जीवित्पुत्रिका व्रत: नहाय-खाय से शुरू हुई संतान की लंबी उम्र की कामना, मिथिला में ओठगण की सदियों पुरानी परंपरा

नहाय-खाय के साथ आज से शुरू हुआ जीवित्पुत्रिका व्रत, माताएं रखेंगी निर्जला उपवास; मिथिला में भोर चार बजे ओठगण की विशेष परंपरा

विनोद कुमार झा 

मां और संतान का रिश्ता दुनिया के सबसे गहरे और निस्वार्थ रिश्तों में माना जाता है। संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए मां की प्रार्थना में जो भाव छिपा होता है, वही भाव सदियों से चली आ रही जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत की परंपरा में दिखाई देता है। आश्विन कृष्ण पक्ष में मनाया जाने वाला यह व्रत केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि मातृत्व की आस्था, लोकविश्वास और परिवार की मंगलकामना से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जिसकी अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट लोकरीतियां हैं। कहीं माताएं नहाय-खाय के साथ व्रत की शुरुआत करती हैं तो कहीं व्रत से पहले विशेष पकवान बनाए जाते हैं। मिथिला में इस पर्व की शुरुआत से जुड़ी ओठगण की परंपरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें भोर से पहले चूड़ा, दही और चीनी का सेवन कर महिलाएं निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं।

जीवित्पुत्रिका व्रत की शुरुआत आज नहाय-खाय की परंपरा के साथ हो रही है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान कर शुद्धता के साथ व्रत का संकल्प लेती हैं। मिथिला क्षेत्र में इस अवसर पर पितरों को भी स्मरण किया जाता है। लोकपरंपरा के अनुसार सुबह पितरों के नाम पर तेल और खैर चढ़ाने की परंपरा है। इसके बाद परिवार में महिला पितरों की स्मृति और सम्मान में किसी महिला को भोजन कराया जाता है। यह केवल भोजन कराने की रस्म नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं और व्रती महिलाएं अगले चरण के कठिन उपवास के लिए स्वयं को तैयार करती हैं।

मिथिला में जीवित्पुत्रिका व्रत से पहले ओठगण का विशेष महत्व है। लोकपरंपरा के अनुसार व्रती महिलाएं रात के अंतिम पहर अथवा सुबह करीब चार बजे उठकर ओटगण करती हैं। ओटगण में मुख्य रूप से चूड़ा, दही और चीनी का सेवन किया जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी मिथिला के अनेक परिवारों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। ओटगण के बाद व्रती महिलाएं अन्न-जल का त्याग कर निर्जला व्रत में प्रवेश करती हैं। इसके बाद पूरे दिन और निर्धारित व्रत अवधि तक महिलाएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से उपवास करती हैं।

जीवित्पुत्रिका व्रत को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और लोकपरंपराओं के साथ मनाया जाता है। बिहार और झारखंड के अनेक हिस्सों में इसे जितिया या जीवितिया के नाम से जाना जाता है। मिथिला में इसके साथ ओटगण, पितृस्मरण और पारंपरिक भोजन की विशेष लोकरीतियां जुड़ी हैं। बिहार के अन्य हिस्सों में भी महिलाएं व्रत से पहले स्नान, शुद्ध भोजन और पारंपरिक तैयारियों के साथ उपवास का संकल्प लेती हैं। कई परिवारों में इस दौरान घर की बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी की महिलाओं को व्रत से जुड़ी कथा और परंपराएं सुनाती हैं, जिससे लोकसंस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रहती है।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और आसपास के क्षेत्रों में भी जीवित्पुत्रिका व्रत की व्यापक परंपरा देखने को मिलती है। यहां इसे प्रायः जिउतिया या जितिया व्रत के नाम से जाना जाता है। व्रती महिलाएं संतान के मंगल और दीर्घायु की कामना से निर्जला उपवास करती हैं। व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा और उनकी कथा का श्रवण किया जाता है। लोकमान्यता में जीमूतवाहन को त्याग, करुणा और संतान की रक्षा के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। इसी कारण व्रत की कथा में मां की संतान के प्रति समर्पण और रक्षा की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।

झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी जितिया का अपना लोकस्वरूप है। यहां व्रत धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक लोकजीवन से भी जुड़ जाता है। महिलाएं समूह में पूजा करती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और व्रत कथा सुनती हैं। गांवों में बुजुर्ग महिलाओं की भूमिका विशेष होती है, क्योंकि वही नई पीढ़ी को बताती हैं कि किस प्रकार इस व्रत को परिवार की परंपरा के अनुसार निभाया जाता रहा है। कई स्थानों पर स्थानीय रीति-रिवाजों और खान-पान के अनुसार व्रत की तैयारियों में अंतर भी दिखाई देता है।

