ट्यूटर की फ़रियाद: शिक्षा का अनदेखा और असुरक्षित स्तंभ

 श्री कांत दुबे 

भारत में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना जाता है, लेकिन इस आधारशिला को मजबूत करने वाले लाखों होम ट्यूटर्स स्वयं असुरक्षा, अस्थिरता और उपेक्षा के बीच जीवन जीने को विवश हैं। विद्यार्थियों की सफलता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद उनके अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा पर बहुत कम चर्चा होती है।

बिहार सहित देश के अनेक राज्यों से बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली-एनसीआर और अन्य महानगरों का रुख करते हैं। इनमें से अनेक युवाओं ने अपनी योग्यता के बल पर होम ट्यूटर का पेशा अपनाया। वे केवल पढ़ाते नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों की व्यक्तिगत कमजोरियों को समझकर उन्हें सुधारने का प्रयास भी करते हैं।

विडंबना यह है कि इस क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों के लिए न तो कोई निश्चित सेवा शर्त है, न न्यूनतम मानदेय और न ही किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा। उनका रोजगार पूरी तरह अभिभावकों की इच्छा पर निर्भर रहता है। कई बार विद्यार्थी की रुचि कम होने या अपेक्षित परिणाम न मिलने पर बिना किसी पूर्व सूचना के ट्यूटर को हटा दिया जाता है।

एक और चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि कई स्थानों पर ट्यूटर की शैक्षणिक योग्यता से अधिक उसके पहनावे, व्यक्तित्व या अंग्रेज़ी बोलने के अंदाज़ को महत्व दिया जाता है। वर्षों की मेहनत से अर्जित ज्ञान अक्सर सतही मानकों के सामने गौण हो जाता है। यह स्थिति न केवल योग्य शिक्षकों का मनोबल गिराती है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

कोविड-19 महामारी ने इस वर्ग की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया। अनेक शिक्षकों द्वारा संचालित छोटे कोचिंग संस्थान बंद हो गए, कर्ज का बोझ बढ़ा और कई लोगों को अपना व्यवसाय छोड़कर गांव लौटना पड़ा। आर्थिक संकट के इस दौर में उनके लिए कोई विशेष सहायता व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।

यह भी सत्य है कि किसी विद्यार्थी की सफलता या असफलता केवल एक ट्यूटर पर निर्भर नहीं करती। परिवार का वातावरण, विद्यालय की गुणवत्ता, विद्यार्थी की रुचि और उसकी मेहनत—ये सभी समान रूप से महत्वपूर्ण कारक हैं। इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम न मिलने पर सबसे पहले होम ट्यूटर को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है, जिससे मानसिक और सामाजिक दबाव बढ़ता है।

आज समय की मांग है कि होम ट्यूटर्स को असंगठित श्रमिक नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में देखा जाए। उनके लिए पंजीकरण प्रणाली, न्यूनतम मानदेय, स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा और विवाद निवारण जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीर विचार होना चाहिए। इससे न केवल शिक्षकों का सम्मान बढ़ेगा, बल्कि विद्यार्थियों को भी अधिक स्थिर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण वातावरण मिलेगा।

देश की नई पीढ़ी को आकार देने वाले इन शिक्षकों की आवाज़ को सुनना केवल एक वर्ग की समस्या का समाधान नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में आवश्यक कदम है। यदि हम ज्ञान देने वालों को सम्मान और सुरक्षा नहीं देंगे, तो भविष्य की शिक्षा व्यवस्था भी असुरक्षा की नींव पर खड़ी होगी।

(लेखक के निजी विचार)

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