी, अब जिंदगी बदलने वाली है। बड़ा पद मिलेगा, वेतन बढ़ेगा और समाज में सम्मान भी बढ़ेगा।”
रघुवीर ने बेटे की खुशी देखी और मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तरक्की अच्छी बात है, लेकिन ध्यान रखना कि पद बड़ा हो तो जिम्मेदारी भी बड़ी होती है। केवल कुर्सी ऊंची होने से आदमी बड़ा नहीं होता।”
अमित को पिता की बात अच्छी नहीं लगी। उसने कहा, “आपको मेरी किसी बात में खुशी दिखाई ही नहीं देती। हर अच्छी खबर में भी आप कोई कमी खोज लेते हैं।”
रघुवीर कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “मैं कमी नहीं खोजता बेटा, मैं चाहता हूं कि सफलता के साथ इंसानियत भी बनी रहे।” यही वह क्षण था, जब एक साधारण-सी सलाह कड़वाहट में बदल गई।
अमित कमरे से बाहर चला गया। रघुवीर अकेला बैठा सोचता रहा कि क्या उसने कुछ गलत कहा था। उसे लगा कि शायद आज के समय में सच बोलने से पहले शब्दों को तौलना पड़ता है। मगर अगले ही पल उसके भीतर से आवाज आई “अगर अपने ही बेटे से सच नहीं कहूंगा तो किससे कहूंगा?”
समय बीतता गया। अमित का पद बढ़ा, आय बढ़ी और उसके आसपास लोगों की संख्या भी बढ़ती गई। अब उसके पास सलाह देने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन उनमें अधिकांश ऐसे लोग थे, जो उसकी हां में हां मिलाते थे। वह जो निर्णय लेता, लोग उसे सही बताते। वह जो सोचता, लोग उसी को महान विचार कहते। धीरे-धीरे उसे अपनी प्रशंसा सुनने की आदत पड़ गई।
रघुवीर ने एक दिन बेटे से कहा, “अमित, तुम्हारे आसपास बहुत लोग हैं, लेकिन उनमें से कितने ऐसे हैं जो तुम्हारी गलती पर तुम्हें रोक सकते हैं?”
अमित ने हंसते हुए जवाब दिया, “आज के समय में हर कोई अपनी जिंदगी में व्यस्त है। किसी को किसी की गलती से क्या लेना-देना?”
रघुवीर ने गंभीर होकर कहा, “यही तो डर है। जब आदमी के आसपास सच बोलने वाला कोई नहीं रहता, तब उसे अपनी गलतियां भी सही दिखाई देने लगती हैं।” अमित ने इस बार भी बात को टाल दिया।
कुछ महीनों बाद कंपनी में एक बड़ा प्रोजेक्ट आया। अमित को उसकी जिम्मेदारी मिली। प्रोजेक्ट में जल्दी परिणाम दिखाने के दबाव में उसने कुछ ऐसे निर्णय लिए, जिन पर उसके पिता ने पहले ही उसे सावधान किया था। आसपास के लोगों ने उसकी हर योजना की तारीफ की। किसी ने यह नहीं कहा कि जल्दबाजी नुकसान पहुंचा सकती है।
प्रोजेक्ट शुरू हुआ और शुरुआती सफलता ने अमित का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया। लेकिन कुछ ही समय बाद वास्तविकता सामने आने लगी। आंकड़ों में गड़बड़ी थी, काम में खामियां थीं और जिन लोगों ने उसे हर कदम पर सही बताया था, वे अब एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने लगे।
अमित के सामने पहली बार वह स्थिति थी, जहां प्रशंसा के सारे शब्द गायब हो चुके थे।
वह देर रात घर लौटा। पिता बरामदे में बैठे थे। उन्होंने बेटे के चेहरे की थकान देखी लेकिन कोई सवाल नहीं किया। कुछ देर बाद अमित खुद बोल पड़ा, “पिताजी, लगता है मुझसे गलती हो गई।”
रघुवीर ने उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर न जीत की खुशी थी, न बेटे की गलती का उपहास। उन्होंने केवल इतना कहा, “गलती होना बुरा नहीं है बेटा। गलती को स्वीकार न करना बुरा है।” अमित की आंखें झुक गईं।
उसने कहा, “आपने पहले ही कहा था कि जल्दबाजी मत करना। मुझे लगा था आप हमेशा की तरह मेरी खुशी में भी कमी खोज रहे हैं।”
रघुवीर ने धीमे स्वर में कहा, “मैं तुम्हारी खुशी छीनना नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि तुम्हारी खुशी इतनी मजबूत हो कि पहली असफलता उसे तोड़ न सके।” अमित कुछ नहीं बोला।
उस रात दोनों के बीच बहुत देर तक बातचीत हुई। वर्षों से जमा शिकायतें बाहर आईं। अमित ने पिता से कहा कि उसे हमेशा लगता रहा कि पिता उसकी उपलब्धियों को स्वीकार नहीं करते। रघुवीर ने कहा कि उसे लगता था कि बेटा सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य समझ बैठा है।
दोनों ने पहली बार महसूस किया कि उनके बीच समस्या सच की नहीं थी, बल्कि सच कहने और सुनने के तरीके की थी।