नेपाल के तराई और मिथिला से जुड़े क्षेत्रों में भी जीवित्पुत्रिका की परंपरा देखने को मिलती है। भारत-नेपाल के सीमावर्ती सांस्कृतिक क्षेत्र में पर्व की अनेक परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यहां भी माताएं संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से उपवास करती हैं और परिवार की महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-पाठ और व्रत कथा में भाग लेती हैं। इस प्रकार जितिया केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित पर्व नहीं रह जाता, बल्कि मिथिला और पूर्वी उत्तर भारत की साझा लोकसंस्कृति का हिस्सा बन जाता है।

नेपाल के मधेश और तराई क्षेत्र में भी जितिया को महिलाओं के महत्वपूर्ण पर्व के रूप में देखा जाता है। वहां इसकी अपनी स्थानीय परंपराएं हैं और महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा तथा व्रत कथा में शामिल होती हैं। लोकगीतों के माध्यम से मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और परिवार के कल्याण की कामना व्यक्त की जाती है। यही कारण है कि जितिया का धार्मिक पक्ष जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही इसका सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष भी दिखाई देता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत के पीछे भगवान जीमूतवाहन से जुड़ी कथा का विशेष महत्व माना जाता है। लोकप्रचलित कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा और एक नागपुत्र के प्राण बचाने के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया था। उनके त्याग और करुणा की स्मृति में यह व्रत किए जाने की मान्यता प्रचलित हुई। कथा का मूल संदेश त्याग, परोपकार, करुणा और जीवन की रक्षा से जुड़ा है। यही भाव आगे चलकर माताओं की संतान के प्रति निस्वार्थ भावना से जुड़ गया और जीवित्पुत्रिका व्रत मातृत्व की आस्था का महत्वपूर्ण पर्व बन गया।

इस व्रत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा जाता। इसके पीछे मां की वह भावना है जिसमें वह अपने सुख-सुविधाओं को छोड़कर संतान के मंगल की कामना करती है। निर्जला व्रत की कठिन साधना इसी संकल्प का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्जला उपवास कठिन हो सकता है, इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपनी शारीरिक स्थिति और चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए, विशेषकर गर्भवती, बुजुर्ग या किसी बीमारी से पीड़ित महिलाओं को उपवास के संबंध में चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

मिथिला की ओठगण परंपरा इस पूरे पर्व को और भी विशिष्ट बना देती है। चूड़ा-दही-चीनी जैसे सरल और पारंपरिक भोजन से भोर में व्रत की शुरुआत करना केवल भोजन की व्यवस्था नहीं, बल्कि लोकजीवन की स्मृति से जुड़ा संस्कार है। गांवों और कस्बों में आज भी कई घरों में ओठगण के समय महिलाएं एक साथ बैठती हैं, परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से व्रत की बातें सुनती हैं और इसके बाद निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। बदलते समय में शहरों की जीवनशैली भले बदल गई हो, लेकिन इस परंपरा का भाव आज भी कायम है।

जीवित्पुत्रिका व्रत की खूबसूरती यही है कि इसकी मूल भावना पूरे देश में लगभग एक जैसी दिखाई देती है, जबकि इसके मनाने का तरीका क्षेत्र के अनुसार बदल जाता है। कहीं पितरों का स्मरण प्रमुख है, कहीं ओठगण की परंपरा, कहीं सामूहिक पूजा और लोकगीतों का महत्व है तो कहीं व्रत कथा और भगवान जीमूतवाहन की पूजा केंद्र में रहती है। अलग-अलग लोकरीतियों के बावजूद हर जगह इसके केंद्र में एक ही भावना दिखाई देती है संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुखी जीवन की मंगलकामना।

आज नहाय-खाय से शुरू हुआ यह पर्व आने वाले दिनों में अपनी धार्मिक और लोक-सांस्कृतिक परंपराओं के साथ आगे बढ़ेगा। घरों में व्रत की तैयारियां होंगी, महिलाएं पूजा की सामग्री जुटाएंगी, बुजुर्ग व्रत की कथाएं सुनाएंगे और लोकगीतों के बीच मातृत्व की आस्था फिर जीवंत होगी। मिथिला की धरती पर भोर चार बजे होने वाला ओटगण हो या पूर्वांचल में जीमूतवाहन की पूजा, झारखंड में सामूहिक लोकपरंपराएं हों या नेपाल के तराई क्षेत्र में महिलाओं का सामूहिक व्रत जीवित्पुत्रिका हर जगह मां के उसी अटूट संकल्प की कहानी कहता है, जिसमें अपनी संतान के लिए वह हर कठिनाई सहने को तैयार रहती है।

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