अगले दिन अमित ने अपने प्रोजेक्ट की खामियां स्वीकार कीं। कुछ लोगों ने उसे कमजोर कहा, कुछ ने उसकी आलोचना की, लेकिन इस बार उसने किसी की परवाह नहीं की। उसने सुधार की शुरुआत की। जो गलत हुआ था, उसे ठीक करने में समय लगा, मगर धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे।
कुछ महीनों बाद प्रोजेक्ट सफल हुआ। कंपनी ने अमित की ईमानदारी और जिम्मेदारी की प्रशंसा की। लेकिन इस बार अमित के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि कंपनी का सम्मान नहीं था। वह घर लौटा और पिता के सामने बैठकर बोला, “पिताजी, अब समझ आया कि सच कड़वा नहीं होता। हम अपनी पसंद के अनुसार सुनना चाहते हैं, इसलिए सच कड़वा लगता है।”
रघुवीर मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “और याद रखना, बेटा, सच बोलना भी एक कला है। सच अगर किसी को तोड़ दे तो वह केवल सत्य नहीं, अहंकार की अभिव्यक्ति भी हो सकता है। सच वही अच्छा है जो सुधार का रास्ता दिखाए।” अमित ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
उस दिन पहली बार दोनों को लगा कि वर्षों से उनके बीच जो दूरी थी, वह किसी बड़ी घटना से नहीं बल्कि कुछ शब्दों के गलत अर्थों से बनी थी। शब्दों में मिठास नहीं थी, लेकिन उनके पीछे प्रेम था। समस्या यह थी कि प्रेम की आवाज कड़वाहट में दब गई थी।
जिंदगी में ऐसे अनगिनत रघुवीर और अमित मिल जाएंगे। घर में पिता-पुत्र, मां-बेटी, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र और सहकर्मी—हर रिश्ते में कभी न कभी सच सामने आता है। सवाल यह नहीं है कि सच क्या है। सवाल यह है कि सच को किस तरह कहा गया और उसे किस मन से सुना गया।
कई बार हम झूठी प्रशंसा को अपनापन समझ लेते हैं और सच बोलने वाले को अपना विरोधी मान लेते हैं। जो व्यक्ति हमारी हर बात पर सिर हिलाता है, वह जरूरी नहीं कि हमारा शुभचिंतक हो। और जो व्यक्ति हमारी गलती पर हमें रोकता है, वह जरूरी नहीं कि हमारा दुश्मन हो। रिश्तों की असली परीक्षा उस समय होती है, जब सामने वाला हमारी पसंद के विरुद्ध जाकर भी हमारे हित की बात कहता है।
सच की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह देर से सही, लेकिन अपना असर जरूर दिखाता है। झूठ कुछ समय के लिए मन को खुश कर सकता है, मगर सच जीवन को दिशा देता है। हालांकि सच बोलते समय संवेदनशीलता जरूरी है। कटु शब्दों में कहा गया सही तथ्य भी दिल को घायल कर सकता है। इसलिए सच के साथ संवेदना, स्पष्टता के साथ विनम्रता और आलोचना के साथ समाधान होना चाहिए।
समाज में आज कड़वाहट बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हम सुनने की क्षमता खोते जा रहे हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए, लेकिन दूसरे की बात सुनने का धैर्य बहुत कम लोगों में बचा है। असहमति को विरोध और विरोध को दुश्मनी मान लेने की प्रवृत्ति ने रिश्तों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसे गिराने के लिए कभी-कभी वर्षों लग जाते हैं।
सच का मतलब किसी को नीचा दिखाना नहीं है। सच का उद्देश्य किसी की कमियां गिनाना भी नहीं है। सच का वास्तविक उद्देश्य है जहां गलती है, वहां सुधार की संभावना पैदा करना; जहां अंधेरा है, वहां रोशनी की ओर संकेत करना और जहां रिश्ता टूटने की कगार पर है, वहां संवाद का रास्ता खोलना।
इसलिए जरूरी है कि हम सच से भागें नहीं और सच बोलने वाले से नाराज भी न हों। हर सच को स्वीकार करना आसान नहीं होता, लेकिन हर सच से कुछ सीखना संभव होता है। और जब सच को प्रेम, धैर्य और संवेदना के साथ कहा जाए तो उसकी कड़वाहट भी धीरे-धीरे मिठास में बदल सकती है।
कहानी के अंत में रघुवीर की कही एक बात शायद जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बन जाती है “सच आईना है, हथियार नहीं। आईने का काम चेहरा दिखाना है, चेहरा बिगाड़ना नहीं।”
शायद रिश्तों को बचाने के लिए हमें इतना ही समझना होगा कि सच से डरने के बजाय उसे समझें, और सच बोलने से पहले शब्दों में इंसानियत घोलें। क्योंकि जब सच में संवेदना मिल जाती है, तब वह कड़वाहट नहीं रहता—वह जीवन को बदलने वाली रोशनी बन जाता है।
